समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 8

समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 8

गीत (२)

चरण चलें, ईमान अचल हो!

जब बलि रक्त-बिन्दु-निधि माँगे
पीछे पलक, शीश कर आगे
सौ-सौ युग अँगुली पर जागे
चुम्बन सूली को अनुरागे,
जय काश्मीर हमारा बल हो,
चरण चलें, ईमान अचल हो।

स्मरण वरण का हिमगिरि का रथ,
तुम्हें पुकार रहा सागर-पथ,
अणु से कहो, अमर है निर्भय,
बोल मूर्ख, मानवता की जय,
झण्डा है नेपाल, सबल हो,
चरण चलें, ईमान अचल हो।

अन्न और असि दो से न्यारा
गर्वित है भूदान हमारा
सुन उस पंथी की स्वर धारा
जिसने भारतवर्ष सँवारा
’गोली’–राजघाट का बल हो,
चरण चलें, ईमान अचल हो।

बलि-कृति-कला ’त्रिवेणी’ की छबि,
गूँथ रहा, अपनी किरणों रबि
उठती तरुणाई का वैभव,
उतरे, बने सन्त, योद्धा, कवि।
भारत! लोक अमर उज्जवल हो,
चरण चलें, ईमान अचल हो!

(खण्डवा-१९५०)

कुलवधू का चरखा

चरखे, गा दे जी के गान!

इक डोरा-सा उठता जी पर,
इक डोरा उठता पूनी पर,
दोनों कहते बल दे, बल दे,
टूट न जाये तार बीच में,
टूट न जाये तान,
चरखे, गा दे जी के गान!

उजली पूनी, उजले जीवन,
है रंगीन नहीं उनका मन,
यह सितार-सा तारों का धन,
तार-तार भावी का स्वर-धन,
चिर-सुहाग पहचान।
चरखे, गा दे जी के गान!

तार बने, तारों की उलझन,
तार बने जीवन की पहरन,
ढाँके इज्जत, ढाँके दो मन,
दो डोरों के गठबन्धन से,
बँधे हृदय-महमान,
चरखे, गा दे जी के गान!

(खण्डवा-१९४०)

अंधड़ और मानव

अंधड़ था, अंधा नहीं, उसे था दीख रहा,
वह तोड़-फोड़ मनमाना हँस-हँस सीख रहा,
पीपल की डाल हिली, फटी, चिंघाड़ उठी,
आँधी के स्वर में वह अपना मुँह फाड़ उठी।
उड़ गये परिन्दे कहीं,
साँप कोटर तज भागा,
लो, दलक उठा संसार,
नाश का दानव जागा।
कोयल बोल रही भय से जल्दी-जल्दी,
पत्तों की खड़-खड़ से शान्ति वनों से चल दी,

युगों युगों बूढ़े, इस अन्धड़ में देखो तो,
कितनी दौड, लगन कितनी, कितना साहस है,
इसे रोक ले, कहो कि किस साहस का वश है?
तिसपर भी मानव जीवित है,
हँसता है मनचाहा,
भाषा ने धिक्कारा हो,
पर गति ने उसे सराहा!
बन्दर-सा करने में रत है, वह लो हाई जम्प!
यह निर्माता हँसा और वह निकल गया भूकम्प।

(खण्डवा-१९५६)

मुक्ति का द्वार

मेरे गो-कुल की काली रातों के ऐ काले सन्देश,
रे आ-नन्द-अजिर के मीठे, प्यारे घुँघराले सन्देश।
कृष-प्राय, कृषकों के, आ राधे लख हरियाले सन्देश,
माखन की रिश्वत के नर्तक, मेरे मतवाले सन्देश,
जरा गुद-गुदा दे पगथलियाँ, किलक दतुलियाँ दीखें तो।
चुटकी ले लेने दे, चिढ़े अहीरी-तू कुछ चीखे तो।
अरे कंस के बन्दी-गृह की,
उन्मादक किलकार!
तीस करोड़ बन्दियों का भी
खुल जाने दे द्वार।

(चार सितम्बर, खण्डवा-१९२६)

 तर्पण का स्वर

ना, ना, ना, रे फूल, वायु के झोंको पर मत डोल सलोने,
सोने सी सूरज-किरनों से, पंखड़ियों से बोल सलोने,
सावन की पुरवैया जैसे भ्रंग–कृषक तेरे तेरे पथ जोहें,
तेरे उर की एक चटख पर हो न जाय भू-डोल सलोने!

