समापन-अन्धा युग-पहला अंक- धर्मवीर भारती-HindiPoetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dharamvir Bharati

समापन-अन्धा युग-पहला अंक- धर्मवीर भारती-HindiPoetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dharamvir Bharati

प्रभु की मृत्यु

वंदना

तुम जो हो शब्द-ब्रह्म, अर्थों के परम अर्थ
जिसका आश्रय पाकर वाणी होती ना व्यर्थ
है तुम्हे नमन, है उन्हे नमन
करते आये हैं जो निर्मन मन
सदियों से लीला का गायन
हरि के रहस्यमय जीवन की;
है जरा अलग वह छोटी-सी
मेरी आस्था की पगडंडी
दो मुझे शब्द, दो रसानुभव, दो अलंकरण
मैं चित्रित करूँ तुम्हारा करुण रहस्य-मरण
कथा गायन- वह था प्रभास वन-क्षेत्र, महासागर-तट पर
नभचुम्बी लहरें रह-रह खाती थीं पछाड़
था घुला समुद्री फेन समीर झकोरों से
बह चली हवा, वह खड़-खड़-खड़ कर उठे ताड़
थी वन तुलसा की गंध वहाँ, था पावन छायामय पीपल
जिसके नीचे धरती पर बैठे ते प्रभु शान्त, मौन, निश्चल
लगता था कुछ-कुछ थका हुआ वह नील मेघ सा तन साँवल
माला के सबसे बड़े कमल में बची एक पँखुरी केवल
पीपल के दो चंचल पातों की छायाएँ
रह-रहकर उनके कंचन माथे पर हिलती थीं
वे पलकें दोनों तन्द्रालस थीं, अधखुल थीं
जो नील कमल की पाँखुरियों-सी खिलती थीं
अपनी दाहिनी जाँघ पर रख
मृग के मुख जैसा बाँया पग
टिक गये तने से, ले उसाँस
बोले ‘ कैसा विचित्र था युग!’
( पर्दा खुलता है। भयंकरतम रूप वाला अश्वत्थामा प्रवेश करता है।)

अश्वत्थामा

झूठे हैं ये स्तुति वचन, ये प्रशंसा-वाक्य
कृष्ण ने किया है वही
मैंने किया था जो पांडव-शिविर में
सोया हुआ नशे में डूबा व्यक्ति
होता है एक-सा
उसने नशे में डूबे अपने बन्धुजनों की
की है व्यापक हत्या
देख अभी आया हूँ
सागर तट की उज्वल रेती पर
गाढ़े-गाढ़े काले खून में सने हुए
यादव योद्धाओं के अगणित शव बिखरे हैं
जिनको मारा है खुद कृष्ण ने
उसने किया है वही
मैंने जो किया था उस रात
फर्क इतना है
मैंने मारा था शत्रुओं को
पर उसने अपने ही वंश वालों को मारा है।
वह है अस्वत्थ वृक्ष के नीचे बैठा वहाँ
शक्तिक्षीण, तेजहीन, थका हुआ
उससे पूछूँगा मैं
यह जो करोड़ों यमलोकों की यातना
कुतर रही है मेरे मांस को
क्यों ये जख्म फूट नहीं पड़ते हैं
उसके कमल तन पर?
(पीछे की ओर से चला जाता है। एक ओर संजय घिसटता हुआ आता है।)

 

संजय

मैंने कहा था कभी
मुझको मत बाँहें दो फिर भी मैं घेरे रहूँगा तुम्हें
मुझको मत नयन दो फिर भी देखता रहूँगा
मुझको मत पग दो लेकिन तुम तक मैं
पहुँच कर रहूँगा प्रभु!
आज वह सारा अभिमान मेरा टूट गया।
जीवन भर रहा मैं निरपेक्ष सत्य
कर्मों में उतरा नहीं
धीरे-धीरे खो दी दिव्य दृष्टि
उस दिन वन के उस भयानक अग्निकांड में
घुटने भी झुलस गये!
( पीछे की ओर विंग्स के पास एक व्याध आकर बैठ जाता है और तीर चढ़ाकर लक्ष्य संधान करता है।)

 

कथा-गायन

(धीमे स्वरों में)
कुछ दूर कँटीली छाड़ी में
छिप कर बैठा था एक व्याध
प्रभु के पग को मृग वदन समझ
धनु लक्ष्य था रहा साध।

संजय

(सहसा उधर देखकर)
ठहरो, ओ ठहरो।
आह! सुनता नहीं
ज्योति बुझ रही है वहाँ
कैसे मैं पहुँचूँ अश्वत्थ वृक्ष के नीचे
घिसट-घिसट कर आया हूँ सैंकड़ों कोस…
( व्याध तीर छोड़ देता है। एक ज्योति चमक कर बुझ जाती है। वंशी की एक तान हिचकियों की तरह बार बार उठकर टूट जाती है। अश्वत्थामा का अट्टाहास। संजय चीत्कार कर अर्धमूर्छित-सा गिर जाता है, अँधेरा…)

