समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 1

समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 1

तुम भी देते हो तोल तोल

तुम भी देते हो तोल-तोल!

नभ से बजली की वह पछाड़,
फिर बूँदें बनना गोल-गोल,
नभ-पति की भारी चकाचौंध,
उस पर बूँदों का मोल-तोल,
बूँदों में विधि के मिला बोल।
तुम भी देते हो तोल-तोल!

भू पर हरितीमा का उभार,
उस पर किसान की काट-छाँट,
हिरनों की उसमें रेल-पेल,
मर्कट-दल की कविता-कुलाँट,
बादल, छवि देते ढोल-ढोल।
तुम भी देते हो तोल-तोल!

टहनी बाहों-सी झूली हो,
हो हवा, किन्तु पथ-भूली हो,
चिडियाँ पंखों से झलती हों,
आँधियाँ कठोर मचलती हों,
मीठे में कड़ुवा घोल-घोल।
तुम भी देते हो तोल-तोल!

(खण्डवा-१९४४)

 लाल टीका

गीत रच कर जब उठा तब स्वप्न बोले—’और बोलो’,
कृष्ण की कालिन्दिनी बोली—’उमड़’ मुझमें डुबो लो!
प्रणय से मीठी मधुर! जब बेड़ियाँ झंकार उट्ठीं
शूलियों ने माँग भर कर कहा, जी में प्यार घोलो।
मैं पथिक युग के जुएँ में दाँव खाकर, स्वप्न धोकर,
आज दिल्ली के किले में तीन जलते दीप बोकर,
सहस अग्नि-स्फुलिंग, बंधन में बँधे, असहाय लख कर,
और चालिस कोटि-वासिनि को निपट वन्ध्या निरख कर—
कह रहा हूँ, हाय तीर–
कमान भी बोझिल हुए!
आज चालिस कोटि के
पशु-प्राण भी बोझिल हुए!
अब न युग से कह सकोगे क्यों लगा दी आग घर में?
गाँव मुर्दों का उजाड़ा, क्यों जगा दी आग घर में?
आज आँखों का नशा चढ़-चढ़, भुजा पर बोलता है,
और अमरों की अखण्ड वसुन्धरा पर डोलता है!
और यह तारुण्य है, ठिठका,–तमाशा देखता है,
जोश में आया कि लिख डाला—“महान विशेषता है!”
प्राण देकर, प्राण लेकर, प्राण का खिलवाड़ सीखें,
हम अपाहिज हैं न, जो माँगें जगत से और भीखें।
पूर्वजों के गीत झूठे
किये प्राणों को बचाकर,
रोटियों के राग गाये,
क्षुधित पुतलों को नचाकर।
बाढ़ आई निम्नगाओं में, न हममें बाढ़ आई;
ग्रीष्म ये लाईं न आँखें, ये फक़त आषाढ़ लाईं!
चल ’सियार किशोर’ सिंहों का ’किले’ में मरण देखें,
तेज भाषा बोल, सब वीरत्व का, आवरण देखें!
और फिर चुपचाप, नौकर हो, भरेगा पेट अपना!
“पीढ़ियाँ बन्धनमयी हैं” भूल वह निःसार सपना!!
प्राण का धन, तू छुपाये रह अमर रंगरेलियों में,
भूल जा माँ बन्दिनी को रोज की अठखेलियों में!
किन्तु अब उस क्षितिज पर
बेमूँछ की सेना निरख तू,
और अपने प्रणय के शव
प्रलय-रथ के तले रख तू।
मातृ-भू के बोझ, जिस दिन सूलियों ने प्राण पाया!
उस दिवस भी क्या तुझे भारत अखण्ड न याद आया?
याद भर आता रहे यह लाल टीका!
तरुण अपनाता रहे यह लाल टीका!!

(खण्डवा-१९४५-
जब दिल्ली के लाल किले में, आज़ाद हिन्द
के सैनिकों पर मुकदमा चल रहा था)

स्मृति का वसन्त

स्मृति के मधुर वसंत पधारो!
शीतल स्पर्श, मंद मदमाती
मोद-सुगंध लिये इठलाती
वह काश्मीर-कुंज सकुचाती
निःश्वासों की पवन प्रचारो
स्मृति के मधुर वसंत पधारो!

