समय की पगडंडियों पर -गीत -त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 4

समय की पगडंडियों पर -गीत -त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 4

सोया शहर

भाँग खाकर
नींद के आगोश में
खोया शहर।
हर तरफ
दहशत उगाती
रात आकर,
पतित मन
छल-छद्म करता
मुस्कराकर,
और सहसा
घोल देता हवा में
तीखा जहर।

सिकुड़ जाती
आपसी सम्बन्ध की
पतली गली,
नजर आती
देह भी विश्वास की
झुलसी, जली,
प्रकट होती
मानवों के बीच में
चौड़ी नहर।

 

भ्रम उजालों का

छद्मवेशी आवरण में
हर तरफ
बहुरूपिये हैं

हर दिशा ओझल हुई सी
हर तरफ छाया कुहासा
बस्तियों में मातमी धुन,
हर गली में है धुंआ सा,
घुट रहा है दम सभी का
सब गले तक
विष पिये हैं

भय दिखाती लाल आँखें
हर कदम पर आज आड़े,
अस्मिता से खेलते हैं
आततायी, दिन दहाड़े,
देखती लाचार आँखें
किन्तु सबके
मुँह सिये हैं

जी रहे हैं या मरे हैं
बहुत मुश्किल है बताना,
मौन रहने में भला है
अनुभवों से यही जाना,
हैं अँधेरे की शरण में
भ्रम उजालों का
लिए हैं

 

खट्टा हुआ समय

गायब हुई
मधुरता मन की
खट्टा हुआ समय।
बहू और बच्चों को
लेकर
बेटा गया शहर,
घर में
चहल पहल करती है
खाँसी आठ पहर,
बूढ़ी देह
चिढ़ाती रहती
उम्र दिखाती भय।

बहुत दूर तक
कैसे चलते
जो रिश्ते सीढ़ी,
कब तक ढोती
सोच पुरानी
युवा हुई पीढ़ी,

हानि लाभ का
अंक गणित ही
सब कुछ करता तय।

बड़े जतन से
पाला पोषा
ख्वाबों का चंदन,
सहसा हुआ
दृष्टि के आगे
सूना सा आँगन,
अनायास
दस्तक दे जाती
पीड़ाएं अक्षय।

 

सीता डरी हुई

पर्ण कुटी के पास
दशानन,
सीता डरी हुई।
स्वर्ण-मृगों के
मोहजाल में
राम चले जाते,
लक्ष्मण को पीछे
दौड़ाते दुनिया के नाते,
उधर कपट से
मारीचों की
वाणी भरी हुई I
छद्म आवरण पहन
कुटिलता
फैलाती झोली,
वाग्जाल में
उलझ रही हैं
सीताऐं भोली,
विश्वासों की
मानस-काया तो
अधमरी हुई।
हो भविष्य के पन्नों पर
ऐसा कोई कल हो,
व्याघ्र दृष्टि की
लोलुपता का
कोई तो हल हो,
अभी व्यवस्था
दुष्ट जनों की ही
सहचरी हुई।

 

सब उन्मादे हैं

किसे दोष दें
इस बस्ती में
सब उन्मादे हैं

कुँए में ही
भाँग पड़ी है
गाँव हुआ पागल,
बूंद बूंद में
नशा भरा है
छलक रही छागल,

बौरायी बातों की
गठरी
सिर पर लादे हैं

नियम कायदे
रखे ताक पर
करते मनमानी,
खूटी पर
सूखती सभ्यता
माँग रही पानी,

मोहक मुस्कानों के पीछे
झूठे वादे हैं

अन्दर बाहर
बात बात पर
हर दिन दंगल है,
मन में
खरपतवारों की
फसलें हैं, जंगल है

जिस डाली पर
उसको काटें
सीधे सादे हैं

 

आशा के दीप

साँझ सवेरे उद्बोधन के गीत सुनायेंगे ।
भग्न-दिलों में हम आशा के दीप जलायेंगे ।।

अगर सफलता नहीं मिली तो हार न मानेंगे,
कहाँ कमी रह गयी हमारी, हम पहचानेंगे,
एक दिन यही प्रयास हमारे मंजिल पायेंगे ।
भग्न-दिलों में हम आशा के दीप जलायेंगे ।।

