समय की पगडंडियों पर -गीत -त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 3

समय की पगडंडियों पर -गीत -त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 3

झूम झूम कर मन गाता है

देख-देख जग की सुन्दरता मुझ को बहुत प्यार आता है ।
बहने लगती जब पुरवाई, झूम-झूम कर मन गाता है ॥

मन की कली-कली खिल जाती, खिलती जब उपवन की क्यारी,
रोम-रोम हो जाता हर्षित देख चाँदनी प्यारी-प्यारी,
उगता सूरज प्रतिदिन मुझ में, नव आशाएं भर जाता है ।
बहने लगती जब पुरवाई, झूम-झूम कर मन गाता है ॥

मीठे बोल सुनाती कोयल, भर जाता मैं भी मिठास से,
पीउ-पीउ करता जब पपीहा, बँध जाता हूँ प्रेम-पाश से,
शुक-पिक मिलन सिखाता मुझ को सब से बड़ा प्रेम नाता है।
बहने लगती जब पुरवाई, झूम-झूम कर मन गाता है ॥

जब घिरतीं घनघोर घटाएं, छटा सँवरती कई गगन में,
रिमझिम-रिमझिम नन्हीं बूंदें, भरतीं स्वप्न सुनहरे मन में,
जब खेतों में मोर नाचते, स्वयं नृत्य करना भाता है ।
बहने लगती जब पुरवाई, झूम-झूम कर मन गाता है ॥

हरी घास के ओस-कणों पर मुझ को प्यार हमेशा आया,
झरने के संगीत-सुरों ने मेरा मन हर बार रिझाया,
नदियों का अल्हड़पन हरदम जीवन में खुशियाँ लाता है ।
बहने लगती जब पुरवाई, झूम-झूम कर मन गाता है ॥

कलरव करते नभ में उड़ते खग-कुल का अपना आकर्षण,
वह हिरणों का प्रणय-समर्पण कर जाता है सुख का वर्षण,
देख, शावकों की क्रीड़ाएं, सुख का सागर लहराता है ।
बहने लगती जब पुरवाई, झूम-झूम कर मन गाता है ।।

नयना चपल, अधर कलियों से, मुस्काती गालों की लाली,
कर लेते आकर्षित कंगना, ठग लेती पायल मतवाली,
भर जाती जीवन में खुशियाँ, कितना अपनापन आता है ।
बहने लगती जब पुरवाई, झूम-झूम कर मन गाता है ॥
देख-देख जग की सुन्दरता मुझ को बहुत प्यार आता है ।
बहने लगती जब पुरवाई, झूम-झूम कर मन गाता है ॥

 

नयी भोर आयी है, सपने सजाओ

नयी भोर आयी है, सपने सजाओ।
सुहाना समय है, अजी, जाग जाओ।।

मनोहर नज़ारा तुम्हारे लिए है,
यह संसार प्यारा तुम्हारे लिए है,
यह आकाश सारा तुम्हारे लिए है,
कि इतना उठो तुम बुलन्दी को पाओ।
सुहाना समय है, अजी, जाग जाओ।।

तुम्हारे लिए ये कुसुम खिल रहे हैं,
खुशी में ये तरुवर सभी हिल रहे हैं,
गगन और ज़मीं भी गले मिल रहे हैं,
कि तुम भी किसी को गले से लगाओ।
सुहाना समय है, अजी, जाग जाओ।।

तुम्हारे लिए है बहारों की मस्ती,
तुम्हारे लिए है ये जीवन्त बस्ती,
नदियों में इतराती इठलाती कश्ती,
मुश्किल हो कितनी, किनारा ही पाओ।
सुहाना समय है, अजी, जाग जाओ।।

 

जब कभी संवाद हो

शब्द के जंगल उगाकर
क्या करोगे
जब कभी संवाद हो
नवगीत जैसा हो।

वेदना के गीत गाकर
उम्र बीती,
आज तक भी प्रेम गागर
रही रीती,
समय की बहती नदी को
कौन रोके
हर जिया पल सरस हो
नवनीत जैसा हो।

राह में काँटे बिछाने
कौन आया,
कौन जिसने इस हवा को
बरगलाया,
फिर मलय को
बाँसुरी से खेलने
दो रुख प्रथाओं का
किसी मधुमीत जैसा हो।

