समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 3

समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 3

 यह बारीक खयाली देखी

यह बारीक खयाली देखी?

पौधे ने सिर उँचा करके, पत्ते दिये, डालि दी, फूला,
और फूलकर, फल बन, पक कर, तरु के सिर चढ़ झूले झूला,
तुमने रस की परख बड़ी की
रस पर रीझे, रस को पाया,
पर फल की मीठी फाँकों में माली की पामाली देखो?
यह बारीक खयाली देखी?

जब नदियों का प्यार समेटे ज्वार एक सागर को धाया,
वहाँ किसी ने नमक, किसी ने मोती, मूँगे; घर भर लाया,
जगे जौहरी बनकर, लाखों
पाये, महल बनाये, भोगे,
पनडुब्बे की पर क्या तुमने सूखी आँतें खाली देखीं?
यह बारीक खयाली देखी?

तुमहीं ने मलार गाया था, बादल घहर-घहर घिर आये,
तुम हँस उठे जब कि धान के खेतों पर वैभव लहराये,
तुम जहाज ले ले कर दौड़े
चावल लूटा, घर ले आये,
पर किसान की क्या भूखे बच्चों वाली घर वाली देखी?
यह बारीक खयाली देखी?

(प्रिंसिपल हीरालालजी खन्ना का निवास,
मनीराम बगिया, कानपुर—१९४२)

यह लाशों का रखवाला

उनके सपने हरियाता मेरी सूझों का पानी
मुझसे बलि-पन्थ हरा है, मुझ पर दुनियाँ दीवानी!

एकान्त हमारा, विधि से विद्रोहों की मस्ती है,
उन्माद हमारा, शत-शत अरमानों की बस्ती है।

हमने दुनियाँ खो डाली, तब जग ने हमको पाया!
हम अपने पर हँस उट्ठे, तब कहीं जगत रो पाया!

ईंटों, पाषाणों का नर, ईमान न जीने देगा,
यह लाशों का रखवाला, नव-प्राण न जीने देगा!

(ट्रेन में होशंगाबाद-१९४०)

तान की मरोर

तू न तान की मरोर
देख, एक साथ चल,
तू न ज्ञान-गर्व-मत्त–
शोर, देख साथ चल।

सूझ की हिलोर की
हिलोरबाज़ियाँ न खोज,
तू न ध्येय की धरा–
गुंजा, न तू जगा मनोज।

तू न कर घमंड, अग्नि,
जल, पवन, अनंग संग
भूमि आसमान का चढ़े
न अर्थ-हीन रंग।

बात वह नहीं मनुष्य
देवता बना फिरे,
था कि राग-रंगियों–
घिरा, बना-ठना फिरे।

बात वह नहीं कि–
बात का निचोड़ वेद हो,
बात वह नहीं कि-
बात में हज़ार भेद हो।

स्वर्ग की तलाश में
न भूमि-लोक भूल देख,
खींच रक्त-बिंदुओं–
भरी, हज़ार स्वर्ण-रेख।

बुद्धि यन्त्र है, चला;
न बुद्धि का गुलाम हो।
सूझ अश्व है, चढ़े–
चलो, कभी न शाम हो।

शीश की लहर उठे–
फसल कि, एक शीश दे।
पीढ़ियाँ बरस उठें
हज़ार शीश शीश ले।

भारतीय नीलिमा
जगे कि टूट-टूट बंद
स्वप्न सत्य हों, बहार–
गा उठे अमंद छन्द।

(सत्यनारायण कुटीर, प्रयाग–१९४८)

किनकी ध्वनियों को दुहराऊँ

ऐ मेरी प्रेरणा-बीन के वादक!
बे जाने जब जब, बजा चुके हो,
जगा चुके हो, सोते फितनों को जब-तब,

किन चरणों में आज उन्हें रक्खूँ?
किसका अपमान करूँ?
किसकी ध्वनियों को दुहराऊँ
हृदय हलाहल-दान करूँ?

