समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 6

समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 6

मन की साख

मन, मन की न कहीं साख गिर जाये,
क्यूँ शिकायत है?-भाई हर मन में जलन है।
दृग जलधार को निहारने का रोज़गार–
कैसे करें?-हर पुतली में प्राणधन है।
व्यथा कि मिठास का दिवाला कैसे काढ़े उर?
कान कहाँ जायें? लगी प्राणों से लगन है।
प्यार है दिवाना उसे कुछ भी न पाना
वह तेरे द्वार धूनियाँ रमाने में मगन है।

(खण्डवा-१९४५)

 अटल

हटा न सकता हृदय-देश से तुझे मूर्खतापूर्ण प्रबोध,
हटा न सकता पगडंडी से उन हिंसक पशुओं का क्रोध,
होगा कठिन विरोध करूँगा मैं निश्वय-निष्क्रिय-प्रतिरोध
तोड़ पहाड़ों को लाऊँगा उस टूटी कुटिया का बोध।
चूकेंगें आगे आने पर सारे दाँव विधाता के,
धोऊँगा पद-कंज आँसुओं से मैं जीवन-दाता के।

(प्रताप प्रेस, कानपुर-१९१९)

वीणा का तार

विवश मैं तो वीणा का तार।

जहाँ उठी अंगुली तुम्हारी,
मुझे गूँजना है लाचारी,
मुझको कम्पन दिया, तुम्हीं ने,
खुद सह लिया प्रहार।
दिखाऊँ किसे कसक सरकार!
अभागा मैं वीणा का तार।
विवश मैं तो वीणा का तार।

टूक-टूक स्वर ही क्या कम था!
जो उस को बेड़ी पहनादी?
क्या बन्दी स्वर के चढ़ने को,
बन्धन की सीढियाँ बना दीं?
मधुरिमा पर यह अत्याचार,
तुम्हारी ध्वनि-वीणा का तार।
विवश मैं तो वीणा का तार।

तारों में यों कस-कस रखना,
फिर सीढियाँ बनाना कैसा?
ठोकर से गिरता स्वर-बन्दी,
ठोकर मार चढ़ाना कैसा?
धन्य यह जग का स्वर-सत्कार!
कैद हूँ मैं वीणा का तार।
विवश मैं तो वीणा का तार।

तुम्हारे इंगित पर इतिहास,
चढ़ा जाता हूँ मैं दृग मींच,
खींच दी तुमने क्यों फिर हाय,
कलेजे पर खूँटी की खींच?
मधुरिमा दूँ? फाँसी पर? प्यार,
व्यथित, बेबस, वीणा का तार।
विवश मैं तो वीणा का तार।

तुम्हारे छू जाने से दुःख
दे चला कौन ज्वार, चीत्कार,
फाँसियों पर बन कर यह कौन,
आ गया निठुर चढ़ाव, उतार!
मधुर यह मौत, मधुर यह भार।
अभागा मैं वीणा का तार!
विवश मैं तो वीणा का तार।

चढ़े जाते हो गूँजों पर,
उतरते हो झंकारों में,
फूट जायेंगे कोमल अंग,
तुम्हारी धुन के तारों में।
न सह स्वर मेरे संग प्रहार,
सहेगा सब वीणा का तार।
विवश मैं तो वीणा का तार।

न मुझमें रंग, न मुझमें रूप,
न दीखे मेरा कहीं शरीर।
किन्तु मेरे प्राणों पर हाय,
टूटते हो तुम आलमगीर!
मधुरिमे! तू कितनी लाचार,
अभागा मैं वीणा का तार।
विवश मैं तो वीणा का तार।

(जबलपुर, व्योहारजी का निवास-१९२६)

आराधना की बेली

अमर आराधना की बेल, फूल जा, तू फूल जा!
श्याम नभ के नेह के जी का सलौना खेत पाकर
चमकते उन ज्योति-कुसुमों का बगीचा-सा लगाकर
चार चाँद लगा प्रलय में,
एक शशि को भूल जा।
अमर आराधना की बेल, फूल जा, तू फूल जा!

