सरे-मकतल कव्वाली-दस्ते सबा -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Faiz Ahmed Faiz

सरे-मकतल कव्वाली-दस्ते सबा -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Faiz Ahmed Faiz

कहां है मंज़िले-राहे-तमन्ना हम भी देखेंगे
ये शब हम पर भी गुज़रेगी, ये फ़रदा हम भी देखेंगे
ठहर ऐ दिल, जमाले-रू-ए-ज़ेबा हम भी देखेंगे

ज़रा सैकल तो हो ले तशनगी बादागुसारों की
दबा रक्खेंगे कब तक जोशे-सहबा हम भी देखेंगे
उठा रक्खेंगे कब तक जामो-मीना हम भी देखेंगे

सला आ तो चुके महफ़िल में उस कू-ए-मलामत से
किसे रोकेगा शोरे-पन्दे-बेजा हम भी देखेंगे
किसे है जाके लौट आने का यारा हम भी देखेंगे

चले हैं जानो-ईमां आज़माने आज दिलवाले
वो आयें लशकरे-अग़यारो-आदा हम भी देखेंगे
वो आयें तो सरे-मकतल, तमाशा हम भी देखेंगे

ये शब की आख़िरी साअत गरां कैसी भी हो हमदम
जो इस साअत में पिनहां है उजाला हम भी देखेंगे
जो फ़रके-सुबह पर चमकेगा तारा हम भी देखेंगे

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