समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 2

समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 2

बेटी की बिदा

आज बेटी जा रही है,
मिलन और वियोग की दुनिया नवीन बसा रही है।

मिलन यह जीवन प्रकाश
वियोग यह युग का अँधेरा,
उभय दिशि कादम्बिनी, अपना अमृत बरसा रही है।

यह क्या, कि उस घर में बजे थे, वे तुम्हारे प्रथम पैंजन,
यह क्या, कि इस आँगन सुने थे, वे सजीले मृदुल रुनझुन,
यह क्या, कि इस वीथी तुम्हारे तोतले से बोल फूटे,
यह क्या, कि इस वैभव बने थे, चित्र हँसते और रूठे,

आज यादों का खजाना, याद भर रह जायगा क्या?
यह मधुर प्रत्यक्ष, सपनों के बहाने जायगा क्या?

गोदी के बरसों को धीरे-धीरे भूल चली हो रानी,
बचपन की मधुरीली कूकों के प्रतिकूल चली हो रानी,
छोड़ जाह्नवी कूल, नेहधारा के कूल चली चली हो रानी,
मैंने झूला बाँधा है, अपने घर झूल चली हो रानी,

मेरा गर्व, समय के चरणों पर कितना बेबस लोटा है,
मेरा वैभव, प्रभु की आज्ञा पर कितना, कितना छोटा है?
आज उसाँस मधुर लगती है, और साँस कटु है, भारी है,
तेरे बिदा दिवस पर, हिम्मत ने कैसी हिम्मत हारी है।

कैसा पागलपन है, मैं बेटी को भी कहता हूँ बेटा,
कड़ुवे-मीठे स्वाद विश्व के स्वागत कर, सहता हूँ बेटा,
तुझे बिदाकर एकाकी अपमानित-सा रहता हूँ बेटा,
दो आँसू आ गये, समझता हूँ उनमें बहता हूँ बेटा,

बेटा आज बिदा है तेरी, बेटी आत्मसमर्पण है यह,
जो बेबस है, जो ताड़ित है, उस मानव ही का प्रण है यह।
सावन आवेगा, क्या बोलूँगा हरियाली से कल्याणी?
भाई-बहिन मचल जायेंगे, ला दो घर की, जीजी रानी,
मेंहदी और महावर मानो सिसक सिसक मनुहार करेंगी,
बूढ़ी सिसक रही सपनों में, यादें किसको प्यार करेंगी?

दीवाली आवेगी, होली आवेगी, आवेंगे उत्सव,
’जीजी रानी साथ रहेंगी’ बच्चों के? यह कैसे सम्भव?

भाई के जी में उट्ठेगी कसक, सखी सिसकार उठेगी,
माँ के जी में ज्वार उठेगी, बहिन कहीं पुकार उठेगी!

तब क्या होगा झूमझूम जब बादल बरस उठेंगे रानी?
कौन कहेगा उठो अरुण तुम सुनो, और मैं कहूँ कहानी,

कैसे चाचाजी बहलावें, चाची कैसे बाट निहारें?
कैसे अंडे मिलें लौटकर, चिडियाँ कैसे पंख पसारे?

आज वासन्ती दृगों बरसात जैसे छा रही है।
मिलन और वियोग की दुनियाँ नवीन बसा रही है।
आज बेटी जा रही है।

(श्रीमती ’मंगला देवी’ के विवाह के
अवसर पर), ड्रीमलेण्ड, कानपुर-१९४४)

 युग-ध्वनि

आग उगलती उधर तोप, लेखनी इधर रस-धार उगलती,
प्रलय उधर घर-घर पर उतरा, इधर नज़र है प्यार उगलती!
उधर बुढ़ापा तक बच्चा है, इधर जवानी छन-छन ढलती,
चलती उधर मरण-पथ टोली, ’उनपर’ इधर तबीयत चलती!
भुजदण्डों पर उधर भवानी, इधर जमाना पतित तर्क का,
जग ने ठीका दे रक्खा है, उधर स्वर्ग का, इधर नर्क का!
हाय सूर से सीख न पाये
दो सूजी से आँखें देना
विद्रोहिनी विजयिनी मीरा
कहती किसे? जहर पी लेना?
ओ बेमूछों के बलिपन्थी! आ इस घर में आग लगा चल,
ठोकर दे, कह युग! चलता चल, युग के सर चढ़, तू चलता चल!

