सागर-चित्र-अरी ओ करुणा प्रभामय अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

सागर-चित्र-अरी ओ करुणा प्रभामय अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

सूने उदधि की लहर
धीर बधिर:
सूने क्षितिज का आत्मलीन आलोक
अधूरा, धूसर, अन्धा:

टकराहट चट्टानों पर
थोथे थप्पड़ की
जल के:

उड़े झाग की चिनियाहट
गालों पर,
आँखों में किरकिरी रेत:

अर्थहीन मँडराते कई क्रौंच
हकलाते-से जब-तब कराहते हलके ।

यह क्षण: यह चित्र
दरिद्र?
अ-मूल? अमोल?
विलीयमान? चिर?

नयी दिल्ली (रेस्तराँ में बैठे-बैठे), 25 अगस्त, 1958

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