खुले ये छोड़ रक्खे हैं, कि कितना साहसी अम्बर
जगत तो बँट चुका सीमा नगर में द्वार में घर-घर!
बेकलेजे बेसहारा तारकों को झूल जा।
अमर आराधना की बेल, फूल जा, तू फूल जा!

गगन का गान मत गा तू धरा की जीत पर हँस री,
अमर की तू हँसी है तो सजग हो मौत को डँस री,
तू भले ही विश्व के अनुकूल जा,
प्रतिकूल जा।
अमर आराधना की बेल, फूल जा, तू फूल जा!

चमक की हाट नभ है? हो; न तू रख हाट में अपने,
न ये आँसू, न ये कसकें, न ये बलियाँ, न ये सपने,
गगन तो प्रतिबिम्ब है तेरे हृदय-भावों सजा।
अमर आराधना की बेल, फूल जा, तू फूल जा!

जग में गलियाँ, नभ में गलियाँ, बँधा जगत, पथ से चलने को,
सूरज की सौ-सौ किरनों में, विवश, प्रकाशोन्मुख जलने को,
तू अपना प्रकाश पाले, जी की जमना के कूल जा।
अमर आराधना की बेल, फूल जा,
तू फूल जा!

(खण्डवा-१९४२)

तेरा पता

तेरा पता सुना था उन दुखियों की चीत्कारों में,
तुझे खेलते देखा था, पगलों की मनुहारों में,
अरे मृदुलता की नौका के माँझी, कैसे भूला,
मीठे सपने देख रहा काग़ज की पतवारों में?
सागर ने खोला सदियों से,
देख बधिक का द्वार,
रे अन्तरतम के स्वामी उठ, तेरी हुई पुकार।

(खण्डवा-१९२६)

धरती तुझसे बोल रही है

धरती बोल रही है–धीरे धीरे धीरे मेरे राजा,
मेरा छेद कलेजा हल से फिर दाना बन स्वयं समा जा।
माटी में मिल जा ओ मालिक,
माँद बना ले गिरि गह्वर में,
एक दहाड़, करोड़ गुनी हो,
गूँजे नभ की लहर लहर में।
हरी हरी दुनियाँ के स्वामी, लाल अँगारों के कमलापति,
मुट्ठी भर हड्डियाँ? नहीं, यह जग की हल-चल तेरी सम्पति।
रे इतिहास, फेंक सत्तावन वाली वह तलवार पुरानी,
आज गरीबी की ज्वालामय साँसों पर चढ़ने दे पानी।

उत्सव क्या? सूली पर चढ़ना; क्या त्योहार? मौत की बेला!
खेला कौन? अरे प्रलयंकर, तू अपने परिजन से खेला।
नेता-अनुयायी का रौरव,
वक्ता-श्रोता का यह रोना।
ओ युग! तेरे हाथों देने,
आये मूरख चन्द्र-खिलौना।
तेरे घिसते दाँतों की मचमची, गठानें खोल रही है,
धीरे-धीरे मेरे राजा, तुझसे धरती बोल रही है।

(खण्डवा-१९४०)

झंकार कर दो

वह मरा कश्मीर के हिम-शिखर पर जाकर सिपाही,
बिस्तरे की लाश तेरा और उसका साम्य क्या?
पीढ़ियों पर पीढ़ियाँ उठ आज उसका गान करतीं,
घाटियों पगडंडियों से निज नई पहचान करतीं,
खाइयाँ हैं, खंदकें हैं, जोर है, बल है भुजा में,
पाँव हैं मेरे, नई राहें बनाते जा रहे हैं।
यह पताका है,
उलझती है, सुलझती जा रही है,
जिन्दगी है यह,
कि अपना मार्ग आप बना रही है।
मौत लेकर मुट्ठियों में, राक्षसों पर टूटता हूँ,
मैं, स्वयं मैं, आज यमुना की सलोनी बाँसुरी हूँ,
पीढ़ियाँ मेरी भुजाओं कर रहीं विश्राम साथी,
कृषक मेरे भुज-बलों पर कर रहे हैं काम साथी,
कारखाने चल रहे हैं रक्षिणी मेरी भुजा है,
कला-संस्कृति-रक्षिता, लड़ती हुई मेरी भुजा है।
उठो बहिना,
आज राखी बाँध दो श्रृंगार कर दो,
उठो तलवारों,
कि राखी बँध गई झंकार कर दो।

