समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 4

समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 4

तुम्हारा मिलन

तुम मिले, प्राण में रागिनी छा गई!

भूलती-सी जवानी नई हो उठी,
भूलती-सी कहानी नई हो उठी,
जिस दिवस प्राण में नेह-बंशी बजी,
बालपन की रवानी नई हो उठी;
कि रसहीन सारे बरस रसभरे हो गये—
जब तुम्हारी छटा भा गई।
तुम मिले, प्राण में रागिनी छा गई!

घनों में मधुर स्वर्ण-रेखा मिली
नयन ने नयन रूप देखा, मिली—
पुतलियों में डुबा निज नजर की कलम
नेह के पृष्ठ को चित्रलेखा मिली;
बीतते-से दिवस लौट कर आ गये
बालपन ले जवानी सँभल आ गई।
तुम मिले, प्राण में रागिनी छा गई!

तुम मिले तो प्रणय पर छटा छा गई!
चुम्बनों, साँवली-सी घटा छा गई,
एक युग, एक दिन, एक पल, एक क्षण
पर गगन से उतर चंचला, आ गई!
प्राण का दान दे, दान में प्राण ले,
अर्चना की अधर चाँदनी छा गई।
तुम मिले, प्राण में रागिनी छा गई!

(सत्यनारायण कुटीर, प्रयाग-१९४४)

उल्लास का क्षण

मैं भावों की पटरानी,
क्या समझेगा मानव गरीब, मेरी यह अटपट बानी?

श्रम के सीकर जब ढुलक चले,
अरमान अभागे झुलस चले,
तुम भूल गये अपनी पीड़ा, जब मेरी धुन पहचानी।

जिस दिन तुम भव पथ डोल चले,
विष का रस जी में घोल चले,
तब मैं निज डोरी खींच उठी, तुममें जग उठी जवानी।

तुमने संकट पथ वरण किये,
कारागृह कण्ठाभरण किये,
मैंने जब मृदु दो चरण दिये, तुमने बन्धन छवि जानी।

जी के हिलकोरों के शिकार
दृग मूँद उठे तुम सहस बार
तब चमका कर पथ के फुहार, मैं बनी रूप की रानी।

तुम थकन आँसुओं घोल-घोल
कर उठे मौत से मोल-तोल
तब लेकर मैं अपना हिंडोल, अमृत झर बनकर मानी।

तुम बन शब्दों के आल-जाल,
आराध उठे गति-हरण-काल
तब मैंने मुरली ले फूँकी, गति-पथ पर प्रगति-कहानी।
मैं भावों की पटरानी।

(खण्डवा-१९४६)

युग और तुम

युग तुम में, तुम युग में कैसे झाँक रहे हो बोलो?
उथल-पुथल तब हो कि समय में जब तुम जीवन घोलो।
तुम कहते हो बलि से पहले अपना हृदय टटोलो,
युग कहता है क्रान्ति-प्राण! पहिले बन्धन तो खोलो।
तेरी अँगुली हिली, हिल पड़ा
भावोन्मत्त जमाना
अमर शान्ति ने अमर
क्रान्ति अवतार तुझे पहचाना।
तू कपास के तार-तार में अपनापन जब बोता,
राष्ट्र-हृदय के तार-तार में पर वह प्रतिबिम्बित होता,
झोपड़ियों का रुदन बदल देता तू मुसकाहट में,
करती है श्रृंगार क्रान्ति तेरी इस उलट-पुलट में।
उस-सा उज्ज्वल, उस-सा
गुणमय, लाज बचाने वाला
है कपास-सा परम-मुक्ति का
तेरा ताना-बाना।
अरे गरीब-निवाज, दलित जी उठे सहारा पाया,
उनकी आँखों से गंगा का सोता बह कर आया,
तू उनमें चल पड़ा राष्ट्र का गौरव पर्व-मनाकर
उन आँखों में पैठ गया तू अपनी कुटी बनाकर।
तुझे मनाने कोटि-कोटि
कंठों ने क्या-क्या गाया
जो तुझको पा सका–
गरीबों के जी में ही पाया।
है तेरा विश्वास गरीबों का धन, अमर कहानी–
तो है तेरा श्वास, क्रान्ति की प्रलय लहर मस्तानी।
कंठ भले हों कोटि-कोटि, तेरा स्वर उनमें गूँजा
हथकड़ियों को पहन राष्ट्र ने पढ़ी क्रान्ति की पूजा।
बहिनों के हाथों जगमग है
प्रलय-दीप की थाली;
और हमारे हाथों है–
माँ के गौरव की लाली।

(श्री बेनीपुरी को, गाँधी-जयंती
के लिए, पटना-१९३५)

झरना

पर्वतमालाओं में उस दिन तुमको गाते छोड़ा,
हरियाली दुनिया पर अश्रु-तुषार उड़ाते छोड़ा,
इस घाटी से उस घाटी पर चक्कर खात छोड़ा,
तरु-कुंजों, लतिका-पुंजों में छुप-छुप जाते छोड़ा,
निर्झरिनी की गोदी के
श्रृंगार, दूध की धारा,–
फेंकते चले जाते हो
किस ओर स्वदेश तुम्हारा?
लतिकाओं की बाहों में रह-रह कर यह गिर जाना!
पाषाणों के प्रभुओं में बह-बह कर चक्कर खाना,
फिर कोकिल का रुख रख कर कल-कल का स्वर मिल जाना
आमों की मंजरियों का तुम पर अमृत बरसाना।
छोटे पौधों से जिस दिन
उस लड़ने की सुधि आती
तप कर तुषार की बूँदें
उस दिन आँखों पर छातीं।
किस आशा से, गिरि-गह्वर में तुम मलार हो गाते,
किस आशा से, पाषाणों पर हो तुषार बरसाते,
इस घाटी से उस घाटी में क्यों हो दौड़ लगाते,
क्यों नीरस तरुवर-प्रभुओं के रह-रह चक्कर खाते?
किस भय से हो, वन–
मालाओं से रह-रह छुप जाते,
क्या बीती है, करुण-कंठ से
कौन गीत हो गाते?