(खण्डवा-१९४०)

वृक्ष और वल्लरी

वृक्ष, वल्लरि के गले मत—
मिल, कि सिर चढ़ जायगी यह,
और तेरी मित भुजाओं—
पर अमित हो छायगी यह।

हरी-सी, मनभरी-सी, मत—
जान, रुख लख, राह लख तू
मधुर तेरे पुष्प-दल हों,
कटु स्वफल लटकायगी यह।

भूल है, पागल, गिरी तो
यह न चरणों पर रहेगी
निकट के नव वृक्ष पर,
नव रंगिणी बल खायगी यह।

वृक्ष, तेरे शीश पर के
वृक्ष से लाचार है तू?
किन्तु तेरे शीश से, उस
शीश पर भी जायगी यह।

यह समर्पण-ऋण चुकाना—
दूर, मानेगी न छन भर
तव चरण से खींच कर—
रस और को मँहकायगी यह।

मत कहो इसको अभागिन,
यह कभी न सुहाग खोती,
लिपटना इसकी विवशता—
है लिपटती जायगी यह।

बस निकट भर ही पड़े
कि न बेर या कि बबूल देखे
आम्र छोड़ करील पर
आगे बढ़ी ही जायगी यह।

तू झुका दे डालियाँ चढ़ पाय
फिर क्यों शीश पर यह;
फलित अरमानों भरी
तेरे चरण आजायगी यह।

फेंक दे तू भूमि पर सब
फूल अपने और इसके
हुआ कृष्णार्पण कि तेरी
बाँसुरी बन जायगी यह!

प्यार पाकर सिर चढ़ी, तो
प्यार पाकर सूखती है,
कलम कर दे लिपटना
फिर सौ गुनी लिपटायगी यह।

नदी का गिरना पतन है
वल्लरी का शीश चढ़ना,
पतन की महिमा बनी तब
शीश पर हरियायगी यह।

मत चढ़ा चंदन चरण पर
मत इसे व्यंजन परोसे
कुंभिपाकों ऊगती आई;
वहीं फल लायगी यह।

सहम मत, तेरे फलों का
कौन-सा आलम्ब बेली?
तू भले, फल दे, न दे,
अपनी बहारों आयगी यह।

किस जवानी की अँधेरी–
में बढ़े जा रहे दोनों
बन्द कलियाँ, बन्द अँखियाँ
कौन-सा दिन लायगी यह।

फेंक कर फूलों इरादे,
भूमि पर होना समर्पित,
सिर उठाकर पुण्य भू का
पुण्य-पथ समझायगी यह।

एक तेरी डालि छूटे,
दूसरी गह ले गरब से
डालि जो टूटी, कि अबला–
सिद्ध कर दिखलायगी यह।

मेह की झर है न तू, जो–
मौसमों में बरस बीते,
नेह की झर सूखकर
तुझको अवश्य सुखायगी यह।

तू तरुणता का सँदेशा
भूमि का विद्रोह प्यारे,
शीश पर तू फूल ला, बस
चरण में बस जायगी यह।

या कि इसको हृदय से
ऐसी लपेट की दाँव भूले
सूर्य की संगिनि दुपहरी-
सी स्वयं ढल जायगी यह।

रे नभोगामी, न लख तू
रूप इसका, रंग इसका,
तू स्वयं पुरुषार्थ दिखला
तब कला बन जायगी यह।

लता से जब लता लिपटे?
गर्व हो? किस बात का हो?
तू अचल रह, स्वयं चल कर
ही चरण पर आयगी यह।

भूमि की इच्छा, मिलन की-
साध, मिटने की प्रतीक्षा-
तब अमित बलशालिनी है
जब तुझे पा जायगी यह!

चढ़न है विश्वास इसका,
लिपटना इसकी परमता,
जो न चढ़ पाई कहीं तो
नष्ट मुरझा जायगी यह।

पहिन कर बंधन, न बंधन
में इसे तू जान गाफ़िल,
जिस तरफ फैली कि नव-
बन्धन बनाती जायगी यह।

डालियाँ संकेत विभु के
वल्लरी उन्माद भाषा,
लिपटने के तुक मिलाते
छन्द गढ़ती जायगी यह।

और जो होना समर्पण है,
इसी की साध बनकर
शीश ले इसके फलों को
तब बहारों आयगी यह।

(व्योहार निवास, जबलपुर-१९३९)

 न्याय तुम्हारा कैसा

प्रिय न्याय तुम्हारा कैसा,
अन्याय तुम्हारा कैसा?
यह इधर साधु की कुटिया जो तप कर प्राण सुखाता,
तेरी वीणा के स्वर पर दीनों में मिल-मिल जाता।

मल धोता, जीवन बोता, छोड़े आँसू का सोता,
जब जग हरियाला होता, तब वह हरियाला होता।
उसके पड़ोस में ही हा! यह हत्यारे का घर है,
जो रक्तमयी तपड़न पर करता दिन-रात गुजर है!