कोशिश यही हमारी सब में भाईचारा हो,
जाति, वर्ण, मजहब के कारण क्यों बँटवारा हो,
मानव-धर्म सभी से बढ़कर – यह सिखलायेंगे।
भग्न-दिलों में हम आशा के दीप जलायेंगे ।।

हम सबके सुख दुःख में सम्मिलित होकर जीयेंगे,
हम सबके हित नीलकण्ठ बन विष भी पीयेंगे,
हम सबको आदर्श और सन्मार्ग दिखायेंगे ।
भग्न-दिलों में हम आशा के दीप जलायेंगे ।।

स्वप्न लोक की निरी कल्पना में क्यों खोयेंगे,
हम किरणों की फसल उगायें, ऐसा बोयेंगे,
इस धरती को हम सब मिलकर स्वर्ग बनायेंगे ।
भग्न-दिलों में हम आशा के दीप जलायेंगे ।।

सब के मन में खुशियों की फसलें लहरायेंगी,
कदम कदम पर वनिताएँ मिल मंगल गायेंगी,
भागीरथी प्रयास हमारे व्यर्थ न जायेंगे ।
भग्न-दिलों में हम आशा के दीप जलायेंगे ।।

 

नया दौर

परिवर्तन के
नये दौर में
सब कुछ बदल गया।

भूली कोयल
गीत सुरीले
मँहगाई की मारी,
उपवन में
सन्नाटा छाया
पसर गयी लाचारी,

कैसे जुटें
नीड़ के साधन
व्याकुल हुई बया।

जान बूझ कर बन्दर
मिल कर
मस्ती मार रहे,
जहाँ लग रहा दाँव
वहीं से
माल डकार रहे,
कोई जिये मरे
उनको क्या
उन्हें न हया, दया।

जंगल के राजा ने
सुनकर
राशन भिजवाया,
कुछ को थोड़ा बाँट
तिकड़मी
जोड़ रहे माया,

मन में लड्डू फूट रहे
संसाधन
मिला नया।

 

कितना बदला बदला लगता

कितना बदला बदला लगता, मुझको अपना गाँव ।
गली गली में पसरे हैं अब राजनीति के दाँव ।।

नहीं दिख रहे बैल और हल,
खोई है पनघट की हलचल,
कहाँ मुस्कराहट वह चंचल,
कहाँ सुरीले गीत और वह छम छम करते ठाँव ।।

स्वप्न हो गया है अघियाना,
बंद प्रेम-मय आना जाना,
हर कोई खुद में मस्ताना,
कैसे मिले गले अब कोई, ठिठके सबके पाँव ॥

ढप ढोलक की थाप कहाँ अब,
प्रेम-मंत्र का जाप कहाँ अब,
मानवता की छाप कहाँ अब,
कोयल कहाँ, बस गये कौए अमराई की छाँव ।
कितना बदला बदला लगता, मुझको अपना गाँव ।।

 

समय की पगडंडियों पर

समय की पगडंडियों पर
चल रहा हूँ मैं निरंतर।

कभी दाएँ, कभी बाएँ,
कभी ऊपर, कभी नीचे,
वक्र पथ कठिनाइयों को
झेलता हूँ आँख मींचे,
कभी आ जाता अचानक
सामने अनजान सा डर।

साँझ का मोहक इशारा
स्वप्न-महलों में बुलाता,
जब उषा नवगीत गाती
चौंक कर मैं जाग जाता,
और सहसा निकल आते
चाहतों के फिर नये पर।

याद की तिर्यक गली में
कहीं खो जाता पुरातन,
विहँस कर होता उपस्थित
बाँह फैलाये नयापन,
रूपसी प्राची रिझाती
विविध रूपों में सँवर कर।

 

देश

हरित धरती,
थिरकती नदियाँ,
हवा के मदभरे सन्देश।
सिर्फ तुम भूखंड की सीमा नहीं हो देश ।।