कथा-गायन

बुझ गये सभी नक्षत्र, छा गया तिमिर गहन
वह और भयंकर लगने लगा भयंकर वन
जिस क्षण प्रभु ने प्रस्थान किया
द्वापर युग बीत गया उस क्षण
प्रभुहीन धरा पर आस्थाहत
कलियुग ने रक्खा प्रथम चरण
वह और भयंकर लगने लगा भयंकर वन।
(अश्वत्थामा का प्रवेश)

अश्वत्थामा

केवल मैं साक्षी हूँ
मैंने ताड़ों के झुरमुट में छिप कर देखी है
उसकी मृत्यु
तीखी-नुकीली तलवारों से
झोंकों में हिलते ताड़ के पत्ते,
मेरे पीप भरे जख्मों को चीर रहे थे
लेकिन सांसें साधे मैं खड़ा था मौन।
( सहसा आर्त स्वर में)
लेकिन हाय मैंने यह क्या देखा
तलवों में वाण बिंधते ही
पीप भरा दुर्गंधित नीला रक्त
वैसा ही बहा
जैसा इन जख्मों से अक्सर बहा करता है
चरणों में वैसे ही घाव फूट निकले…
सुनो, मेरे शत्रु कृष्ण सुनो!
मरते समय क्या तुमने इस नरपशु अश्वत्थामा को
अपने ही चरणों पर धारण किया
अपने ही शोणित से मुझको अभिव्यक्त किया?
जैसे सड़ा रक्त निकल जाने से
फोड़े की टीस पटा जाती है
वैसे ही मैं अनुभव करता हूँ विगत शोक
यह जो अनुभूति मिली है
क्या यह आस्था है?
यह जो अनुभूति मिली है
क्या यह आस्था है ?
( युयुत्सु का दुरागत स्वर)

युयुत्सु

सुनता हूँ किसका स्वर इन अंधलोकों में
किसको मिली है नयी आस्था ?
नरपशु अश्वत्थामा को?
( अट्टाहास)
आस्ता नामक यह घिसा हुआ सिक्का
अब मिला अश्वत्थामा को
जिसे नकली और खोटा समझकर मैं
कूड़े पर फेंक चुका हूँ वर्षों पहले!

संजय

यह तो वाणी है युयुत्सु की
अंधे प्रेतों की तरह भटक रहा जो अंतरिक्ष में।
( युयुत्सु अंधे प्रेत के रूप में प्रवेश करता है।)

युयुत्सु

मुझको आदेश मिला
’ तुम हो आत्मघाती, भटकोगे अन्धलोकों में !’
धरती से अधिक गहन अन्धलोक कहाँ है ?
पैदा हुआ मैं अन्धेपन से
कुछ दिन तक कृष्ण की झूठी आस्था के
ज्योतिवृत्त में भटका
किन्तु आत्महत्या का शिलाद्वार खोल कर
वापस लौटा मैं अन्धी गहन गुफाओं में!
आया था मैं भी देखने
यह महिमामय मरण कृष्ण का
जीकर वह जीत नहीं पाया अनास्था
मरने का नाटक कर वह चाहता है
बाँधना हमको
लेकिन मैं कहता हूँ
वंचक था, कायर था, शक्तिहीन था वह
बचा नहीं पाया परीक्षित को या मुझको
चला गया अपने लोक,
अंधे युग में जब-जब शिशु भविष्य मारा जायेगा
ब्रह्मास्त्र से
तक्षक डसेगा परीक्षित को
या मेरे जैसे कितने युयुत्सु
कर लेंगे आत्मघात
उनको बचाने कौन आयेगा
क्या तुम अश्वत्थामा?
तुम तो अमर हो ?

अश्वत्थामा

किंतु मैं हूँ अमानुषिक अर्द्धसत्य
तर्क जिसका है घृणा और स्तर पशुओं का है।

युयुत्सु

तुम संजय
तुम तो हो आस्थावान ?

संजय

पर मैं तो हूँ निष्क्रिय
निरपेक्ष सत्य
मार नहीं पाता हूँ
बचा नहीं पाता हूँ
कर्म से पृथक
खोता जाता हूँ क्रमशः
अर्थ अपने अस्तित्व का।

युयुत्सु

इसीलिए साहस से कहता हूँ
नियति हमारी बँधी प्रभु के मरण से नहीं
मानव भविष्य से!
कैसे बचेगा वह ?
कैसे बचेगा वह ?
मेरा यह प्रश्न है
प्रश्न उसका जिसने
प्रभु के पीछे अपने जीवन भर
घृणा सही !
कोई भी आस्थावान शेष नहीं है
उत्तर देने को ?
(वृद्ध याचक हाथ में धनुष लिए प्रवेश करता है।)
व्याध- मैं हूँ शेष उत्तर देने को अभी।