फिर इधर खेत गेहूँ के हँसते हैं लह-लह करते,
क्या जाने इस हँसने पर कितने किसान हैं मरते?
हरियाली के ब्रह्मापर कितनी गाली बरसेंगी?
छोटी-छोटी सन्तानें रट ’अन्न-अन्न’ तरसेंगी,

होंगे पक्वान्न किसी के उसकी इस रखवाली में
उसका यह रक्त सजेगा कुछ धनिकों की थाली में
वह भी देखेगा इस को जब आयेगा त्योहार,
उस दिन किसान की मेहनत, वह हरियाला संसार।

उसके आँसू की दुनियाँ, उसके जीवन का भार,
पंडित हो या कि कसाई, राजा हो या कि चमार,
सबकी थाली का होगा उसका गेहूँ श्रृंगार।
प्रिय न्याय तुम्हारा कैसा,
अन्याय तुम्हारा कैसा?

फिर नभ की ये चमकी-सी छोटी-छोटी लटकनियाँ
निशि की साड़ी की कनियाँ प्रभु की ये बिखरी मनियाँ।
अपने प्रकाश का प्यारा ये खोले हुए खजाना,
बह पड़े कहीं इनको तो जीवन भर है बिखराना।

झाँको वे देख पड़ेंगे, ग्वालों की झोपड़ियों पर,
ताको, वे देख पड़ेंगे, विद्वानों की मढ़ियों पर!
उनके दर्शन होते हैं, देवालय द्वारों पर भी,
पर हा वे लटक रहे हैं इन कारागारों पर भी!

फिर वे दाखों की बेलें जिनसे पंछी दल खेलें
जी में मधुराई लाने, वर्षा हिम आतप झेलें!
इनकी गोदी के धन हैं मणियों से होड़ लगाते
ये रस से पूरे मोती, किसका जी नहीं चुराते!

किसकी जागीरी है यह, इनकी मीठी तरुणाई
किसका गुण गाने इनमें चिड़ियों की सेना आई?
बीमारों की तश्तरियों में ये जीवन देते हैं,
चूसे जाते हैं ये, पर नव अपनापन देते हैं!

वैद्यों के आसव बन कर धमनी में गति पहुँचाते,
पर हा, उनको ही घातक मदिरा बनवाकर पाते!
या धन लोलुप ऐयाशों के, भोगों की थाली को
दाखों से भरते पाते धन के लोभी माली को!
प्रिय न्याय तुम्हारा कैसा,
अन्याय तुम्हारा कैसा?

(जबलपुर सेन्ट्रल जेल–१९३०)

यह बरसगाँठ

किस तरुणी के प्रथम-हृदय-अर्पण के साहस-सी ये साँसें,
और तरुण के प्रथम-प्रेम-सी जमुहाती, अटपटी उसाँसें,
गई साँस के लौट-लौट आने का यह
करोड़वाँ-सा क्षण
वह क्षण जो बनने आया है
परम याद के कर का कंकण।
टेढ़े पल,
उलझी घड़ियाँ,
काले दिन, ये–
मट्मैली रातें;
बन्दन, बलि, बन्दीगृह जिन पर
बोते रहे विषम सौगातें।
उन साँसों की एक डोर का
एक छोर,
बरस-गाँठ
तेरी यह बरस-गाँठ

(बुरहानपुर–४ अप्रैल, १९३६)

गति-दाता

जागृति के प्रलय-पुंज
गति के गति-दाता।
ऐ गुणेश ऐ गणेश
ऐ महेश के निदेश
श्वेत केश श्वेत वेश
हिमगिरि-सा श्वेत देश,
झर झर निर्झर,
नगाधिराज के अशेष लेष!
ऐ महान, ऐ सुजान,
तांडव-पति-दिव्य-दान,
तारक-त्रैलोक्य,
क्रान्ति कारिणि मति-दाता।
जागृति के प्रलय-पुंज
गति के गति-दाता।
तू ’तुलसी’ तु ही ’सूर’
हर ले क्षिति का गुरूर,
तुझ में बोला ’रवीन्द्र’
’तुकाराम’ के हुजूर
’मीरा’ के मनमोहन
सहजो के नाथ-नाथ
पायें तेरा ’प्रसाद’
कर ’कबीर, को सनाथ
’मैथिलि’ तेरी जबान
’हरि’ का तू मधुर गान
तीर तू कमान तू
मैं “लक्ष्य-बेध” गाता।
जागृति के प्रलय-पुंज
गति के गति-दाता।