भावनाओं, संस्कृति के प्राण हो,
जीवन कथा हो,
मनुजता के अमित सुख,
तुम अनकही अंर्तव्यथा हो,
प्रेम, करुणा,
त्याग, ममता,
गुणों से परिपूर्ण हो तपवेश।
सिर्फ तुम भूखंड की सीमा नहीं हो देश ।।

पर्वतों की श्रृंखला हो,
सुनहरी पूरब दिशा हो,
इंद्रधनुषी स्वप्न की
सुखदायिनी मधुमय निशा हो,
गंध, कलरव,
खिलखिलाहट, प्यार
एवं स्वर्ग सा परिवेश।
सिर्फ तुम भूखंड की सीमा नहीं हो देश ।।

तुम्हीं से यह तन,
तुम्हीं से प्राण, यह जीवन,
मुझ अकिंचन पर
तुम्हारी ही कृपा का धन,
मधुरता, मधुहास,
साहस,
और जीवन-गति तुम्हीं, देवेश।
सिर्फ तुम भूखंड की सीमा नहीं हो देश ।।

 

शंख में रण-स्वर भरो अब

कृष्ण ! निशिदिन घुल रहा है सूर्यतनया में जहर ।
बाँसुरी की धुन नहीं है,
भ्रमर की गुन-गुन नहीं है,
कंस के व्यामोह में पागल हुआ सारा शहर ।

पूतना का मन हरा है,
दुग्ध, दधि में विष भरा है,
प्रदूषण के पक्ष में हैं ताल, तट, नदियां, नहर ।

निशाचर-गण हँस रहे हैं,
अपरिचित भय डस रहे हैं,
अब अँधेरे से घिरे हैं सुबह, संध्या, दोपहर ।

शंख में रण-स्वर भरो अब
कष्ट वसुधा के हरो अब,
हाथ में लो चक्र, जाएँ आततायी पग ठहर ।

 

जय हिंदी, जय भारती

सरल, सरस भावों की धारा,
जय हिन्दी, जय भारती ।

शब्द शब्द में अपनापन है,
वाक्य भरे हैं प्यार से,
सबको ही मोहित कर लेती
हिन्दी निज व्यवहार से,

सदा बढ़ाती भाई-चारा,
जय हिंदी, जय भारती ।

नैतिक मूल्य सिखाती रहती,
दीप जलाती ज्ञान के,
जन-गण-मन में द्वार खोलती
नूतनतम विज्ञान के,

नव-प्रकाश का नूतन तारा,
जय हिन्दी, जय भारती ।

देवनागरी, भर देती है
संस्कृति की नव-गंध से,
इन्द्रधनुष से रंग बिखराती
नव-रस, नव-अनुबंध से,

विश्व-ग्राम बनता जग सारा,
जय हिन्दी, जय भारती ।

 

फूल

फूल हैं , सुगन्ध बनके बह रहे हैं हम ।
कंटकों में भी खुशी से रह रहे हैं हम ॥
जिंदगी वही है, जो खुशी दे और को,
मौन हैं, मगर सभी से कह रहे हैं हम ।।

चार दिन की जिंदगी हो, कोई गम नहीं,
जितना मिल गया जहाँ में, कोई कम नहीं,
रोयें देखकर अभाव, ऐसे हम नहीं,
ताप भी सहर्ष जग के सह रहे हैं हम ।
फूल हैं, सुगंध बन के बह रहे हैं हम ।।

आम हो कि खास, सबका इंतजार है,
भेदभाव के बिना, सभी से प्यार है,
बस, परोपकार जिंदगी का सार है,
जग असार हो कि सार गह रहे हैं हम ।
फूल हैं, सुगंध बन के बह रहे हैं हम ।।

ध्येय एक हैं, हमारे ढंग हैं अलग,
क्या हुआ जो हर कुसुम के रंग हैं अलग,
माना रूप-रंग, साथ संग हैं अलग,
भेद की दीवार, सारी ढह रहे हैं हम ।
फूल हैं, सुगंध बन के बह रहे हैं हम ।।

 

मन की घनीभूत पीड़ा को

मन की घनीभूत पीड़ा को तुमसे कहूँ, प्रियतमा, कैसे?