युयुत्सु

तुम हो कौन ?
दीख नहीं पड़ता है!
व्याध- अब मैं वृद्ध व्याध हूँ
नाम मेरा जरा है
वाण है वह मेरे ही धनुष का
जो मृत्यु बना कृष्ण की
पहले मैं ता वृद्ध ज्योतिषी
वध मेरा किया अश्वत्थामा ने
प्रेत-योनि से मुक्त करने को मुझे, कहा कृष्ण ने-
‘हो गयी समाप्त अवधि माता गांधारी के शाप की
उठाओ धनुष
फेंको वाण। ‘
मैं था भयभीत किन्तु वे बोले-
‘अश्वत्थामा ने किया था तुम्हारा वध
उसका था पाप, दण्ड मैं लूँगा
मेरा मरण तुमको मुक्त करेगा प्रेतकाया सो।‘

अश्वत्थामा

मेरा था पाप
किया था मैंने वध
किन्तु हाथ मेरे नहीं वे थे
हृदय मेरा नहीं ता वह
अन्धा युग पैठ गया था मेरी नस-नस में
अन्धी प्रतिहिंसा बन
जिसके पागलपन में मैंने क्या किया
केवल अज्ञात एक प्रतिहिंसा
जिसको तुम कहते हो प्रभु
वह था मेरा शत्रु
पर उसने मेरी पीड़ा भी धारण
कर ली
जख्म हैं बदन पर मेरे
लेकिन पीड़ा सब शान्त हो गई बिल्कुल
मैं दण्डित
लेकिन मुक्त हूँ!

युयुत्सु

होती होगी वधिकों की मुक्ति
प्रभु के मरण से
किन्तु रक्षा कैसे होगी अंधे युग में
मानव भविष्य की
प्रभु के इस कायर मरण के बाद?
अश्वत्तामा- कायर मरण?
मेरा था शत्रु वह
लेकिन कहूँगा मैं
दिव्य शान्ति छायी थी
उसके स्वर्ण मस्तक पर!
वृद्ध- बोले अवसन के क्षणों में प्रभु
”मरण नहीं है ओ व्याध !
मात्र रूपांतरण है यह
सबका दायित्व निभा लिया मैंने अपने ऊपर
अपना दायित्व सौंप जाता हूँ मैं सबको
अब तक मानव भविष्य को मैं जिलाता था
लेकिन इस अंधे युग में मेरा एक अंश
निष्क्रिय रहेगा, आत्मघाती रहेगा
और विगलित रहेगा
संजय, युयुत्सु, अश्वत्थामा की भांति
क्योंकि इनका दायित्व लिया है मैंने!”
बोले वे-
“लेकिन शेष मेरा दायित्व लेंगे
बाकी सभी…
मेरा दायित्व वह स्थित रहेगा
हर मानव मन के उस वृत्त में
जिसके सहारे वह
सभी परिस्थियों का अतिक्रमण करते हुए
नूतन निर्माण करेगा पिछले ध्वंसों पर!
मर्यादापूर्ण आचरण में
नित नूतन सृजन में
निर्भयता के
साहस के
ममता के
रस के
क्षण में
जीवित और सक्रिय हो उठूँगा मैं बार-बार!”

 

अश्वत्थामा

उसके इस नये अर्थ में
क्या हर छोटे से छोटा व्यक्ति
विकृत, अर्धबर्बर, आत्मघाती, अनास्थामय
अपने जीवन की सार्थकता पा जायेगा?
वृद्ध- निश्चय ही !
वे हैं भविष्य
किन्तु हाथ में तुम्हारे हैं।
जिस क्षण चाहो उनको नष्ट करो
जिस क्षण चाहो उनको जीवन दो, जीवन लो!

संजय

किन्तु मैं निष्क्रिय अपंग हूँ!

अश्वत्थामा

मैं हूँ अमानुषिक!

युयुत्सु

और मैं आत्मघाती अन्ध!
( वृद्ध आगे आता है। शेष पात्र धीरे-धीरे हटने लगते हैं। उन्हें छिपाते पीछे का पर्दा गिरता है। अकेला वृद्ध मंच पर रहता है।)

वृद्ध

वे हैं निराश
और अन्धे
और निष्क्रिय
और अर्धपशु
और अँधियारा गहरा और गहरा होता जाता है!
क्या कोई सुनेगा
जो अन्धा नहीं है, और विकृत नहीं है, और
मानव भविष्य को बचायेगा?
मैं हूँ जरा नामक व्याध
और रूपान्तर यह हुआ मेरे माध्यम से
मैंने सुने हैं ये अन्तिम वचन
मरणासन्न ईश्वर के
जिसको मैं दोनों बाँहें उठाकर दोहराता हूँ
कोई सुनेगा!
क्या कोई सुनेगा ?
क्या कोई सुनेगा ?
(आगे का पर्दा गिरने लगता है।)

 

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