आया हूँ मैं नाथ, तुम्हारे कण्ठ कालिमा देने को!
और तुम्हारा वैभव लेकर गीत तुम्हारा होने को।

(श्री मनोहर पन्त जी का निवास, जबलपुर-१९३२)

अधिकार नहीं दोगे मुझको

आते-आते रह जाते हो–जाते-जाते दीख रहे,
आँखे लाल दिखाते जाते, चित्त लुभाते दीख रहे,
दीख रहे, पावनतर बनने की धुन के मतवाले-से,
दीख रहे, करुणा-मन्दिर-से प्यारे देश निकाले-से,
दोषी हूँ, क्या जीने का
अधिकार नहीं दोगे मुझको,
होने को बलिहार
पदों का प्यार नहीं दोगे मुझको?

(प्रताप प्रेस, कानपुर-१९२३)

हरियालेपन की साध

गौरव-शिखरों! नहीं, समय की मिट्टी में मिलवाओ,
फिर विन्ध्या के मस्तक से करुणा-घन हो झरलाओ,
पृथिवी के आकर्षण के प्रतिकूल उठूँ, दिन लाओ,
जल से प्रथम मुझे आतप की किरणों में नहलाओ!
कई गुना होकर अर्पित
यह मिट्टी में मिल जाना;
हरियाला मस्ताना दाना
कहे कि तुझको जाना।

(उज्जैन-१९३१)

उलहना

यह लाली है,
सरकार आपकी कृपा-पूर्ण जंजीरों के घर्षण से, निकले मोती हैं।
रखवाली है,
हर सिसक और चीत्कारों पर तस्वीर तुम्हारी होती है।
मत खड़े रहो,
ऐ ढीठ रुकावट होती है साँसों के आने-जाने में,
तुम में अरमाँ,
अरमानों में तुम गुँथो नहीं, क्या सुख है धोखा खाने में?
चुम्बन में नहीं, पधारो तुम
हर रोज उदार! प्रहारों में;
त्योहार? सदा सूली के दिन
मनते आये त्योहारों में।

(खण्डवा-१९३३)

गीत (१)

मेरे युग-स्वर! प्रभु वर दे, तू धीरे-धीरे गाये।
चुप कि मलय मारुत के जी में शोर नहीं भर जाये,
चुप कि चाँदनी के डोरों को शोर नहीं उलझाये,
मेरे युग-स्वर! प्रभु वर दे, तू धीरे-धीरे गाये।
चुप कि तारकों की समाधि में दूख उठेगा जय-रव,
चुप कि चाँद में बिदा क्षणों की दर्शन-भूख न संभव।
उठो मधुर! दरवाजे खोलो, वातायन खुल जाये,
सदियों की उजड़ी साँसों में आज प्राण-प्रभु आये,
मेरे युग-स्वर! प्रभु वर दे, तू धीरे-धीरे गाये।

(खण्डवा-१९४५)

यौवन का पागलपन

हम कहते हैं बुरा न मानो, यौवन मधुर सुनहली छाया।

सपना है, जादू है, छल है ऐसा
पानी पर बनती-मिटती रेखा-सा,
मिट-मिटकर दुनियाँ देखे रोज़ तमाशा।
यह गुदगुदी, यही बीमारी,
मन हुलसावे, छीजे काया।
हम कहते हैं बुरा न मानो, यौवन मधुर सुनहली छाया।

वह आया आँखों में, दिल में, छुपकर,
वह आया सपने में, मन में, उठकर,
वह आया साँसों में से रुक-रुककर।
हो न पुरानी, नई उठे फिर
कैसी कठिन मोहनी माया!
हम कहते हैं बुरा न मानो, यौवन मधुर सुनहली छाया।

(खण्डवा-१९४०)

 हृदय

वीर सा, गंभीर-सा है यह खड़ा,
धीर होकर यों अड़ा मैदान में,
देखता हूँ मैं जिसे तन-दान में,
जन-दान में, सानंद जीवन-दान में।

हट रहा है दंभ आदर-प्यार से,
बढ़ रहा जो आप अपनों के लिए,
डट रहा है जो प्रहारों के लिए,
विश्व की भरपूर मारों के लिए।

