सर्वस्वान्त-किसान -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Kisan

सर्वस्वान्त-किसान -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Kisan

सर्वस्वान्त

कुलवन्ती! क्या करूँ? पिता भी चल दिये!
हम दोनों रह गये यातना के लिए।
छोड़ हमें प्रतिबिम्ब सदृश अपना यहाँ,
वे दोनों किस लिए जा छिपे हैं कहाँ? ॥1॥

सहदय पाठक! सुना सुना कर निज कथा-
तुमको देना नहीं चाहता मैं व्यथा।
बस तुम रोको मुझे न रोने से अहो!
करके इतनी कृपा सदा सुख से रहो ॥2॥

हा! मैं रोऊँ जो न आज तो क्या करूँ?
इस ज्वाला में धैर्य और कैसे धरूँ?
दो बूँदें भी दग्ध हृदय को दूँ न मैं?
मानव ही हूँ, शिला-खण्ड तो हूँ न मैं! ॥3॥

रोऊँ किसके निकट? उन्हीं भगवान के-
दाता जो सुख और दुःख के दान के।
क्या इससे भी हानि किसी की है कहीं?
यदि है तो वह मनुज नहीं, पशु भी नहीं ॥4॥

प्रकृत कथा, पर कहाँ? प्रकृतपन खो गया,
अनहोनी का यहाँ आक्रमण हो गया!
दुख में सुख का योग सर्वदा को गया,
गया न परिकर सहित हाय! क्यों जो गया? ॥5॥

कुलवन्ती ने कहा-“भाग्य में था यही,
अनहोनी भी इसी लिए होकर रही।
जाते हम भी वहीं गये हैं वे जहाँ,
कौन हमारे कर्म भोगता फिर यहाँ? ॥6॥

हमको उनके बिना भले ही गति न हो,
पर जीने में उन्हें कौन सुख था अहो!
सौख्य न भी हो, मिटे मरण से कष्ट ही,
तो यों उनका कष्ट हुआ है नष्ट ही ॥7॥

‘कुछ दिन से क्यों भूख हमारी मर रही’?
खाते थे अधपेट सदा कह कर यही।
यह मिस था इस लिए कि हम अफरे रहें,
ईश्वर! ऐसे कष्ट न वैरी भी सहें ॥” ॥8॥

हाय! हमारे लिए पिता भूखों मरे,
इसी लिए उत्पन्न हुआ था मैं हरे!
जननी! जननी! स्नेहमयी जननी! हहा।
इसीलिए था प्रसव-कष्ट तू ने सहा? ॥9॥

सब होना चाहते पुत्र से हैं सुखी,
पर तुम उलटे हुए हाय! मुझ से दुखी!
और दुखी ऐसे कि विवश मरना पड़ा,
सह सकता था कष्ट कौन ऐसा कड़ा! ॥10॥

जाओ, तब हे जननि! जनक! जाओ वहाँ-
शान्त हो सके घोर जगज्ज्वाला जहाँ।
सबकी सबके साथ जहाँ ममता रहे,
कभी विषमता न हो, सदा समता रहे ॥11॥

कुलवन्ती ने कहा कि-“अब धीरज धरो,
जिसमें यह संसार चले ऐसा करो।
और किसे अब यहाँ हमारा ध्यान है?
ऊपर नीचे वही एक भगवान है ॥12॥

हुआ सामना आज सही, मँझधार का,
पता नहीं है किसी ओर भी पार का।
फिर भी आओ, बने जहाँ तक हम तरें,
प्रभु चाहें तो पार हमें अब भी करें ॥3॥

मन को रोको, शोक सहन होगा तभी,
उद्यत हो, यह भार वहन होगा तभी।
अपनी चिन्ता नहीं, मिला जो था दिया,
पर क्या देंगे उन्हें कि जिन से है लिया?” ॥14॥

हैं बस मेरे प्राण, जिसे अब चाह हो,
जमींदार ही हो कि महाजन साह हो।
यों कह कर मैं मौन हो गया आप ही,
वह भी बोली नहीं, रही चुप चाप ही ॥15॥

किन्तु उसी का कथन सर्वथा ठीक था,
मेरा यह आक्षेप नितान्त अलीक था।
कुछ भी हो, संसार आप चलता नहीं,
मर जाओ, पर प्रकृति-नियम टलता नहीं ॥16॥

