सहंसर दान दे इंद्रु रोआइआ-सलोक-गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

सहंसर दान दे इंद्रु रोआइआ-सलोक-गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

सहंसर दान दे इंद्रु रोआइआ ॥
परस रामु रोवै घरि आइआ ॥
अजै सु रोवै भीखिआ खाइ ॥
ऐसी दरगह मिलै सजाइ ॥
रोवै रामु निकाला भइआ ॥
सीता लखमणु विछुड़ि गइआ ॥
रोवै दहसिरु लंक गवाइ ॥
जिनि सीता आदी डउरू वाइ ॥
रोवहि पांडव भए मजूर ॥
जिन कै सुआमी रहत हदूरि ॥
रोवै जनमेजा खुइ गइआ ॥
एकी कारणि पापी भइआ ॥
रोवहि सेख मसाइक पीर ॥
अंति कालि मतु लागै भीड़ ॥
रोवहि राजे कंन पड़ाइ ॥
घरि घरि मागहि भीखिआ जाइ ॥
रोवहि किरपन संचहि धनु जाइ ॥
पंडित रोवहि गिआनु गवाइ ॥
बाली रोवै नाहि भतारु ॥
नानक दुखीआ सभु संसारु ॥
मंने नाउ सोई जिणि जाइ ॥
अउरी करम न लेखै लाइ ॥१॥(953)॥

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