समय की पगडंडियों पर -गीत -त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 2

समय की पगडंडियों पर -गीत -त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 2

राजमहल के आगे

आँखें फाड़े
खड़े हुए हैं
राजमहल के आगे
शायद राजा जागे।
गये बरस
आशायें बोते,
थका न राजा
सोते सोते,
वह अपने
सपनों में खोया,
हारे थके अभागे।
शायद राजा जागे॥
वह समर्थ
उसकी मनमानी,
कौन करेगा
आना कानी,
जो विरोध में बोले,
उस पर
सौ सौ गोले दागे।
शायद राजा जागे॥

किसे पड़ी है
कौन जगाये,
जो बोले
संकट में आये,

सब आँखों पर
पट्टी बाँधे,
स्वार्थ सिद्धि में लागे।
शायद राजा जागे॥

 

रुख हवाओं का

रुख हवाओं का
किधर है, क्या कहें

शब्द साधक
अर्थ के पीछे पड़े हैं
दृष्टियों के होंठ पर
ताले जड़े हैं
मन तनावों का
हमसफर है, क्या कहें

तुलसियों के साथ है
भारी सियासत,
कैक्टस को मिल गये
फिर से अधिक मत,

यह बद्दुआओं का
असर है, क्या कहें

हर कोई अब एक ही
ज़िद पर अड़ा है,
रंगभूमि में वही
सबसे बड़ा है,
होड़ दावों की
जबर है, क्या कहें

 

नयी पहल

उखड़ रहे
आँगन आँगन से
तुलसी दल।
फूल कागजी
बैठक बैठक में
मुसकाते हैं,
मूल्य पुराने
नित्य अपरिचित
होते जाते हैं,
निर्मित हुए
अचानक छल के
रंग महल।
परम्पराएँ
नूतनता की राह
बुहार रहीं,
हो उतावली
चौबारा, घर-द्वार
सुधार रहीं,
पहुँचायेगी
किस दुनिया तक
नयी पहल।

 

दिन बहुरेंगे

सुनो,
पेंशन शुरू हो रही
अम्मा जी के दिन बहुरेंगे।
रखने लगी
खयाल अधिक ही
बड़ी बहूरानी,
सुबह शाम
छोटी रख जाती
सिरहाने पानी,
बेटों ने भी
अब यह सोचा
माँ है, मान अधिक देंगे।

पोता कहता
पडो न अम्मां
किसी झमेले में,
अब की बार
तुम्हें लेकर
जाऊँगा मेले में,
कई खिलौने
घर लायेंगे,
दोनों कुछ खा पी लेंगे।
उधर फोन पर
उनकी बेटी
जैसे झूल गयी,
बोली- अम्मां!

क्या अपनी बेटी को
भूल गयी,
लड़कों को तो
सब देते है
क्या बेटी को कुछ समझेंगे।

 

बगिया का मौसम

बदल गया
बगिया का मौसम,
चुप रहना।
गया बसंत,
आ गया पतझर,
दिन बदले,
कोयल मौन,
और सब सहमे,
पवन जले,
मुश्किल हुआ
दर्द उपवन का
अब सहना।
आकर गिद्ध
बसे उपवन में
हुआ गजब,
जुटे सियार
रात भर करते
नाटक अब,
अब किसको
आसान रह गया
सच कहना।

 

जिंदगी उलझन भरी है

जिंदगी उलझन भरी है, क्या करूँ !

गंध से आकृष्ट होकर
प्रेम भ्रमरों ने लुटाया,
फूल के सान्निध्य में भी
कंटकों का दंश पाया,
बहुत ग़म हैं, आँख नम हैं,
पीर रग-रग में भरी है, क्या करूँ !

मन बहुत बेचैन,
मायावी महल है,
ड्योढ़ियों में साजिशें हैं,
छद्म-छल है,
हर झरोखा, एक धोखा
हर तरफ जादूगरी है, क्या करूँ !

दिख रहे सम्बन्ध
निज विश्वास खोते,
भोर परिलक्षित हुई
आँखें भिगोते,
रिक्त गलियाँ, दग्ध कलियाँ,
आज मानवता डरी है, क्या करूँ !

 

बिना तुम्हारे

बिना तुम्हारे कैसा फागुन, कैसी होली रे ।
बिना तुम्हारे जरा न भायी कोकिल बोली रे ।।

रस छलकाती यह फागुन ऋतु
फीकी फीकी है,
हर नव कोंपल बिना तुम्हारे
आग सरीखी है,
कली-कली इतराती जैसे करे ठिठोली रे ।

मधुवन में भ्रमरों के जब से
मंगलाचार हुए,
तुम क्या जानो, नाजुक दिल पर
कितने वार हुए,
आँखों की राहों से मन की पीड़ा डोली रे ।

यह अनंग के पुष्प बाण
हँस हँस कर सह लेता,
थक जाता वह स्वयं, नृत्य को ऐसी गति देता,
यदि देतीं तुम साथ बनी मेरी हमजोली रे ।

मन-सागर में उठती रहती
आशा की लहरें,
तट के अश्व बने फिरते
यह सपने क्यों ठहरें,
साथ सजायेंगे मिल कर हम तुम रंगोली रे ।
बिना तुम्हारे कैसा फागुन, कैसी होली रे ।।

 

