सांध्यगीत -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Sandhyageet Part 4

सांध्यगीत -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Sandhyageet Part 4

रागभीनी तू सजनि

रागभीनी तू सजनि निश्वास भी तेरे रँगीले!

लोचनों में क्या मदिर नव?
देख जिसकी नीड़ की सुधि फूट निकली बन मधुर रव!
झूलते चितवन गुलाबी-
में चले घर खग हठीले!
रागभीनी तू सजनि निश्वास भी तेरे रँगीले!

छोड़ किस पाताल का पुर?
राग से बेसुध, चपल सजीले नयन में भर,
रात नभ के फूल लाई,
आँसुओं से कर सजीले!
रागभीनी तू सजनि निश्वास भी तेरे रँगीले!

आज इन तन्द्रिल पलों में!
उलझती अलकें सुनहली असित निशि के कुन्तलों में!
सजनि नीलमरज भरे
रँग चूनरी के अरुण पीले!
रागभीनी तू सजनि निश्वास भी तेरे रँगीले!

रेख सी लघु तिमिर लहरी,
चरण छू तेरे हुई है सिन्धु सीमाहीन गहरी!
गीत तेरे पार जाते
बादलों की मृदु तरी ले!
रागभीनी तू सजनि निश्वास भी तेरे रँगीले!

कौन छायालोक की स्मृति,
कर रही रङ्गीन प्रिय के द्रुत पदों की अंक-संसृति,
सिहरती पलकें किये-
देती विहँसते अधर गीले!
रागभीनी तू सजनि निश्वास भी तेरे रँगीले!

 प्रिय-पथ के यह मुझे अति प्यारे ही हैं

प्रिय-पथ के यह मुझे अति प्यारे ही हैं

हीरक सी वह याद
बनेगा जीवन सोना,
जल जल तप तप किन्तु खरा इसको है होना!
चल ज्वाला के देश जहाँ अङ्गारे ही हैं!

तम-तमाल ने फूल
गिरा दिन पलकें खोलीं
मैंने दुख में प्रथम
तभी सुख-मिश्री घोली!
ठहरें पल भर देव अश्रु यह खारे ही हैं!

ओढे मेरी छाँह
राज देती उजियाला,
रजकण मृदु-पद चूम
हुए मुकुलों की माला!
मेरा चिर इतिहास चमकते तारे ही हैं!

आकुलता ही आज
हो गई तन्मय राधा,
विरह बना आराध्य
द्वैत क्या कैसी बाधा!
खोना पाना हुआ जीत वे हारे ही हैं!

सो रहा है विश्व, पर प्रिय तारकों में जागता है!

सो रहा है विश्व, पर प्रिय तारकों में जागता है!

नियति बन कुशली चितेरा-
रँग गई सुखदुख रँगों से
मृदुल जीवन-पात्र मेरा!
स्नेह की देती सुधा भर अश्रु खारे माँगता है!

धुपछाँही विरह-वेला;
विश्व-कोलाहल बना वह
ढूँढती जिसको अकेला,
छाँह दृग पहचानते पद-चाप यह उर जानता है!

रंगमय है देव दूरी!
छू तुम्हें रह जायगी यह
चित्रमय क्रीड़ा अधूरी!
दूर रह कर खेलना पर मन न मेरा मानता है!

वह सुनहला हास तेरा-
अंकभर घनसार सा
उड़ जायगा अस्सित्व मेरा!
मूँद पलकें रात करती जब हृदय हठ ठानता है!

मेघरूँधा अजिर गीला-
टूटता सा इन्दु-कन्दुक
रवि झुलसता लोल पीला!
यह खिलौने और यह उर ! प्रिय नई असमानता है!

री कुंज की शेफालिके!

री कुंज की शेफालिके!

गुदगुदाता वात मृदु उर,
निशि पिलाती ओस-मद भर,
आ झुलाता पात-मर्मर,
सुरभि बन प्रिय जायगा पट-
मूँद ले दृग-द्वार के!

तिमिर में बन रश्मि-संसृति,
रूपमय रंगमय निराकृति,
निकट रह कर भी अगम-गति,
प्रिय बनेगा प्रात ही तू
गा न विहग-कुमारिके!

क्षितिज की रेखा धुले धुल,
निमिष की सीमा मिटे मिल,
रूप के बन्धन गिरें खुल,
निशि मिटा दे अश्रु से
पदचिह्न आज विहान के!
री कुंज की शेफालिके!

 झिलमिलाती रात मेरी!

झिलमिलाती रात मेरी!

साँझ के अन्तिम सुनहले
हास सी चुपचाप आकर,
मूक चितवन की विभा-
तेरी अचानक छू गई भर;
बन गई दीपावली तब आँसूओं की पाँत मेरी!

अश्रु घन के बन रहे स्मित
सुप्त वसुधा के अधर पर,
कंज में साकार होते
बीचियों के स्वप्न सुन्दर;
मुस्करा दी दामिनी में साँवली बरसात मेरी!

क्यों इसे अम्बर न निज
सूने हृदय में आज भर ले?
क्यों न यह जड़ में पुलक का,
प्राण का संचार कर ले?
है तुम्हारी श्वास के मधु-भार-मन्थर वात मेरी!

 चिर सजग आँखे उनींदी

चिर सजग आँखे उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना!
जाग तुझको दूर जाना!