तरु दिलदार, साधना डाली
लिपटी नेह-लता हरियाली
वे खारी कलिकाएँ उन पर
तोड़ूँगी, ऋतुराज उभारो
स्मृति के मधुर वसंत पधारो!

तोड़ूँगी? ना, खिलने दूँगी
दो छिन हिलने-मिलने दूँगी
हिला-डुला दूँगी शाखाएँ
चुने विश्व-परिवार उचारो
स्मृति के मधुर वसंत पधारो!

आते हो? वह छबि दरसा दो
रूठा हृदय-चोर हरषा दो
तोड़-तोड़ मुकता बरसा दो
डूबूँ-तैरूँ, सुध न बिसारो
स्मृति के मधुर वसंत पधारो!

दोनों भुजा पकड़ ले पापी!
कलपा मत घनश्याम! कलापी,
कर दो दशों दिशा पागलिनी
ज्ञान-जरा-जर्जरता टारो
स्मृति के मधुर वसंत पधारो!

भीजे अम्बर वाले ख्याली
चढ़ तरुवर की डाली डाली
उड़े चलो मेरे वनमाली!
पागलिनी कह, वहाँ पुकारो
स्मृति के मधुर वसंत पधारो!

नहीं चलो हिल-मिलकर झूलें
बने विहंग, झूलने झूलें
भूलें आप, भुला दें घातक!
भू-मंडल पर स्वर्ग उतारो
स्मृति के मधुर वसंत पधारो!

नहीं, चलो हम हों दो कलियाँ
मुसक-सिसक होवे रंगरलियाँ
राष्ट्रदेव रँग-रँगी सँभालो
कृष्णार्पण के प्रथम पधारो
स्मृति के मधुर वसंत पधारो!

(सिवनी मालवा—१९२२)

 दूध की बूँदों का अवतरण

गो-स्तनों पर घूमने वाली
अँगुलियाँ कह रही थीं!
दूध में मीठा न डालो
उसे अपमानित न कर दो,
प्राण ’थर’ बन तैरते हैं
उन्हें निष्प्राणित न कर दो।

ले मलाई से दृगों के पोर,
गो-स्तन खींच लाये,
बँधे धेनु-किशोर का
अधिकार लूट, उलीच लाये।

दूध की धारा मृदंगिनि
जन्म का स्वर रुदन बोली
कंकणों की मधुर ध्वनि ने
वलय-मयी मिठास घोली।

विवश उनकी रात की
बाँधी, उसाँसें छूटती थीं
दूध की हर बूँद पर, तड़पन
लिये थी, टूटती थी।

और माटी की मटकिया
गोद पर ’घन’ सी बनी थी,
मधुर उजले प्राण भर कर
प्रणय के मन-सी बनी थी।

वन्य-टेकड़ियाँ छहर
दुग्धायमान गुँजार करतीं,
विश्व-बालक को पिलाने
दुग्ध-पारावार भरतीं।

उषा का उजला अँधेरा
तारकों का रूप लेकर
दूध की हर बूँद पर
कुर्बान था, तारुण्य देकर।

दूर पर ठहरे बिना वह
विन्ध्य झरना झर रहा था,
मथनियों के बिन्दु-शिशु-मुख
बोल अपने भर रहा था।

गगन से भूलोक तक यह
अमृत-धारा बह रही थी।
गो-स्तनों पर घूमने वाली
अँगुलियाँ कह रही थीं!