(खण्डवा, अप्रैल-१९५६)

 ऊषा

यह बूँद-बूँद क्या? यह आँखों का पानी,
यह बूँद-बूँद क्या? ओसों की मेहमानी,
यह बूँद-बूँद क्या? नभ पर अमृत उँड़ेला,
इस बूँद-बूँद में कौन प्राण पर खेला!
लाओ युग पर प्रलयंकरि
वर्षा ढा दें,
सद्य-स्नाता भू-रानी को लहरा दें।
ऊषा बोली, दृग-द्वार खोल दे अपने,
मैं लाई हूँ कुछ मीठे-मीठे सपने,
सपनों की साँकल से, रवि का रथ जकड़ो,
युग उठा चलो अंगुलियों पर गति पकड़ो।
मत बाँट कि ये औरों के
ये अपने,
गति के गुनाह, ये मीठे मीठे सपने।
यह उषा निशा के जाने की अंगड़ाई,
तम को उज्जवल कर जब आँखों पर आई!
मैं बोला, चल समेट, तारों की ढेरी!
यह काल-कोठरी खाली कर दे मेरी!
मैं आहों में अंगार लिये
आता हूँ,
जग-जागृति का व्यापार लिये आता हूँ।
निशि ने शरमा कर पहला शशि-मुख चूमा,
तब शशि का यह अस्तित्ववान रथ घूमा,
गलबहियाँ दे, जब निशि-शशि छाये-छाये,
जब लाख-लाख तारे निज पर शरमाये।
कलियों की आँखें द्रुम-दल ने तब खोलीं,
जग का नव-जय हो गया कि चिड़ियाँ बोलीं!
इस श्याम-लता में तब-
प्रकाश के फूल-सा
सूरज आया, विद्रोही उथल-पुथल-सा।

(नागपुर-१९३४)

 सखि कौन

श्यामल प्रभु से, भू की गाँठ बाँधती, जोरा-जोरी,
सूर्य किरण ये, यह मन-भावनि, यह सोने की डोरी,
छनक बाँधती, छनक छोड़ती, प्रभु के नव-पद-प्यार
पल-पल बहे पटल पृथिवी के दिव्य-रूप सुकुमार!

कलियों में रस-संपुट बनकर, बँधी मूठ बनमाली,
खुली पँखड़ियाँ, श्याम सलोने भौंरों से शरमाती!
कली-पंख, किरणों से लगकर, खिल मनमाने होते,
किरन नित नई, फूल किन्तु गिर रोज पुराने होते।

सो जाता है जगत किन्तु तारे देते हैं पहरा,
इस छाया में जाग्रति का गहरा गुमान है ठहरा।
कैसे मापूँ किरनों के चरणों, ऊँची गहराई,
कैसे ढूँढूँ, कहाँ गुम गई, तारक सेना पाई,

सपनों से ये तारे श्यामल पुतली पर भर आते,
छोड़े बिना निशान पाँव के प्रातः ये खो जाते।
लाख-लाख किरणों की आँखों बैठा ऊपर मौन,
नीचे मेरे खिलवाड़ों को निरख रहा सखि कौन?

साँस-साँस में भर आता-सा फिर आता-सा मौन,
स्वर में गूँथ इरादे, जी में गा उठता है कौन?
स्वर-स्वर पर पहरा देता कुछ लिख लेता-सा मौन,
मेरे कानों में वंशी-रव लाता है सखि कौन?

सुन्दरता पर बिकने से, करता क्षण-क्षण इनकार,
मेरी नासा पर सुगन्ध बन आता किसका प्यार?
दो से एक, एक से दो होने की दे लाचारी,
कौन नेह के खग-जोड़े की करता है रखवाली?

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