साईं लोग गाते-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

साईं लोग गाते-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

साईं लोग गाते हुए
मुझे बहुत अच्छे लगते हैं।
जैसे दरिया मस्ती में
लहर लहर सुर लगाता।

शिरीष की सूखी फलियाँ
छनकतीं पतझड़ ऋतु में।
ख़ानगाह पर जलता
सरसों के तेल का चिराग।
साईं लोग गाते हुए
मंत्रमुग्ध कर बिठाते हैं बेचैन वृत्तियाँ।
पानी में डूबे घड़े-सा
रूह तृप्त हो जाती है दोतारा सुनतें।

तड़के सवेरे प्रभाती गाता
जोगिया कपड़े वाला
बाबा गिरि आता दिन उगे।
उसके भिक्षापात्र में गुड़वाली चाय
मैं ही डालता।
लगता कि सुरीला रब्ब आकर बैठा है
हमारे द्वार।

आटा माँगता अपने परिवार के लिए।
हमारे परिवार के लिए आशीषें बाँटता,
नन्हा-सा सुरवंता वक़्त।

अभी भी मेरे साथ साथ
चलती हैं उसकी प्रभातियाँ।
साढ़े तीन हाथ धरती
बहुत है जागीर वालों।
काम कर ले निराभिमानी जान
सोए हुए नहीं दिन चढ़ता।

देख चल पड़े हलों को लिए हलवाहे
जान तू खर्राटें भरती।

तेरा चाम नहीं किसी काम आना
पशुओं की हड्डी बिकती।
लौटता तो लगता
गाँव से रूह चली गई है।
सुरमंडल समेट कर।
साथ ही ले गया है बाबा गिरि
सुर लहरियाँ।

किताबों में बहुत तलाशा सारी उम्र
वह कौन था?
चलता-फिरता ईश्वरीय नाद-सा।
हाड़-माँस का पुतला-सा।
मुट्ठी भर आटे के बदले
गली गली फिरता
सुरवंता संपूर्ण रब्ब।

बहुत बाद में पता लगा!
रब्ब बड़ी शैअ है
कभी छिप जाता है
मरदाने के रबाब में
बाणी के अंग संग चलने के लिए।

कभी पैर में घुँघरू बाँध कर
बन जाता है बुल्ले शाह।
इश्क में नाचता
करता थइया थइया।
तुंबे की तुंबी बना बन जाता है यमला जट्ट,
कभी आलम लोहार कभी शौकत अली।
मस्ती में गाता, हो जाता है
तुफ़ैल नियाज़ी, पठाने खां, मंसूर अली मलंगी,
साईं दीवाना, साईं मुश्ताक, साईं ज़हूर, मेरा हुजू़र।
तुंबा बजता है
घुल जाता है साँसों में।
इश्क चंबे की बूटी बन
कण कण में सुरूर भरता है।

घड़ा बजता, किंगरी बजती
तू तुंबा बजता सुन ज़िंदगी।
यह दुनिया बाग बहिश्ती है
हर रंग के फूल तू चुन ज़िंदगी।

अब पता लगा है कि साईं लोग
मुझे क्यों अच्छे लगते?
यह किताबों के गुलाम नहीं
धरती को कागज़ बनाते।
सुरों से अंबर पर
इबारत लिखते रमते जोगी।
सागर जितना जेरा।
तोड़ते बंधन घेरा।
साईं लोग गाते, तब ही दिखते हैं
गलियों में चलते फिरते रब्ब।

 

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