 

जिन्दगी अभिशप्त जैसी

फिर किसी अभिशप्त जैसी
जिन्दगी होने लगी।

नाग जहरीले कई
बसने लगे है गाँव-घर,
कब निरापद रह सकी है
आजकल कोई डगर,
ओस इंगित कर रही है
रात भी रोने लगी।

संस्कृति लज्जित बहुत ही
मूल्य वनवासी हुए,
औपचारिकता बची
सम्बन्ध आभासी हुए,
बस मुखौटे बेबसी के
जिंदगी ढोने लगी।

विवश मन्दिर और गिरजे
मस्जिदें भी रो रही हैं,
हर तरफ बस मंत्रणाएँ
धर्म पर ही हो रही हैं,
नागफनियों की फसल
नव-सभ्यता बोने लगी।

 

बगिया के रखवाले

हर जड़ में
मट्ठा डाल रहे
बगिया के रखवाले।

सूखे वृक्ष,
लता मुरझाई,
चिड़िया अकुलायीं,
काग जुटे,
चीलों ने
अपनी यश गाथा गायीं,
काले विषधर
पाल रहे
बगिया के रखवाले।

यदा कदा आ जाते
कई कपोत
निशाने पर,
अक्सर खुली छूट
बधिकों के
आने जाने पर,
उल्टे फरमान
निकाल रहे
बगिया के रखवाले।

नहीं सुन रही
चीख पुकारें
अलसाई हाला,
अहंकार ने
मन के द्वारे
लटकाया ताला,
हर बात
हँसी में टाल रहे
बगिया के रखवाले।

 

संवादों के इंद्रजाल

संवादों के इंद्रजाल ने
सबको खूब छला।

संदर्भो को पीछे छोड़ा
नये प्रसंग बने,
मतलब के ताने-बाने के
हम भी अंग बने,
अनुबंधों की बैशाखी ले
जीवन विकल चला।

नैतिकता की चादर
सबके कंधों से ढलकी,
संबंधों की अधजल गगरी
पल पल पर छलकी,
यंत्रों सी जीवन चर्या में
सब अनुराग जला।

मृगतृष्णा के बदहवास पल
दिनभर दौड़ाते,
संध्या की बेला में बुद्धू
वापस घर आते,
रही व्यर्थ ही आँखमिचौनी
किसका हुआ भला।

 

बेला की गंध

मेरी साँसों में अब तक
बेला की गंध भरी ।
मेरी यादों में रहती
वह अल्हड़ दोपहरी ।।

काले केशों पर आकर
बेला जब इतराता,
मन के कोने में
बहुरंगी सपने भर जाता,
कामदेव को रति लगती
सकुचाई डरी-डरी।

घूघट के पट सहसा
अपनी मर्यादा खोते,
प्रेम-देह की आशाओं के
पंख लगे होते,
दग्ध साँस से कुंदन बनती
अपनी प्रीति खरी।

 

 

मुग्ध – हास बोयें
बचपन के होंठों पर

मुग्ध – हास बोयें।

आओ, उनसे छीन लें
चिंता की आरियां,
सबको सुनायी दें
उनकी किलकारियां,
इंद्रधनुषी स्वप्नों को
वे फिर सजोयें।

बाल-सुलभ लीलाएं
पाती हों पोषण,
कोई न कर पाये
बच्चों का शोषण,
भावों-अभावों में
बच्चे न रोयें।

संस्कार, संस्कृति के दीपक जलायें,
सब मिलकर
खुशियों के नवगीत गायें,
विकृत विचारों को वे अब न ढोयें।
बचपन के होंठों पर मुग्ध – हास बोयें।

 

सुनो व्याघ्र

सुनो व्याघ्र ! सोने के कंगन अपने पास रखो।

लोग तुम्हारी बातों के
दल दल में आ फँसते,
उनके भोलेपन पर
तुम चटखारे ले हँसते
दिल के काले ! तुम वाणी में भले मिठास रखो।

स्वर्णिम सपनों को दिखलाकर
बरसों बरस छला,
औरों का रस रक्त चूसकर
अपना किया भला,
तुमने यही हमेशा चाहा-खुद को खास रखो ।