जलता है यदि हृदय तुम्हारा तो जले,
खलता है यदि खान-पान भी तो खले।
करना होगा काम छटपटाते हुए,
डूबो भी तो हाथ फटफटाते हुए! ॥17॥

लेकर गाड़ी-बैल खेत पर मैं गया,
हुआ हृदय का शोक वहाँ से फिर नया।
कण कण में था पिता-स्मरण ही उग रहा,
उसे सींचता हुआ नेत्र-जल फिर बहा! ॥18॥

लगा लोटने शून्य देख सब ओर मैं
सहकर भी यों शोक मरा न कठोर मैं।
मरता कैसे, अभी और भी भोग था,
मृत्यु दूर थी और मानसिक रोग था! 19॥

पानी था कुछ बरस गया इस बीच में,
पर वह हमको और फँसाने कीच में।
घर में था जो अन्न उसे भी खो दिया,
गया बीज वह व्यर्थ कि जो था बो दिया! ॥20॥

एक बार ही बरस पयोद चले गये
विधि से भी हम दीन किसान छले गये!
वर्षा में ही हुआ शरद का वास था,
करता मानों धवल चन्द्र उपहास था! ॥21॥

आशांकुर भी गये काल-पशु से चरे,
पीले पड़ने लगे खेत जो थे हरे।
दृग न सूखना देख सके, बरसे सही,
किन्तु धरा की गोद रीत कर ही रही! ॥22॥

जहाँ कुएँ थे वहाँ परोहे भी चले,
पर सौ में दो चार खेत फले-फले।
मैं क्या करता? प्राण छटपटाने लगे,
नहरों वाले गाँव याद आने लगे! ॥23॥

यह दुकाल था, देश हुआ उत्सन्न-सा,
भुस-चारा भी चढ़ा तुला पर अन्न-सा!
ऋण-दाता भी और न धीरज धर सके,
बहुत दया की थी, न और फिर कर सके! ॥24॥

साह, महाजन, जमींदार तीनों ठने,
वात, पित्त, कफ सन्निपात जैसे बने!
पन्द्रह दूनी तीस साह ने भी किये,
मौके पर थे दिये पुलिस-प्रभु के लिए! ॥25॥

सन्ध्या थी उस समय तामसिक याम था,
आया “कुड़क अमीन,” मुझी से काम था।
बस, मेरापन आत्म-भाव खोने लगा,
जो कुछ था वह सभी कुर्क होने लगा! ॥26॥

अविकृत-सा मैं बना घोर गम्भीर था,
मन जड़-सा था और अकम्प शरीर था।
सभी ओर से बद्ध हुआ-सा मैं रहा,
मानो शोणित भी न नाड़ियों में बहा! ॥27॥

कुलवन्ती से कहा गया-“गहने कहाँ”?
थी चाँदी की एक मात्र हँसली वहाँ।
जब तक उसे अमीन छीनने को कहे-
उसने आप उतार दिया, ऋण क्यों रहे ॥28॥

हुआ काम भी और रहा कानून भी,
नजराने में क्या न जमेगी दून भी!
दल-बल-सहित अमीन गया सानन्द ही,
मैं कुलवन्ती-सहित रहा निस्पन्द ही ॥29॥

आँगन में यम-मूर्ति यामिनी आ गयी,
घर के भीतर अटल अँधेरी छा गयी।
लाख लाख नक्षत्र-नयन नभ खोल कर-
हमें देखने लगा न कुछ भी बोल कर ॥30॥

देख, दैव! तू देख, हमारे नाश को,
देखा मैंने एक बार आकाश को।
तत्क्षण मुँह पर दिया थपेड़ा वायु ने,
साथ न छोड़ा किन्तु अभागी आयु ने! ॥31॥

कुलवन्ती भी उठी निकट आयी तथा,
बोली-“अब” बस, कह न सकी फिर कुछ कथा।
लिपट गयी वह फूट फूट कर रो उठी,
मैं भी रोया, विषम वेदना हो उठी ॥32॥

ऐसे निर्दय भाव भरे हैं वित्त में!
एक वार ही लगी आग-सी चित्त में।
बोला मैं-अब हैं स्वतन्त्र दोनों जने-
मैं शिव हूँ, तू शक्ति, देश मरघट बने ॥33॥

नहीं, नहीं, शिव नहीं, बनूँगा रुद्र मैं,
जानेंगे सब लोग नहीं हूँ क्षुद्र मैं।
पुलिस मुझे थी व्यर्थ लुटेरा कह रही,
देखे अब वह शीघ्र कि हाँ, मैं हूँ वही ॥34॥

