सम्भ्रम-देखना एक दिन-नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta

सम्भ्रम-देखना एक दिन-नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta

 

उस दिन
चन्द्रोदय की साक्षी में
उड़ती जंगली हवाओं के बीच
हमारी गुँथी अँगुलियों में
कैसे एक राग-फूल ने जन्म लिया था।
देवताओं ने तो नहीं
पर आकाश
जरूर कुछ-कुछ पुष्प वर्षा करता लग रहा था।

पर
आज तुम
अपने थरथराते व्यक्तित्त्व से उपस्थित
ऐसी लग रही थीं
जैसे तुमने
अपनी अँगुलियों पर से ही नहीं
उस राग-स्पर्श को पोंछ डाला है
बल्कि वे सुगन्धित अँगुलियाँ ही
अपने स्वत्त्व पर से उतार दी हैं
और ऋतु-स्नान किये
नयी अँगुलियाँ धारे
सम्भ्रम में आधे खुले द्वार में
लिखी हुई खड़ी हो, जैसे
कोई अपरिचिता।

 

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