देख तुम्हारे करतब
सबकी तंद्रा भाग गयी,
पहले जैसी बात नहीं,
अब जनता जाग गयी,
अब भी बातों में आ जायें, यह मत आस रखो।

 

शंखनाद के सुर

अंधा राजा,
मौन सभासद,
दुःखी हस्तिनापुर।
जगह जगह पर
द्यूत-सभा के
मंडप सजे हुए,
और पाण्डवों के
चेहरों पर
बारह बजे हुए,
चीरहरण के लिए
दुःशासन
बार-बार आतुर।
भीष्म
उचित अनुचित की
गणना करना भूल रहे,
विवश प्रजा के सपने
बीच हवा में
झूल रहे,
छिपी कुटिलता
चट कर जाती
सच के नव अंकुर।
होगा
आने वाले कल में
एक महाभारत,
कुटिल कौरवों को
फिर करना होगा
क्षत विक्षत,
सुनने में आ रहे
अभी से
शंखनाद के सुर।

 

अभिशप्त यंत्रणा

सता रही है
शीत-निशा सी
चढ़ी अजब मँहगाई।

मुश्किल हुआ जुटाना
घर के खातिर
दाना-पानी,
करें अधूरी
इच्छायें भी
पल-पल आना-कानी,
अब माँ को भी
घर रखने पर
झगड़े अपना भाई।

झेल रही
अभिशप्त यातना
कंचन जैसी काया,
बिना बुलाए
मेहमानों सा
दुःख मन में उग आया,
और वृद्ध-सी
हुई दोहरी
बेबस ही तरुणाई।

होंठ नहीं खुल सके
कथा सब
आँखों ने कह डाली,
रोज नये
प्रश्नों में उलझीं
कितनी रातें काली,
सूनी आँखें
नहीं देखती
अब सपने हरजाई।

 

त्रासदी का अंक

जहाँ तक आँखें गड़ी
आतंक ही आतंक है।

लग रहा है आज फिर
वक्त की नीयत बुरी है,
होंठ पढ़ते मंत्र
लेकिन
हाथ में तीखी छुरी है,

और वधिक उन्माद में भी
हर कदम निःशंक है।
न्याय की आँखें बँधीं
अन्याय के उत्सव हुये हैं,
पूछ काँटों की हुयी
फूल सारे अनछुये हैं,

जिन्दगी के उपवनों में
विषधरों का डंक है।
मौन धारे नीति फिरती
वक्ष पर सह
घाव कितने,
हो गये बलिदान
कुत्सित भाव पर
सद्भाव कितने,

शायद समय के
भाल पर ही
त्रासदी का अंक है।

 

पार्थ

भीति के रथ पर चढ़े हो
किधर जाओगे?
राह में नदिया, नहर,
पर्वत, गहन सागर,
घात में बैठे हुए
नख, दाँत वाले डर,
अनिश्चय की आँधियों से
पार पाओगे?
निर्दयी आतंक
अपना जाल बुनता है,
मूक बधिरों के नगर में
कौन सुनता है,
धूर्तों को
दुःख भरी गाथा सुनाओगे?
ऐन्द्रजालिक क्षितिज में
हर ओर ही छल है,
इस अघोषित युद्ध में
बस धैर्य ही बल है,
पार्थ, अपनी शक्ति से
यश गीत गाओगे।

 

अभिलाषा का रथ

सच कहना,
अभिलाषा का रथ
कब रुकता।
मिल जाते हैं
प्रियतम के सुख,
प्रेम-डगर, राजमहल,
सत्ता-सुख, सम्पति,
गाँव, नगर,
किन्तु हिसाब
आज तक मन का
कब चुकता।

रहा भागता
तिर्यक पथ पर
पागल-मन,
कम ही रहा
बहुत पाकर भी
जीवन-धन,
झुकता तन,
ये अहंकार शठ
कब झुकता।

 

प्यास नदी की

किसने देखी
कल कल ध्वनि में
प्यास नदी की।
आया पथिक
अंजुरी भरकर
प्यास बुझाई,
चलता बना
स्वयं का घट भर,
हे हरजाई,
वापिस गया
भूल अमृत फल
खूब बदी की।

