साक़ी-पसन्दीदा कविता-शहीद भगत सिंह-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem|Kavita Shaheed Bhagat Singh

साक़ी-पसन्दीदा कविता-शहीद भगत सिंह-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem|Kavita Shaheed Bhagat Singh

नशा पिला के गिराना तो सबको आता है,
मज़ा तो तब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी।

जो बादाकश थे पुराने वे उठते जाते हैं
कहीं से आबे-बक़ाए-दवाम ले साक़ी।

कटी है रात तो हंगामा-गुस्तरीं में तेरी,
सहर क़रीब है अल्लाह का नम ले साक़ी।

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