(जबलपुर सेन्ट्रल जेल-१९३१)

 दाईं बाजू

ये साधन के बाँट साफ हैं, ये पल्ले कुटिया के,
श्रम, चिन्तन, गुन-गुन के ये गुन बँधे हुए हैं बाँके,
जितने मन पर मनमोहन अपना दर्शन दिखलाता
कितनी बार चढ़ा जाता हूँ, उतना हो नहिं पाता।
वे बोले जीवन दाँवों से
मैली दाईं बाजू,
अन्धे पूरा भार तुले कब
कानी लिये तराजू।

(बिलासपुर जेल-१९२२)

 पर्वत की अभिलाषा

तू चाहे मुझको हरि, सोने का मढ़ा सुमेरु बनाना मत,
तू चाहे मेरी गोद खोद कर मणि-माणिक प्रकटाना मत,
तू मिट जाने तक भी मुझमें से ज्वालाएँ बरसाना मत,
लावण्य-लाड़िली वन-देवी का लीला क्षेत्र बनाना मत,
जगती-तल का मल धोने को
भू हरी-हरी कर देने को
गंगा-जमुनाएँ बहा सकूँ
यह देना, देर लगाना मत।

(जबलपुर सेंट्रल जेल-१९२२)

 नन्हे मेहमान

महमान मेरे नन्हे से ओ महमान!

हम दोनों का मेल है तू ही,
जग का जीवन-खेल है तू ही,
नेह सींखचों जेल है तू ही,
ओ अम्मा के राजदुलारे
साजन की मुसकान।
महमान मेरे नन्हे-से ओ महमान!

माँ की सब तरुणाई वारी,
’उनकी’ लापरवाही वारी,
नाना की धन-दौलत वारी,
ओ गरीब के अमीर छोरे
दुख सुख की पहचान।
महमान मेरे नन्हे-से ओ महमान!

हरियाले दो मन पर फूला,
हम दो खम्भों पर तू झूला,
अरे कौन-सा रस्ता भूला,
नाना-सा धनवान, पिता-सा–
या होगा नादान!
महमान मेरे नन्हे-से ओ महमान!

(खण्डवा-१९४०)

 क्या सावन, क्या फागन

क्यों स्वर से ध्वनियाँ उधार लूँ?
क्यों वाचा के हाथ पसारूँ?
मेरी कसक पुतलियों के स्वर,
बोलो तो क्यों चरण दुलारूँ?
स्वर से माँगूँ भीख–
कि हिलकोरों में हूक उठे,
वाचा से गुहार करता हूँ
देवि, कलेजा दूख उठे।
बिना जीभ के श्यामा मेरी
उभय पुतलियाँ बोल रही हैं,
बोलों से जो रूठ चुके
ऐसे रहस्य ये खोल रहीं हैं।
क्यों ऊँचे उड़ने को माँगूँ,
मैं कोयल के पर अनमोले?
जब कि वायु में मेरे सपने
अग-जग भूमण्डल पर डोले।
कौन आसरा ले कि सुरभि के–
स्तन से उतरे अमृत-धारा,
जब कि फुदक उट्ठे बछड़ा वह
कामधेनु का राज-दुलारा।
भले ओंठ हों बन्द किन्तु–
अन्तर की गाँठें खुल जाती हैं,
क्या सावन, क्या फागन–
जब सूझें बारह-मासा गाती हैं!

(खण्डवा-१९५२)

युग-धनी

युग-धनी, निश्वल खड़ा रह!
जब तुम्हारा मान, प्राणों
तक चढ़ा, युग प्राण लेकर,
यज्ञ-वेदी फल उठी जब
अग्नि के अभिमान लेकर।
आज जागा, कोटि कण्ठों का–
बटोही मान लेकर,
ढूँढने आ गई बन्धन-मुक्ति–
पथ-पहचान लेकर।
जब कि ऊर्मि उठी, हृदय-हृद
मस्त होकर लहलहाया,
रात जाने से बहुत पहले
सबेरा कसमसाया।
किन्तु हम भूले तुझे ही
जब हमें रण ज्वार आया,
एक हमने शंख फूँका।
एक हमने गीत गाया।
गान तेरा है कि बस अभिमान मेरा,
रूप तेरा है कि है दृग-दान मेरा,
तू महान प्रहार ही सह,
युग-धनी, निश्चल खड़ा रह।

(नागपुर-१९४०)

ओ तृण-तरु गामी

सिर से पाँव, धूलि से लिपटा, सभ्यों में लाचार दिगम्बर,
बहते हुए पसीने से बनती गंगा के ओ गंगाधर;
ओ बीहड़ जंगल के वासी, अधनंगे ओ तृण-तरु गामी
एक-एक दाने को रोते, ओ सारी वसुधा के स्वामी!
दो आँखों से मरण देखते
लाल नेत्र तीजा बिन खोले
ओ साँपों के भूषणधारी
धूर्त जगत में ओ बंभोले!
गिरि-पति गिरि-जा को संग लेकर, बजा प्रलय डमरू प्रलयंकर,
तेरा प्रलय देखने आया, दिखा मधुर-ताण्डव ओ नटवर!

(खण्डवा-१९४०)

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