देवताओं को यहाँ पर बलि करो
दानवों का छोड़ दो सब दु:ख भय;
“कौन है?” यह है महान मनुष्य़ता
और, है संसार का सच्चा हृदय।

क्यों पड़ीं परतंत्रता की बेड़ियाँ?
दासता की हाय हथकड़ियाँ पड़ीं
न्याय के मुँह बन्द फाँसी के लिए,–
कंठ पर जंजीर की लड़ियाँ पड़ीं।

दास्य-भावों के हलाहल से हरे!
भर रहा प्यारा हमारा देश क्यों?
यह पिशाची उच्च-शिक्षा-सर्पिणी
कर रही वर वीरता निःशेष क्यों?

वह सुनो आकाश वाणी हो रही–
“नाश पाता जायगा तब तक विजय”–
वीर?–’ना’, धार्मिक? ’नहीं’ सत्कवि? ’नहीं’–
“देश में पैदा न हों जब तक ’हृदय’”।

देश में बलवान भी भरपूर हैं
और पुस्तक-कीट भी थोड़े नहीं,
हैं अमित धार्मिक ढले टकसाल के
पर किसी ने भी हृदय जोड़े नहीं।

ठोकरें खाती मनों की शक्तियाँ
’राम मूर्ति’ बने खुशामद कर रहे,
पूजते हैं,–देवता द्रवते नहीं,
दीन-दब्बू बन करोड़ों मर रहे।

’हे हरे! रक्षा करो’–यह मत कहो
चाहते हो इस दशा पर जो विजय,
तो उठो, ढूँढो, छुपा होगा वहीं
राष्ट्र का बलि, देश का ऊँचा ’हृदय’।

फूल से कोमल, छबीला रत्न से,
वज्र से दृढ़, शुचि-सुगंधी यज्ञ से,
अग्नि से जाज्वल्य, हिम से शीत भी,
सूर्य से देदीप्यमान, मनोज्ञ से।

वायु से पतला, पहाड़ों से बड़ा
भूमि से बढ़कर क्षमा की मूर्ति है;
कर्म का अवतार-रूप-शरीर जो-
श्वास क्या, संसार की वह स्फूर्ति है;

मन महोदधि है, वचन पीयूष है
परम निर्दय है, बड़ा भारी सदय;
कौन है? है देश का जीवन यही,–
और है वह जो कहाता है ’हृदय’।

सृष्टि पर अति कष्ट जब होते रहे,
विश्व में फैली भयानक भ्रान्तियाँ
दण्ड, अत्याचार, बढ़ते ही गये,
कट गये लाखों मिटी विश्रान्तियाँ,

गद्दियाँ टूटीं असुर मारे गये
किस तरह? होकर करोड़ों क्रान्तियाँ,
तब कहीं है पा सकी मातामही
मृदुल-जीवन में मनोहर शान्तियाँ।

बज उठीं संसार भर की तालियाँ
गालियाँ पलटीं, हुई ध्वनि, जयति जय,
पर हुआ यह कब? जहाँ दीखा कभी
विश्व का प्यारा कहीं कोई ’हृदय’।

(प्रताप साप्ताहिक(विजयदशमी विशेषांक),
कानपुर-१९१४)

 ध्वनि बिखर उठी

हास्य का प्रपात, प्राण मेरु से गिरा
कि ध्वनि बिखर उठी!
और एक कान पर रखे
करारविन्द
छबि निखर उठी।
हास्य-तंत्र हो गया जहान,
यों कि उग उठा खेत-खेत!
यों प्रवाहमान, नेह हो उठा
कि भीग बही रेत-रेत!
कनखियाँ मचल उठीं कि चुटकियाँ मरोर दें।
हों उबासियाँ, उदासियाँ कि चुहुल जोर दें।
खीझ, रीझ से हजार
यों बिगड़-बिगड़ उठी।
हास्य का प्रपात, प्राण-मेरु से गिरा–
कि ध्वनि बिखर उठी।

(खण्डवा-१९५३)

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