सांझ जब घिरती है-कविता-पद्मा सचदेव-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Padma Sachdev

सांझ जब घिरती है-कविता-पद्मा सचदेव-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Padma Sachdev

सांझ जब घिरती है, कहीं कहीं रुकती है
कहीं ये ठहरती है- सांझ जब घिरती है
कमर से लगाकर सूरज की रश्मियों को
कंधे से लगाकर रोशनी की किरणों को
मलती है सिर के बिखरे हुए बालों पर
घुंघराली लटों को मलती है हाथों से
फिर सुला देती है, कहानियों में लोरी बुनकर
अंधेरों को सुलाती है, रोशनी बुलाती है
मिलाती है कहीं जाकर आकाश को धरती से
सांझ इसे कहते हैं

सांझ जब घिरती है
सांझ में मिलने वाले जागते हैं सायों के परदे में
आती-जाती खलकत के जाने के समय सांस रोक लेते हैं
पीठ कर लेते हैं लोग न पहचान लें

सांझ जब घिरती है
चांद से निकालती है दोहरा घूंघट यह
चांद न पहचान ले, अंधेरा न जान ले
दीवार से चिपककर सांझ सोयी रहती है
करीब से एकदम अंधेरा निकल जाता है
गलियों के भ्रम में निकलता है गलियों में
घुस जाता है रास्तों में
गलती से घुस जाता है बच्चों के स्कूल बैग में
होमवर्क बाकी है
सांझ मिटती जाती है अंधेरे के अंतरतम में,
वहां जा के रहती है सांझ जब घिरती है.

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