(पातलपानी, विन्ध्य-निवास में-१९४४)

आँसू से

अरे निवासी अन्तरतर के
हृदय-खण्ड जीवन के लाल
त्रास और उपहास सभी में
रहा पुतलियाँ किये निहाल।

संकट में वह गोद, मोद कर
जहाँ टपकता धन्य रहा,
मार-मार में गिर न हठीले
निर्जन है, मैं वन्य रहा।

ठहर जरा तुझ से प्यारे के
चरण कमल धुल जाने दे
और जोर से सिसक सकूँ
वे मंजुल घड़ियाँ आने दे।

(प्रताप प्रेस, कानपुर-१९४४)

अमर-अमर

कलम चल पड़ी, और आज लिखने बैठी हैं युग का जीवन,
विहँस अमरता आ बैठी त्योहार मनाने मेरे आँगन।

पानी-सा कोमल जीवन
बादल-सा बलशाली हो आया,
भू पर मेरी तरुणाई का
हँस-हँस कर अमरत्व सजाया।

जगत ललक कर दौड़ा मेरी
अंगुलियों पर चक्कर खाने,
मेरी साँसों, समय आ गया
युग-प्रभु का अभिमान सजाने।

अमर-अमर कह, झर-झर झरते, बादल ने अभिषेक सजाया,
अमर हो पड़ीं साधें, अमर, अमर जीवन का रस चढ़ आया।

(खण्डवा-१९३२)

गोधूली है

अन्धकार की अगवानिन हँस कर प्रभात सी फूली है,
यह दासी धनश्याम काल की ले चादर बूटों वाली
उढ़ा नाथ को, यह अनाथ होने के पथ में भूली है!
गोधूली है।
टुन-टुन क्वणित, कदम्ब लोक से, ले गायें धीमे-धीमे
रज-पथ-भूषित जग-मुख कर, केसर आँखों जब झूली है।
गोधूली है।
नभ चकचौंधों से घबड़ाती, रवि से कुछ रूठी-रूठी;
नभ-नरेश को उढ़ा, स्वयं ही आत्म-घात-पथ भूली है
डाह भरी के कर में दे दी, तम की सूली है।
गोधूली है।

दृग-जल-जमुना

वे दिन भला किया जो भूले।
दृग-जल-जमुना बढ़ी किन्तु श्यामल वे चरण न पाये,
कोटि-तरंग-बाँह के पंथी, तट-मूर्च्छित फिर आये,
अब न अमित! विभ्रम दे, चल–
चल सखि कालिन्दी कूलें,
वे दिन भला किया जो भूले।
गति ने आकर कभी निहोरा, कभी प्रगति ने पाया,
पंथी! तुम उल्लास भर उठे, विकल नियति ने गाया।
तुमने हृदय निहाल कर दिया
दे सूली के झूले,
वे दिन भला किया जो भूले।
विश्वासों के विष-प्याले दे मधुर! प्रणय-घन पाले,
क्यों ढूँढो हो लाल, पुतलियों पर, निज छबि के छाले!
अब राधा से कहो न माटी
की मूरत पर फूले!
वे दिन भला किया जो भूले।

(इटारसी-१९२७)

 कैदी की भावना

धूल लिपटे हुए हँस-हँस के गजब ढाते हुए,
नंद का मोद यशोदा का दिल बढ़ाते हुए,
दोनों को देखता, दोनों की सुध भुलाते हुए,
बाल घुँघरालों को मटका कर सिर नचाते हुए।
नंद जसोदा, जो वहाँ बैठे थे बतलाते हुए,
साँवला दीख पड़ा हँसता हुआ, आते हुए।
नन्द ने सोचा,–जरा पास तो आजाने दूँ,
जाने वह और न यशोदा चट चुम्मा लूँ,
खींच यशोदा ने लिया, नाथ मुझसे बातें करें,
चूम लूँ कान्ह को चुपचाप कि जब वह गुजरे।
श्याम ने, अपनी तरफ देख ली दोनों की नजर
कुछ गुनगुनाते हुए आने लगा वह नटवर।
दोनों तैयार हैं, किस ओर को पहले झपटूँ?
बाप के कन्धे, या मैय्या के हिये से लपटूँ!
पाया नजदीक, चूमने को बढ़ पड़े दोनों,
प्यार का जोर था ऐसे उमड़ पड़े दोनों–
कान्ह ने धोखा दिया, ताली बजा, पीछे खिंचा
जोर से बढ़ते हुए सर से लड़ पड़े दोनों।

(बिलासपुर जेल की जन्माष्टमी-१९२१)

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