शिर का और शिराओं को युग, रक्त-वहन-कारी रहने दो,
मस्तक की रोली अहिवातिन, लाल-लाल प्यारी रहने दो,
मत्था चढ़े कि मत्था उतरे,
चक्र-सुदर्शन-छवि मुरलीधर, दुनिया से न्यारी रहने दो।

वह नेपाल, प्रलय का प्रहरी, भारत का बल, भारत का शिर!
वह कश्मीर कि जिस पर काले-पीले-उजले मेघ रहे घिर!
आज अचानक अमरनाथ के शिर से उतर रही युग-गंगा,
उठो देश, दे दो परिक्रमा, कहती है भैरवी कि फिर-फिर-

माथे की बिन्दी-हिन्दी को-चलो गोरखाली में बोलें,
वीरों को निर्वीर बनाया-उठो आज यह पातक धोलें,
तेवर, तीर, तलवार, ताज से ऊपर तर्पण का स्वर गूँजे,
भू-मण्डल भूदान-पथी उस जादूगर की थैली खोलें!

(खण्डवा-१९५४)

जबलपुर जेल से छूटते समय,
दरवाजे पर, आम के नीचे

ये जयति-जय घोष के काँटे गड़े,
लोटने ये हार सर्पों से लगे,
छोड़ कर आदर्श देव-उपासना,
बन्धु, तुम किस तुच्छ पूजा को जगे?

बँध चली ममता कसी जंजीर-सी,
यह परिस्थिति का गुनह-खाना बना,
घिर गये आत्मीय, मैं बेबस हुआ,
भोग की सहमार दीवाना बना।

कठिन शिष्टाचार का लंगर लगा,
मोह का, प्रतिकूल ताला पड़ गया,
वासना के संतरी-दल का सबल,
इन दृगों के द्वार पहरा अड़ गया।

था वहाँ सन, अब सदैव विकर्म की,
कह रहे हैं, रस्सियाँ बुनने लगो,
थी छटाकें चार, अब मनभर हुए,
हृदय कहता है कि सर धुनने लगो।

दूर था,–अब और भी सौ कोस पर,
हाय वह आराध्य जीवन-धन हुआ,
छोड़ दो मुझको दया होगी बड़ी,
मुक्ति क्या, यह तो महाबन्धन हुआ।

नज़रों की नज़र उतारूँगा

माँ—लल्ला, तू बाहर जा न कहीं,
तू खेल यहीं, रमना न कहीं।
बेटा—क्यों माँ?
माँ—डायन लख पाएगी,
लाड़ले! नजर लग जाएगी।
बेटा—अम्मा, ये नभ के तारे हैं,
किस माँ के राज-दुलारे हैं?
अम्मा, ये खड़े उघारे हैं,
देखो ये कितने प्यारे हैं,
क्यों इन्हें न इनकी माँ ढकती?
क्या इनको नजर नहीं लगती?
माँ—बेटा, डायन है क्रूर बहुत,
लेकिन तारे हैं दूर बहुत,
उन तक जाने में थक जाती,
यों उनको नजर न लग पाती,
बेटा—माता ये माला के मोती,
जगमग होती जिनकी जोती,
क्या नजरें इनसे डरती हैं,
जो इनपर नहीं उतरती हैं?
माँ—हाँ, जब ये नन्हें थे जल में,
गहरी लहरों के आँचल में,
तब नज़र न लगा सकी डुबकी,
छाया भी छू न सकी उनकी।
बेटा—अम्मा, ये फूल सलोने से,
हरियाली माँ के छौने से,
क्यों बेली इन्हें नहीं ढकती?
क्या इनको नज़र नहीं लगती?
माँ—नजरों के पैर फिसल जाएँ,
फूलों पर नहीं ठहर पाएँ।
बेटा—ना, ना, माँ, मैं क्यों हारूँगा,
माँ, मैं किससे क्यों हारूँगा?
मैं दृढ़ हूँ, तन-मन वारूँगा,
मैं हँस-हँसकर किलकारूँगा,
नजरों की नजर उतारूँगा।

