सलोक-गुरू तेग बहादुर साहिब-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Guru Teg Bahadur Sahib 3

सलोक-गुरू तेग बहादुर साहिब-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Guru Teg Bahadur Sahib 3

जिहि बिखिआ सगली तजी लीओ भेख बैराग ॥
कहु नानक सुनु रे मना तिह नर माथै भागु ॥17॥

जिहि माइआ ममता तजी सभ ते भइओ उदासु ॥
कहु नानक सुनु रे मना तिह घटि ब्रहम निवासु ॥18॥

जिहि प्रानी हउमै तजी करता रामु पछानि ॥
कहु नानक वहु मुकति नरु इह मन साची मानु ॥19॥

भै नासन दुरमति हरन कलि मै हरि को नामु ॥
निसि दिनु जो नानक भजै सफल होहि तिह काम ॥20॥

जिहबा गुन गोबिंद भजहु करन सुनहु हरि नामु ॥
कहु नानक सुनि रे मना परहि न जम कैधाम ॥21॥

जो प्रानी ममता तजै लोभ मोह अहंकार ॥
कहु नानक आपन तरै अउरन लेत उधार ॥22॥

जिउ सुपना अरु पेखना ऐसे जग कउ जानि ॥
इन मै कछु साचो नही नानक बिनु भगवान ॥23॥

निसि दिनु माइआ कारने प्रानी डोलत नीत ॥
कोटन मै नानक कोऊ नाराइनु जिह चीति ॥24॥

जैसे जल ते बुदबुदा उपजै बिनसै नीत ॥
जग रचना तैसे रची कहु नानक सुनि मीत ॥25॥

प्रानी कछू न चेतई मदि माइआ कै अंधु ॥
कहु नानक बिनु हरि भजन परत ताहि जम फंध ॥26॥

Leave a Reply