शब्दों की अपनी सीमा है
मन के भाव न कह पायेंगे,
अगर उन्हें मजबूर करूँगा
वे कुछ का कुछ कह जायेंगे,
अनुभव को सम्प्रेषित कर दें, शब्द कोश में शब्द न ऐसे।

कभी सोचता हूँ तुमसे कह
मैं तुमको भी दुःखी करूँगा,
मुझे और पीड़ा पहुँचेगी
यदि पीड़ा से तुम्हें भरूँगा
वही दशा होगी मेरी भी, आहत स्वयं कोई हो जैसे।

मैं ही दुःखित नहीं हूँ जग में,
औरों के दुःख और बड़े हैं,
जिधर नजर जाती है मेरी
उधर व्यथित और दुःखी खड़े हैं,
रहता नहीं हमेशा कुछ भी, गुजरेंगे दिन जैसे तैसे ।

जीवन में पग पग पर मुझको
तुम ही देती रहीं दिलासा,
तुम्हीं मेरी स्फूर्ति रही हो,
तुमसे मिली मुझे नव-आशा,
प्रिये, तुम्हारे युगल-नयन ही मेरी ताकत बनते वैसे ।

 

सपनों में ही आओ, तुम

तड़फ रहा हूँ बिना तुम्हारे, सपनों में ही आओ तुम ।
मैं अपने मन की कह डालूँ, अपनी मुझे सुनाओ तुम ।।

नहीं कट रहे अब काटे से
बैरी लगते दिन सारे,
लम्बी हुईं विरह की रातें का,
मैं गिन गिन तारे,
आशाओं के मोती अपने आँचल में भर लाओ तुम ।

मुझको सूना सूना लगता
बिना तुम्हारे घर-आँगन,
पथ देखा, पथराईं आँखें
मुरझाया मेरा तन-मन,
प्यासे प्राण पुकारे तुम को, अब जल्दी आ जाओ तुम ।

उपवन खिला महकता, लेकिन
मन की कली न एक खिली,
कोयल गा गा थकी बाग में
मुझको राहत नहीं मिली,
मेरा रोम रोम झंकृत हो, कुछ तो ऐसा गाओ तुम ।

प्यासे नयन, अधर प्यासे हैं,
मन की बात कहूँ कैसे,
तुम बिन भार हुआ यह जीवन
मैं दुःख-दर्द सहूँ कैसे,
मेरा तुम्ही सहारा जग में, मुझे न यूँ बिसराओ तुम ।

साँस साँस नित तुम्हें पुकारे,
प्राण हुए कितने बेकल,
यादों का ही दामन थामे
काट रहा हूँ मैं पल पल,
बिना तुम्हारे मैं मृत जैसा, आकर अमी पिलाओ तुम ।

 

जीवन में कितना रस है

प्रिये, तुम्हारा प्रेमामृत पा, जीवन में कितना रस है ।
चकित काम-रति, मधु ऋतु लज्जित, व्यथित माधुरी बेवश है।।

जीत गया हूँ जगत अखिल यह
जब से तुम पर दिल हारा,
लगने लगा हर घड़ी मुझको,
इस जग का कण कण प्यारा,
बरसायें मधु बात तुम्हारी, रस में डूबी नस नस है ।

तुम्हीं रोम में, साँसों में तुम
तुम प्राणों का स्पंदन,
छलक रहा मन में सुख-सागर
प्रिये, तुम्हारा अभिनन्दन,
बंकिम नयन, अधर रस भीने, रूप तुम्हारा दिलकश है ।

बदल रहा है इस दुनिया को
पल पल, क्षण क्षण परिवर्तन,
बदल रहे तन बदन हमारे
किन्तु न बदले अपना मन,
जैसे अटल खड़ा हो गिरिवर, प्रिये, प्रेम जस का तस है।

चाहत यही शेष मन में अब
तुम्हें हमेशा प्यार करूँ,
हर जीवन में साथ रहो तुम
जितने भी मैं रूप धरूँ,
बने मनुज, पशु, पक्षी, पादप, इस पर कब किसका वश है।

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