सम्राज्ञी का आगमन-कविता-नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta 

सम्राज्ञी का आगमन-कविता-नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta

 

प्राची के दुर्ग-कपाट खोलकर
आकाश के नीलम-प्रासाद में
यह कौन गंधर्व-व्यक्तित्व
भैरवी-राग-सा आकर खड़ा हो गया है?
याम और पल की
छोटी-छोटी संगमरमरी सीढ़ियाँ चढ़ते
इस वसंत-वर्णी राग-कन्या की
समुद्रों पर परछाईं पड़ रही है।
और उफनाता समुद्र-जल गुलाल ही गुलाल हो उठा है।
पक्षियों को देखो—
सम्राज्ञी के इस आगमन को
वृक्षों से आकाश।
और आकाश से वृक्षों में उड़ते हुए—
पंखों से पहुँचा रहे हैं,
शब्दों से लिख रहे हैं।
कैसा है यह प्रकृति का भाषाई उत्साह, कि
पूरा प्रातःकाल पाठशाला बन गया है।

कितना विशाल है।
दैवीयता का यह केतन कि—
आकाश छोटा पड़ गया है
और क्षितिज के वहाँ यह चीनांशुक
राजस असावधानी में
समुद्र में गीला हुआ जा रहा है।
सम्राज्ञी!
पूरे दिन यह पृथिवी।
तुम्हारी इस भूषा को
शाद्वल मैदानों, वृक्षों और पर्वतों पर फैलाकर सुखाएगी
ताकि तुम्हारे लौटने की वेला तक
इन्हीं वर्ण-गंधों में
तुम्हें यह राजवस्त्र क्षितिज पर रखा मिले
और तुम पश्चिम के कपाट बंद करते समय भी
आद्यंत गरिमापूर्ण सम्राज्ञी ही लगो।

भव्यता की यही प्रकृति होती है कि—
होती वह सुदूर आकाश में है
पर प्रतिफलित निकटतम पृथिवी पर होती है।

 

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