सवैये-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

सवैये-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

 अब प्रीति करी तौ निबाह करौ

अब प्रीति करी तौ निबाह करौ
अपने जन सों मुख मोरिए ना ।
तुम तो सब जानत नेह मजा
अब प्रीति कहूँ फिर जोरिए ना ।
‘हरिचंद’ कहै कर जोर यही
यह आस लगी तेहि तोरिए ना ।
इन नैनन माहँ बसो नित ही
तेहि आँसुन सों अब बोरिए ना ।

 यह काल कराल अहै कलि को

यह काल कराल अहै कलि को
‘हरिचंद’ कों नेक सोहातो नहीं ।
धन धाम अराम हराम करौ
अपनो तो कोऊ दरसातो नहीं ।
चित चाहत है चित चाह करै पर
वाको निबाह लखातो नहीं ।
दिल चाहत है दिल देइबे को
दिलदार तो कोऊ दिखातो नहीं ।

रैन में ज्यौहीं लगी झपकी त्रिजटे

रैन में ज्यौहीं लगी झपकी त्रिजटे
सपने सुख कौतुक-देख्यो ।
लै कपि भालु अनेकन साथ मैं
तोरि गढ़ै चहुँ ओर परेख्यो ।
रावन मारि बुलावन मो कहँ
सानुज मैं अबहीं अवरेख्यो ।
सोक नसावत आवत आजु
असोक की छाँह सखी पिय पेख्यो ।

सदा चार चवाइन के डर सों

सदा चार चवाइन के डर सों
नहिं नैनहु साम्हे नचायो करैं ।
निरलज्ज भई हम तो पै डरै
तुमरो न चवाव चलायो करैं ।
‘हरिचंद’ जू वा बदनामिन के
डर तेरी गलीन न आयो करैं ।
अपनी कुल-कानिहुँ सों बढ़िकै
तुम्हरी कुल-कानि बचाओ करैं ।

ताजि कै सब काम को तेरे

ताजि कै सब काम को तेरे
गलीन में राजहि रोज तो फेरो करै ।
तुव बाट बिलोकत ही ‘हरिचंद’
जू बैठि के साँझ सबेरो करै ।
पै सही नहिं जात भई बहुतै सो
कहाँ कह लौं जिय छोरो करै ।
पिय प्यारे तिहारे लिये कब लौं
अब दूतिन को मुख हेरो करै ।

आइयो मो घर प्रान पिया

आइयो मो घर प्रान पिया
सुखचंद दया करि कै दरसाइये ।
प्याइये पानिय रूप सुधा को बिलोकि
इअतै दृग प्यास बुझाइये ।
छाइये सीतलता ‘हरीचंद’ जू हा हा
लगी हियरे की बुझाइये ।
लाइये मोहि गरे हसि कै उर
ग्रीषमै प्यारे हिमन्त बनाइये ।

कोऊ कलंकिनि भाखत है कहि

कोऊ कलंकिनि भाखत है कहि
कामिनिहू कोऊ नाम धरैगो ।
त्रासत हैं घर के सिगरे अब
बाहरीहू तो चवाव करैगो ।
दूतिन की इनकी उनकी
‘हरिचंद’ सबै सहते ही सरैगो ।
तेरेई हेत सुन्यो न कहा कहा
औरहु का सुनिबो न परैगो ।

मन लागत जाको जबै जिहिसों

मन लागत जाको जबै जिहिसों
करि दाया तो सोऊ निभावत है ।
यह रीति अनोखी तिहारी नई
अपुनो जहाँ दूनो दुखावत है ।
‘हरिचंद जू’ बानो न राखत आपुनो
दासहु हवै दुख पावत है ।
तुम्हरे जन होइ कै भोगैं दुखै तुम्हें
लाजहु हाय न आवत है ।

 अब और के प्रेम के फंद परे

अब और प्रेम के फंद परे
हमें पूछत- कौन, कहाँ तू रहै ।
अहै मेरेह भाग की बात अहो तुम
सों न कछु ‘हरिचन्द’ कहै ।
यह कौन सी रीति अहै हरिजू तेहि
भारत हौ तुमको जो चहै ।
चह भूलि गयो जो कही तुमने हम
तेरे अहै तू हमारी अहै ।

हम चाहत हैं तुमको जिउ से

हम चाहत हैं तुमको जिउ से
तुम नेकहू नाहिंनै बोलती हौ ।
यह मानहु जो ‘हरिचंद’ कहै
केहि हेत महाविष घोलती हौ ।
केहि हेत महाविष घोलती हौ ।
तुम औरन सों नित चाह करौ
हमसों हिअ गाँठ न खोलती हौ ।
इक नैन के डोर बँधी पुतरी तुम
नाचत औ जग डोलती हौ ।

जा मुख देखन को नितही रुख

जा मुख देखन को नितही रुख
दूतिन दासिन को अवरेख्यो ।
मानी मनौतीहू देवन को
‘हरिचंद’ अनेकन जोतिस लेख्यो ।
सो निधि रूप अचानक ही मग में
जमुना जल जात मैं देख्यो ।
सोक को थोक मिट्यो अब आजु
असोक की छाँह सखी पिय पेख्यो ।

देखत पीठि तिहारी रहैंगे न

देखत पीठि तिहारी रहैंगे न
प्रान कबौम तन बीच नवारे ।
आओ गरे लपटौ मिली लेहु
पिया ‘हरिचंद’ जू नाथ हमारे ।
कौन कहै कहा होयेगो पाछे
वनै न बनै कछु मेरे सम्हारे ।
जाइयो पाछे विदेस भले करि
लेन दे भेंट सखीन सों प्यारे ।

 पीवै सदा अधरामृत स्याम को

पीवै सदा अधरामृत स्याम को
भागन याको सुजात कहा है ।

तबै मुधि मूल वहाँ है ।
छूटै सबै धन-धाम अली हिय
व्याकुलता सुनि होत महा है ।
बेनु के बंस भई बँसुरी जो
अनर्थ करै तो अचर्ज कहा है ।

 लै बदनामी कलंकिनि होइ चवाइन

लै बदनामी कलंकिनि होइ चवाइन
को कब लौं मुख चाहिए ।
सासु जेठानिन की इनकी उनकी
कब लौं सहि कै जिय दाहिए ।
ताहु पै एति रुखाई पिया ‘हरिचंद’
की हाय न क्यौंहूँ सराहिए ।
का करिए मरिए केहि भाँतिन नेह
को नातो कहाँ लौं निबाहिए ।

लखिकै अपने घर को निज सेवक

लखिकै अपने घर को निज सेवक
भी सबै हाथ सदा धरिहैं ।
हल सों सब दूषन खैंचि झटै
सब बैरिन मुसल सों मरिहैं ।
अनुजै प्रिय जो सो सदा उनको प्रिय
कारज ताको न क्यौं सरिहै ।
जिनके रछपाल गोपाल धनी
तिनको बलभद्र सुखी करिहै ।

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