लोग मिले पगलाते

हुई विषैली हवा
आजकल।

असहज जीवन
साँसें लेना
भारी लगता है,
हुआ संक्रमित
तन भर अब
बीमारी लगता है,
हुई बेअसर दवा
आजकल।

चाट रही दीमक
रिश्तों को
दरक रहे नाते,
चाँदी के टुकड़ों के पीछे
लोग मिले
पगलाते,
स्वार्थ हुये हैं सवा
आजकल।

चूर हुआ
विश्वास
समय ने जब से लूटा,
हर घर आँगन में
नफरत का
अंकुर फूटा,
जीवन जलता तवा
आजकल।

 

सौगात

सखी, भेज दें उनको रक्षाबन्धन पर सौगात ।
मातृभूमि की रक्षा में जो लगे हुए दिन रात ॥

देश-प्रेम-ज्योति से दर्पित,
सदा राष्ट्र के लिए समर्पित,
सब कुछ मातृभूमि हित अर्पित,
जिनके चिन्तन में न राष्ट्र-हित सिवा दूसरी बात ।
सखी, भेज दें उनको रक्षाबन्धन पर सौगात ।।

अरमानों की बलि चढ़ाकर,
प्रहरी हैं सीमा पर जाकर,
धन्य मातृ-भू जिनको पाकर,
आतुर जन्म-भूमि की खातिर सहने को प्रतिघात ।
सखी, भेज दें उनको रक्षाबन्धन पर सौगात ॥

उनसे ही अस्तित्व हमारे,
बचे हुए हैं साँझ सकारे,
भला, क्यों न हों हमको प्यारे,
हरदम रहें गर्व से फूली पाकर ऐसे तात ।
सखी, भेज दें उनको रक्षाबन्धन पर सौगात ।।

 

सारा गांव खड़ा

रामरती के
घर के आगे
सारा गांव खड़ा।

उम्र गयी
पर गया न घर से
दुःखदायी टोटा,
नौ दो ग्यारह हुए
अन्ततः
थाली और लोटा,
एकाकीपन
झेल रहा है
कोने रखा घड़ा।

कभी नमक से
कभी अलोनी
जैसी थी खा ली,
पर भरपेट मिली
जीवन भर
मुखिया की गाली,
कौन भला
उसके मुँह लगता
वह लम्बा तगड़ा।

खून पसीना
एक कर दिये
जीवन भर तरसी,
उसके आँगन
सुख की बदली
कभी नहीं बरसी,
क्रूर काल का
कठिन हथौड़ा
सिर पर आज पड़ा।

 

मन – वृंदावन

बदल गया
मन का वृंदावन
मनमोहन।
करते नहीं
आजकल सपने
अभिनन्दन,
बढ़ती रही
पीर दुःखदायक
हुई सघन,
नयनों का ही
रात, दिवस भर
अब दोहन।

नहीं झूमते
मुरली धुन पर
कभी चरण,
होता रहता
सुखमय क्षण का
चीरहरण,
नहीं रहा है जीवन पथ पर
कुछ सोहन।

 

बदलते मौसम

बदले बदले से लगते हैं
उत्सव के मौसम।

आई शरद
शक्ति पूजा की
जगह जगह चर्चा,
पूजा-अर्चन, दीपमालिका
कितना ही खर्चा,
किन्तु अहिल्या पाषाणी सी,
क्रोध भरे गौतम।

सिर्फ जलाये गये
हर जगह कागज के पुतले,
अब भी देव डरे सहमे हैं
रावण-राज चले,
वन में राम, बद्ध है सीता,
विवश संत संगम।

इस पिशाचनी महंगाई की
कब तक घात सहें,
भूखी नंगी दीवाली की
किस से व्यथा कहें,
पर्वत बनी समस्याएं हैं,
तिनके जैसे हम।

 

शहर

भैया जी के
स्वप्नलोक में
आता रहा शहर।

शीशे जैसी
चिकनी सड़कें
आवाजाही
चहल पहल,
दुल्हन जैसी
सजी दुकानें
नभ को छूते
रंग महल,
नये नये रूपों में
मन को
भाता रहा शहर।

रूठी बैठी
सुख सुविधाएं
टोटे ने
अपनाया घर,
आशाओं की
गठरी लेकर
भैया पहुँचे
बड़े शहर,
उम्मीदों के
गीत सुहाने
गाता रहा शहर

अपनेपन को
कितना खोजा
व्यर्थ लगाये
कितने फेरे,
गूंगी, बहरी
मानवता ही
मिली दौड़ती
साँझ सवेरे,
भरी भीड़ में
एकाकी पन
लाता रहा शहर।

 

ये सघन घन

ये सघन घन
डाकिये हैं
चिट्ठियाँ लाते।

तैरती मुस्कान
खेतों पर
हवा गाती,
बिरहणी
बेकल नदी
फिर प्राण पा जाती,
प्यास से व्याकुल
पपीहे
मुग्ध हो गाते।

शुष्क मन वाली
धरित्री
उर्वरा होती,
छप्परों से भी
टपकते
कीमती मोती,

कृषक स्वप्नों के
सुनहरे पंख
उग आते।

ला सुखद संदेश
मोरों को नचा जाते,
जिस गली जाते
वहाँ
उत्सव नये आते,
जोड़ लेते
सहज ही
अपनत्व के नाते।

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