सबसे ग़रीब इन्सान-वंशीवट सूना है -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

सबसे ग़रीब इन्सान-वंशीवट सूना है -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

(एक प्राचीन बोध-कथा)

एक था बियाबान
बियाबान में था एक क़ब्रिस्तान,
क़ब्रिस्तान में रहता था एक मलंग,
पागलों से थे उसके ढंग।
क़ब्रिस्तान में गड़ा था एक पत्थर
जिस पर अंकित थे शब्दाक्षर।
“यहाँ एक अनमोल ख़जाना है गड़ा
सदियों से जो सड़ रहा है पड़ा-पड़ा
कोई भी आये
क़ब्रें खोदे
और ख़जाना ले जाये।”

जो भी यात्री उधर से गुज़रता
पागल सबको उस शिलालेख की ओर संकेत करता
कहता-“आओ
क़ब्र खोदो और ख़जाना ले जायो ।”
मगर ग़रीब से ग़रीब
भिखारी ने भी वो ख़जाना नहीं छुआ
सब उससे बचकर निकल जाते
जैसे वो हो कोयी मौत का कुँआ
तभी निकला एक दिन
उधर से एक सम्राट
जो लूट कर ला रहा था
किसी अन्य राजा का राज पाट
अकूत धन उसके पास था
मगर उसका लोभ
विस्तार आकाश का था
पागल ने उसे भी वो शिलालेख पढ़वाया
उसे पढ़ कर सम्राट
खुशी से फूला नहीं समाया
और फिर बिना कुछ सोचे-समझे
उसने पूरा का पूरा क़ब्रिस्तान खुदवाया
मगर हाय री तक़दीर
मुर्दों की हड्डियों के सिवा
उसके हाथ कुछ न आया।
सम्राट जब अपनी
विफलता पर झुंझला रहा था
तब पागल यह कहकर
मुस्करा रहा था-
“दुनिया का सबसे ग़रीब इन्सान
देखने की इच्छा बरसों से थी
मेरे मन में
सो हे सम्राट
तुझे देखकर
पूरी हुई इस निर्जन में
जिसे नसीब न था
एक भी दाना,
एक ग़रीब तक ने
छुआ नहीं ये ख़जाना
उसी के पाने को
होते हुए भी सब ठाठ-बाट
रखते हुए भी सब राजपाट
तूने मुर्दों की कब्रों तक को
किया तबाह
तेरे लोभ की है कोई इन्तिहा,
तुझसे बढ़कर और
कौन ग़रीब होगा ओ शहंशाह।

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