सरे-वादी-ए-सीना-सरे-वादी-ए-सीना -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz 

सरे-वादी-ए-सीना-सरे-वादी-ए-सीना -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

(अरब-इसराईल जंग, सन १९६७, के बाद)

1. फिर बर्क फ़रोज़ां है सरे-वादी-ए-सीना

फिर बर्क फ़रोज़ां है सरे-वादी-ए-सीना
फिर रंग पे है शोला-ए-रुख़सारे-हकीकत
पैग़ामे-अज़ल, दावते-दीदारे-हकीकत

ऐ दीद-ए-बीना
अब वक़्त है दीदार का, दम है कि नहीं है
ऐ जज़बए-दिल, दिल भरम है कि नहीं है
अब कातिले-जां चारागरे-कुलफ़ते-ग़म है
गुलज़ारे-इरम, परतवे-सहरा-ए-अदम है
पिन्दारे-जुनूं, हौसलए-राहे-अदम है कि नहीं है

2. फिर बर्क फ़रोज़ां है सरे-वादीए-सीना

फिर बर्क फ़रोज़ां है सरे-वादीए-सीना
ऐ दीद-ए-बीना
फिर दिल को मुसफ़्फ़ा करो, इस लौह पे शायद
माबैने-मनो-तू, नया पैमां कोई उतरे
अब रसमे-सितम, हिकमते-ख़ासाने-ज़मीं है
ताईदे-सितम, मसलहते-मुफ़ती-ए-दीं है
अब सदियों के इकरारे-इतायत को बदलने
लाज़िम है कि इनकार का फ़रमां कोई उतरे

3. सुनो कि शायद यह नूरे-सैकल

सुनो कि शायद यह नूरे-सैकल
है उस सहीफ़े का हरफ़े-अव्वल
जो हर कसो-नाकसे-ज़मीं पर
दिले-गदायाने-अजमई पर
उतर रहा है फ़लक से अबके,
सुनो कि इस हरफ़े-लये-अज़ल के
हमीं तुमहीं बन्दगाने-बेबस
अलीम भी हैं, ख़बीर भी हैं
सुनो कि हम बेज़ुबान-ओ-बेकस
बशीर भी हैं, नज़ीर भी हैं

हर इक औला-इल-अमर को सदा दो
कि अपने फ़रदे-अमल संभाले
उठेगा जब जंमे-सरफ़रोशां
पड़ेंगे दार-ओ-रसन के लाले
कोई न होगा कि जो बचा ले
जज़ा, सज़ा, सब यहीं पे होगी
यहीं अज़ाब-ओ-सवाब होगा
यहीं से उट्ठेगा शोरे-महशर
यहीं पे रोज़े-हिसाब होगा

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