आप लुटेरे, और बनाते हैं हमें,
लुटवाते हैं आप, सताते हैं हमें।
करते हैं बदनाम सभ्य सरकार को,
करती है जो दूर सदा अविचार को ॥35॥

जमादार वह कहाँ? आज पकड़े मुझे,
आवे, आकर यहाँ आज जकड़े मुझे।
जिन पन्द्रह के तीस मुझे देने पड़े-
खटकेंगे आ-मरण कलेजे में अड़े ॥36॥

यदि मैं डाकू बनूँ, मुझे क्या दोष है?
दोषी है तो पुलिस, उसी पर रोष है।
जमींदार भी कु-फल किये का पायगा,
झूठे रुक्के फिर न कभी लिखवायगा ॥37॥

और महाजन? कर्ज लिया उससे सही,
किन्तु व्याज की लूट नहीं जाती सही।
मुझ से मेरे बन्धु न लुटने पायँगे,
वही लुटेंगे जो कि लूटने जायँगे ॥38॥

मैं क्या क्या कह गया न जाने, रोष से,
गूंज उठा घर घोर घटा-से घोष से।
मन में आया, आग लगा दूँ मैं अभी,
इसी गेह से भभक उठे भारत सभी! ॥39॥

कुलवन्ती डर गयी, कष्ट पाती हुई-
बोली कातर गिरा गिड़गिड़ाती हुई-
“हाहा खाती हूँ, न हाय! तुम यों कहो,
शान्त रहो, दुर्भाग्य जान कर सब सहो ॥40॥

न लो लूट का नाम, पाप है पाप ही,
फल पावेंगे सभी किये का आप ही।
छोड़ो बुरे विचार पाप-प्रतिकार के,
न्यायालय हैं खुले हुए सरकार के ॥41॥

कोई हो, जब दोष सिद्ध हो जायगा,
दण्ड पायगा, कभी न बचने पायगा।
प्रभु के घर भी न्याय और सु-विचार है,
भला, दण्ड का हमें कौन अधिकार है? ॥42॥

पर न रहो अब यहाँ, ठौर भी है कहाँ;
चलो, चलें, ले जाय भाग्य अपना जहाँ।
सास-ससुर के फूल तीर्थ में छोड़ कर-
माँगूंगी मैं क्षमा वहाँ कर जोड़ कर ॥43॥

गंगा मैया दया करेगी अन्त में,
सारे दुख-सन्ताप हरेगी अन्त में।
भाग्य हमारे बुरे, किसी ने क्या किया?
हरि ने भी वनवास एक दिन था लिया! ॥44॥

आग लगे क्यों, और देश भी क्यों जले;
सुखी रहे वह और सदा फूले-फले।
भूमि बहुत है, कहीं ठौर पा जायेंगे,
प्रभु देंगे तो कभी सु-दिन भी पायेंगे ॥45॥

तुम मेरे सर्वस्व, मुझे मत छोड़ियो,
विचलित हो कर नियम न कोई तोड़ियो।”
यों कह कर वह मुझे पकड़ कर रह गयी,
गद्गद होती हुई जकड़ कर रह गयी! ॥46॥

कुलवन्ती! हे प्रिये! शान्त हो, शान्त हो,
चलो जहाँ पर मनुज न हों, एकान्त हो।
तू ही मेरी एक मात्र है सम्पदा,
दीप-शिखा-सी मार्ग दिखाती रह सदा ॥47॥

था मैं भी सावेग उसे पकड़े खड़ा,
इसी समय कुछ शब्द द्वार पर सुन पड़ा।
साँकल खटकी और सिपाही ने कहा-
बेगारी चाहिए, निकल, क्या कर रहा! ॥48॥

बेगारी? क्या नहीं आज भी मुक्ति है?
बचने की अब यहाँ कौन सी युक्ति है?
छूटे अब तो पिण्ड, देश हम छोड़ते,
सब से निज सम्बन्ध सदा को तोड़ते! ॥49॥

यम के रहते हुए हाय! ऐसी व्यथा?
पूरी हो क्या यहीं अधूरी यह कथा?
दयानिधे; क्या दया तुम्हारी चुक गयी?
और अधिक क्या कहूँ, गिरा भी रुक गयी! ॥50॥

 

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