अचल हिमगिरि के हृदय में आज चाहे कम्प हो ले,
या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले;

आज पी आलोक को डोले तिमिर की घोर छाया,
जाग या विद्युत्-शिखाओं में निठुर तूफान बोले!

पर तुझे है नाश-पथ पर चिह्न अपने छोड़ आना!
जाग तुझको दूर जाना!

बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बन्धन सजीले?
पन्थ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रँगीले?

विश्व का क्रन्दन भुला देगी मधुप की मधुर-गुनगुन,
क्या डुबा देंगे तुझे यह फूल के दल ओस-गीले?

तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना!
जाग तुझको दूर जाना!

वज्र का उर एक छोटे अश्रुकण में धो गलाया,
दे किसे जीवन-सुधा दो घूँट मदिरा माँग लाया?

सो गई आँधी मलय की वात का उपधान ले क्या?
विश्व का अभिशाप क्या नींद बनकर पास आया?

अमरता-सुत चाहता क्यों मृत्यु को उर में बसाना?
जाग तुझको दूर जाना!

कह न ठंडी साँस में अब भूल वह जलती कहानी,
आग हो उर में तभी दृग में सजेगा आज पानी;

हार भी तेरी बनेगी मानिनी जय की पताका,
राख क्षणिक् पतंग की है अमर की निशानी!

है तुझे अंगार-शय्या पर मृदुल कलियाँ बिछाना!
जाग तुझको दूर जाना!

देव अब वरदान कैसा!

देव अब वरदान कैसा!

बेध दो मेरा हृदय माला बनूँ प्रतिकूल क्या है!
मैं तुम्हें पहचान लूँ इस कूल तो उस कूल क्या है!

छीन सब मीठे क्षणों को,
इन अथक अन्वेक्षणों को,

आज लघुता से मुझे
दोगे निठुर प्रतिदान कैसा!

जन्म से यह साथ है मैंने इन्हीं का प्यार जाना;
स्वजन ही समझा दृगों के अश्रु को पानी न माना;

इन्द्रधनु से नित सजी सी,
विद्यु-हीरक से जड़ी सी,

मैं भरी बदली रहूँ
चिर मुक्ति का सम्मान कैसा!

युगयुगान्तर की पथिक मैं छू कभी लूँ छाँह तेरी,
ले फिरूँ सुधि दीप सी, फिर राह में अपनी अँधेरी;

लौटता लघु पल न देखा,
नित नये क्षण-रूप-रेखा,

चिर बटोही मैं, मुझे
चिर पंगुता का दान कैसा!

 तन्द्रिल निशीथ में ले आये

तन्द्रिल निशीथ में ले आये

गायक तुम अपनी अमर बीन!
प्राणों में भरने स्वर नवीन!

तममय तुषारमय कोने में
छेड़ा जब दीपक राग एक,

प्राणों प्राणों के मन्दिर में
जल उठे बुझे दीपक अनेक!

तेरे गीतों के पंखों पर
उड़ चले विश्व के स्वप्न दीन!

तट पर हो स्वर्ण-तरी तेरी
लहरों में प्रियतम की पुकार,

फिर कवि हमको क्या दूर देश
कैसा तट क्या मँझधार पार?

दिव से लावे फिर विश्व जाग
चिर जीवन का वरदान छीन!

गाया तुमने ‘है सृत्यु मूक
जीवन सुख-दुखमय मधुर गान’,

सुन तारों के वातायन से
झाँके शत शत अलसित विहान

बाई-भर अंचल में बतास
प्रतिध्वनि का कण कण बीन बीन।

दमकी दिगन्त के अधरों पर
स्मित की रेखा सी क्षितिज-कोर,

आ गये एक क्षण में समीप
आलोक-तिमिर के दूर छोर!

घुल गया अश्रु अरुण में हास
हो गई हार में जय विलीन!

नव घन आज बनो पलकों में!

नव घन आज बनो पलकों में!
पाहुन अब उतरो पलकों में!

तम-सागर में अंगारे सा;
दिन बुझता टूटे तारे सा,

फूटो शत शत विद्यु-शिखा से
मेरी इन सजला पुलकों में!

प्रतिमा के दृग सा नभ नीरस,
सिकता-पुलिनों सी सूनी दिश;

भर भर मन्थर सिहरन कम्पन
पावस से उमड़ी अलकों में!

जीवन की लतिका दुख-पतझर,
गए स्वप्न के पीत पात झर,

मधुदिन का तुम चित्र बनो अब
सूने क्षण क्षण के फलकों में!

हे चिर महान्!

हे चिर महान्!

यह स्वर्ण रश्मि छू श्वेत भाल,
बरसा जाती रंगीन हास;
सेली बनता है इन्द्रधनुष
परिमल मल मल जाता बतास!
पर रागहीन तू हिमनिधान!

नभ में गर्वित झुकता न शीश
पर अंक लिये है दीन क्षार;
मन गल जाता नत विश्व देख,
तन सह लेता है कुलिश-भार!
कितने मृदु, कितने कठिन प्राण!

टूटी है कब तेरी समाधि,
झंझा लौटे शत हार-हार;
बह चला दृगों से किन्तु नीर
सुनकर जलते कण की पुकार!
सुख से विरक्त दुख में समान!

मेरे जीवन का आज मूक
तेरी छाया से हो मिलाप,
तन तेरी साधकता छू ले,
मन ले करुणा की थाह नाप!
उर में पावस दृग में विहान!

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