सलोक -गुरू अंगद देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Angad Dev Ji 3

सलोक -गुरू अंगद देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Angad Dev Ji 3

एह किनेही दाति आपस ते जो पाईऐ ॥

एह किनेही दाति आपस ते जो पाईऐ ॥
नानक सा करमाति साहिब तुठै जो मिलै ॥1॥475॥

आपे साजे करे आपि जाई भि रखै आपि

आपे साजे करे आपि जाई भि रखै आपि ॥
तिसु विचि जंत उपाइ कै देखै थापि उथापि ॥
किस नो कहीऐ नानका सभु किछु आपे आपि ॥2॥475॥

जिनी चलणु जाणिआ से किउ करहि विथार

जिनी चलणु जाणिआ से किउ करहि विथार ॥
चलण सार न जाणनी काज सवारणहार ॥1॥787॥

जिना भउ तिन्ह नाहि भउ मुचु भउ निभविआह

जिना भउ तिन्ह नाहि भउ मुचु भउ निभविआह ॥
नानक एहु पटंतरा तितु दीबाणि गइआह ॥1॥788॥

पहिल बसंतै आगमनि तिस का करहु बीचारु

पहिल बसंतै आगमनि तिस का करहु बीचारु ॥
नानक सो सालाहीऐ जि सभसै दे आधारु ॥2॥791॥

मिलिऐ मिलिआ ना मिलै मिलै मिलिआ जे होइ

मिलिऐ मिलिआ ना मिलै मिलै मिलिआ जे होइ ॥
अंतर आतमै जो मिलै मिलिआ कहीऐ सोइ ॥3॥791॥

नानक अंधा होइ कै रतना परखण जाइ

नानक अंधा होइ कै रतना परखण जाइ ॥
रतना सार न जाणई आवै आपु लखाइ ॥1॥954॥

रतना केरी गुथली रतनी खोली आइ

रतना केरी गुथली रतनी खोली आइ ॥
वखर तै वणजारिआ दुहा रही समाइ ॥
जिन गुणु पलै नानका माणक वणजहि सेइ ॥
रतना सार न जाणनी अंधे वतहि लोइ ॥2॥954॥

नानक चिंता मति करहु चिंता तिस ही हेइ

नानक चिंता मति करहु चिंता तिस ही हेइ ॥
जल महि जंत उपाइअनु तिना भि रोजी देइ ॥
ओथै हटु न चलई ना को किरस करेइ ॥
सउदा मूलि न होवई ना को लए न देइ ॥
जीआ का आहारु जीअ खाणा एहु करेइ ॥
विचि उपाए साइरा तिना भि सार करेइ ॥
नानक चिंता मत करहु चिंता तिस ही हेइ ॥1॥955॥

साह चले वणजारिआ लिखिआ देवै नालि

साह चले वणजारिआ लिखिआ देवै नालि ॥
लिखे उपरि हुकमु होइ लईऐ वसतु सम्हालि ॥
वसतु लई वणजारई वखरु बधा पाइ ॥
केई लाहा लै चले इकि चले मूलु गवाइ ॥
थोड़ा किनै न मंगिओ किसु कहीऐ साबासि ॥
नदरि तिना कउ नानका जि साबतु लाए रासि ॥1॥1238॥

सिफति जिना कउ बखसीऐ सेई पोतेदार

सिफति जिना कउ बखसीऐ सेई पोतेदार ॥
कुंजी जिन कउ दितीआ तिन्हा मिले भंडार ॥
जह भंडारी हू गुण निकलहि ते कीअहि परवाणु ॥
नदरि तिन्हा कउ नानका नामु जिन्हा नीसाणु ॥2॥1239॥

वैदा वैदु सुवैदु तू पहिलां रोगु पछाणु

वैदा वैदु सुवैदु तू पहिलां रोगु पछाणु ॥
ऐसा दारू लोड़ि लहु जितु वंञै रोगा घाणि ॥
जितु दारू रोग उठिअहि तनि सुखु वसै आइ ॥
रोगु गवाइहि आपणा त नानक वैदु सदाइ ॥2॥1279॥

नानक दुनीआ कीआं वडिआईआं अगी सेती जालि

नानक दुनीआ कीआं वडिआईआं अगी सेती जालि ॥
एनी जलीईं नामु विसारिआ इक न चलीआ नालि ॥2॥1290॥

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