समाज-भारत-भारती (वर्तमान खण्ड) -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Bharat-Bharti( Vartman Khand) 

समाज-भारत-भारती (वर्तमान खण्ड) -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Bharat-Bharti( Vartman Khand)

 

समाज

हिन्दू समाज कुरीतियों का केन्द्र जा सकता कहा,
ध्रुव धर्म-पथ में कु-प्रथा का जाल-सा है बिछ रहा।
सु-विचार के साम्राज्य में कु-विचार की अब क्रान्ति है,
सर्वत्र पद पद पर हमारी प्रकट होती भ्रान्ति है ।।२४८।।

 

बेजोड़ विवाह

प्रति वर्ष विधवा-वृन्द की संख्या निरन्तर बढ़ रही,
रोता कभी आकाश है, फटती कभी हिलकर मही।
हा ! देख सकता कौन ऐसे दग्धकारी दाह को?
फिर भी नहीं हम छोड़ते हैं बाल्य-वृद्ध-विवाह को ॥२४९॥

 

अन्ध-परम्परा

सब अंग दूषित हो चुके हैं अब समाज-शरीर के,
संसार में कहला रहे हैं हम फकीर लकीर के !
क्या बाप-दादों के समय की रीतियाँ हम तोड़ दें?
वे रुग्ण हों तो क्यों न हम भी स्वस्थ रहना छोड़ दें ! ॥२५०।।

 

वर-कन्या-विक्रय

बिकता कहीं वर है यहाँ, बिकती तथा कन्या कहीं,
क्या अर्थ के आगे हमें अब इष्ट आत्मा भी नहीं !
हा ! अर्थ, तेरे अर्थ हम करते अनेक अनर्थ हैं-
धिक्कार, फिर भी तो नहीं सम्पन्न और समर्थ हैं? ॥२५१||

क्या पाप का धन भी किसी का दूर करता कष्ट है?
उस प्राप्तकर्ता के सहित वह शीघ्र होता नष्ट है।
आश्चर्य क्या है, जो दशा फिर हो हमारी भी वही,
पर लोभ में पड़कर हमारी बुद्धि अब जाती रही ! ॥२५२।।

 

Leave a Reply