(हिरनखेड़ा-१९२६)

 पास बैठे हो

चट जग जाता हूँ, चिराग को जलाता हूँ,
हो सजग तुम्हें मैं देख पाता हूँ कि पैठे हो;
पास नहीं आते, हो पुकार मचवाते,
तकसीर बतलाओ क्यों यों बदन उमैठे हो?
दरश दिवाना, जिसे नाम को ही बाना,
उसे शरण विलोकते भी देव-देव ऐंठे हो;
सींखचों में घूमता हूँ, चरणों को चूमता हूँ,
सोचता हूँ, मेरे इष्टदेव पास बैठे हो।

(बिलासपुर जेल-१९२१)

फूल की मनुहार

बिन छेड़े, जी खोल सुगन्धों को जग में बिखरा दूँगा;
उषा-राग पर, दे पराग की भेंट, रागिनी गा दूँगा;
छेड़ोगे, तो पत्ती-पत्ती चरणों पर बिखरा दूँगा;
संचित जीवन साध कलंकित न हो, कि उसे लुटा दूँगा;
किन्तु मसल कर सखे! क्रूरता–
की कटुता तू मत जतला;
मेरे पन को दफना कर
अपनापन तू मुझ पर मत ला।

(नागपुर-१९३४)

 बोल नये सपने

कहानी बोल नये सपने!
अरी अभागिन, पहिले ही
क्यों ओंठ लगे कँपने?
कहानी बोल नये सपने!
देख तो, प्राण में एक तूफान-सा
लोटता-सा चला जा रहा है कहाँ?
व्यक्ति-वामन, उठा आ रहा पैर ले
एक रक्खे यहाँ, एक रक्खे वहाँ;
श्रृंखला सागरों को पिन्हाता हुआ-सा
गगन खेल-घर-सा बनाता हुआ,
हर लहर में नया स्वाद लाता हुआ
हर बहर में नया जग बनाता हुआ-
पंख खोल अपने
कहानी बोल नये सपने!

(खण्डवा-१९४५)

 युग-पुरुष

उठ-उठ तू, ओ तपी, तपोमय जग उज्ज्वल कर
गूँजे तेरी गिरा कोटि भवनों में घर-घर
गौरव का तू मुकुट पहिन
युग के कर-पल्लव
तेरा पौरुष जगे, राष्ट्र–
हो, उन्नत अभिनव।
तेरे कन्धों लहरावे, प्रतिभा की खेती,
तेरे हाथों चले नाव, जग-संकट खेती।
तुझ पर पागल बने आज उन्मत्त जमाना,
तेरे हाथों बुने सफलता ताना-बाना।
तू युग की हुंकार,
अमर जीवन की वाणी,
तेरी साँसें अमर हो उठें,
युग-कल्याणी।
तेरा पहरेदार, विन्ध्य का दक्षिण उत्तर,
तेरी ही गर्जना, नर्मदा का कोमल स्वर।
तेरी जीवित साँस आज तुलसी की भाषा,
तेरा पौरुष सतत अमर जीवन की आशा।
जाग-जाग उठ तपी तुझे
जग का आमंत्रण
विभु दे तुझको उठा
सौंप कर अमृत के कण।
तेरी कृति पर सजे हिमालय रजत-मुकुट-सा,
सिन्धु, इरावति बने सुहावन वैभव घट-सा,
गंगा-जमुना बहें तुम्हारी उर-माला-सी,
विहरित हरित स्वदेश करें, कृषि-जन-कमला-सी।
कमर-बन्द नर्मदा बने
उठ सेना-नायक।
शस्त्र-सज्जिता तरल तापती
बने सहायक।
तेरी असि-सी लटक चलें कृष्णा कावेरी,
आज सृजन में होड़ लगे विधना से तेरी।
लिख-लिख तू ओ तपी जगा उन्मत्त जमाना
जिसने ऊँचा शीश किये जग को पहचाना।
तू हिमगिरि से उठा
कुमारी तक लहराया,
रतनाकर ले आज
चरण धोने को आया।
उठ ओ युग की अमर-साँस, कृति की नव-आशा,
उठ ओ यशोविभूति, प्रेरणा की अभिलाषा,
तेरी आँखों सजे विश्व की सीमा-रेखा,
अंगुलियों पर रहे, जगत की गति का लेखा।

(खण्डवा-१९२९)

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