(खण्डवा-१९२४)

 नीलिमा के घर

यह अँगूठी सखि निरख एकान्त की,
जड़ चलो हीरा उपस्थिति का, सुहागन जड़ चलो।
दामिनी भुज की–सयम की–अँगुली छिगुनी,
पहिन कर बैठे जरा नीलम भरे जल-खेत में,
साढ़साती हो, पहिन लो समय,
नग जड़ी, नीलम लगी है यह अँगूठी!
नील तुम, फिर नील नग, फिर नील नभ,

फिर नील सागर, नीलिमा के घर
अनोखी नीलिमा की छवि
सलोनी नीलिमा के घर
पधारे आज
नीतोत्पल सदृश भगवान मेरे!
और पानी हों बरसते गान मेरे!
लुट गये नभ के दिये वरदान मेरे!
अब हँसा तो, बिजलियाँ चमकें,
कि हीरक हार दीखे,
फिर यशोदा को कि माटी भरे मुख में
प्यार दीखे, ज्वार दीखे!
और नव संसार दीखे।

(खण्डवा, फरवरी-१९५६)

कुछ पतले पतले धागे

कुछ पतले-पतले धागे
मन की आँखों के आगे!
वे बोले गीतों का स्वर,
गीतों की बातों का घर,
हौले-हौले साँसों में
टूटा है, जी जगती पर,
प्राणों पर सावन छाया,
जिस दिन श्यामल घन जागे।
द्रव पतले-पतले धागे,
मन की आँखों के आगे।
अपनी कीमत दो कौड़ी–
कर, मैं उनके पथ दौड़ी,
दृग-पथ-गति से घबराकर,
प्रभु-माया हुई कनौड़ी,
ज्यों-ज्यों सूझों ने पकड़ा,
त्यों-त्यों स्मृतियों से भागे।
मन की आँखों के अपने,
वे सपने वाले धागे।
किस देश-निवासी हो तुम,
किस काल-श्याम की भाषा,
कब उतरोगी अन्तर में,
कवि की गरबीली आशा।
मैं सह लूँगा आँखों के।
ये उल्कापात अभागे,
जो पा जाऊँ सूझों के,
मैं पतले-पतले धागे!
क्यों नभ में ये चमकीले,
दाने बिखेर डाले हैं,
किस-दुनियाँ के दृग-मोती,
किस श्यामा के छाले हैं।
ये इतनी टीसों य घन,
मिल गये किसे मुँह माँगे?
मधु-याद-वधू के स्वर के
नव पतले-पतले धागे!

(अगस्त-१९४५)

हौले-हौले, धीरे-धीरे

तुम ठहरे, पर समय न ठहरा,
विधि की अंगुलियों की रचना, तोड़ चला यह गूंगा, बहरा।
घनश्याम के रूप पधारे हौले-हौले, धीरे-धीरे,
मन में भर आई कालिन्दी झरती बहती गहरे-गहरे।
तुम बोले, तुम खीझे रीझे, तुम दीखे अनदीखे भाये,
आँखें झपक-झपक अनुरागीं, लगा कि जैसे तुम कब आये?
स्वर की धारा से लिपटी जब गगन-गामिनी शशि की धारा,
उलझ गया मैं उन बोलों में, मैंने तुझको नहीं सँवारा।
चन्दन, चरण, आरती, पूजा,
कुछ भी हाय न कर पाया मैं,
तुम किरणों पर बैठ चल दिये,
किरणों में ही भरमाया मैं!
पा कर खो देने का मन पर कितना लिखा विस्मरण गहरा!
विधि की अंगुलियों की रचना, तोड़ चला यह गूंगा बहरा।
तुम ठहरे, पर समय न ठहरा,

(खण्डवा, अप्रैल-१९५६)

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