सभ्य हुए तो
व्यापारी बनकर
सब हरसे,
किसने सुनी
सृष्टि की धड़कन
ताने फरसे,
लिखने लगे
कहानी मिलकर
क्षुब्ध सदी की।

 

प्रत्यय की बदनामी

भोली संज्ञाएँ तो बस
अब सर्वनाम की अनुगामी हैं।

कभी मोल
और कभी आकलन
करती रही शब्द की मण्डी
चलती रहती है
बस बेसुध बैलों की
होकर पगडण्डी,
नई राह की चाह लिये
पर अर्थहीन हैं, बेनामी हैं।

छली व्याकरण
के युग बीते
अब तक बहुत छलावे देखे,
कभी प्रलोभन
कभी यंत्रणा
पग-पग पर बहकावे देखे,
सारा गणित उलझ बैठा है
हाथ लगी बस नाकामी है।

मर्यादा के
परदे में ही
शायद एक सुनहरा कल हो,
फिर से नव अनुसंधानों में
संवादों की
नई फसल हो,
नव-विसर्ग के इन्तजार तक
हर प्रत्यय की बदनामी है।

 

मौसम की मनमानी

राख जम चुकी
अंगारों पर
मौसम की मनमानी है

तेज चल रही
सर्द हवा में
बन्द खिड़कियाँ ऊब रही हैं,
असमंजस में
देह दोहरी
आशंका में डूब रही हैं,
पैबन्दों में
फँसी रजाई अब भी
वही पुरानी है

पसर गया है
मौन हर तरफ
बैठे हैं सब खोये-खोये,
सबके भीतर
दर्द छुपा है
कौन कहाँ तक किससे रोये,
आधी रात
धूप की आशा
बात बड़ी बचकानी है

सूरज आने में
देरी है
रात काट पाना है मुश्किल,
हॉफ चुके हैं
दम पंजों के
बहुत दूर है आगे मंजिल,
उम्र थक चुकी
काँधे बोझिल
ठहरी हुयी कहानी है

 

खाली घट

रहा खोजता
मन अपनापन
जीवन भर।
मृग तृष्णा ने
मरु-भूमि में खोजे
सर, सागर,
जिधर गया
खाली ही घट था या
टूटी गागर,
मिले कुंज में
घात लगाये बैठे
कितने डर।

कई बस्तियां
छान छान करके
इतना पाया,
उतर चुकी
सब के ही भीतर
भोगों की माया,
जोड़ तोड़ में
उलझे पाये सब
बस्ती के घर।

 

मेरा जीवन

मेरा जीवन
सुख – दुःख पूरित
अंक गणित ।
और और की
सघन कामना में
जीवन बीता,
आखिर मिला
मुझे जीवन-घट
रीता ही रीता,
किन्तु खड़ा था
बड़ा अकड़कर
मन – गर्वित।

मैंने समझा
मन – चौखट पर
सुख बरसा,
दुख ही मिला
अचानक मुझसे,
मन तरसा,
सब नाते थे
मतलब में रत,
चंचल चित।

 

माँ के अनगिन रूप

जग में परिलक्षित होते हैं
माँ के अनगिन रूप।
माँ जीवन की भोर सुहानी
माँ जाड़े की धूप।

लाड़-प्यार से माँ
बच्चों की झोली भर देती,
झाड़-फूंक करके
सारी बाधाएँ हर लेती,
पा सान्निध्य प्यास मिट जाती
माँ वह सुख का कूप ।

माँ जीवन का मधुर गीत
माँ गंगा सी निर्मल,
आशाओं के द्वार खोलता
माता का आँचल,
समय-समय पर ढल जाती माँ
बच्चों के अनुरूप।
जग में परिलक्षित होते हैं
माँ के अनगिन रूप ।।

 

गाँव

पहले जैसा
प्रेम-गंध से भरा
अभी भी गाँव।
रिश्ते नातों में
अब तक बाकी है
अपनापन,
बरस रहे
हर ड्योढ़ी – आँगन
सुख-सावन,
भरी धूप में
सुखमय लगती
पीपल छाँव।
सुख दुःख में
सम्मिलित होकर
जीते जीवन,
मानवता ही
सबसे बढ़कर
जीवन – धन,
बिछा न पायी
मलिन कुटिलता
अपने दाँव।

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