सबके हों ये काबा काशी- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

सबके हों ये काबा काशी- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

फिर न उजड़ें भारतवासी अब कोई विध्वंस न हो
सबके हों ये काबा काशी अब दंगों का दंश न हो
तनिक हवा अब मत देना नफरत की चिंगारी को
ऊँच नीच का भेद बताते ढोंगी धर्म प्रभारी को
अफवाहों के घोड़ों पर जो सवार हो आती है
पास न अपने आने देना उस कलुषित बीमारी को
मिथ्या रूप बनाते फर्जी धर्म के जो रखवाले हैं
देखो खुद को रंग पोतकर कौवा कोई हंस न हो
फिर न उजड़ें भारतवासी अब कोई विध्वंस न हो
सबके हों ये काबा काशी अब दंगों का दंश न हो
उनसे भी तुम दूर रहो जो सत्ता सुख के पालक हैं
उन्नत भारत परिपथ के वो सबसे बड़े कुचालक हैं
ये रोज फसाद कराते हैं कुर्सी पर क़ाबिज़ रहने को
जीवननाशक उपद्रव रथ के ये नेता ही संचालक हैं
कृष्ण सरीखा ही चुनना तुम राजनीति के रक्षक को
जनमानस हृदय सिंहासन पर देखो कोई कंस न हो
फिर न उजड़ें भारतवासी अब कोई विध्वंस न हो
सबके हों ये काबा काशी अब दंगों का दंश न हो
जाँच कराने लायक अब ये धर्मध्वजा अधिकारी हैं
ठग चोर लुटेरे इनमें भी हैं ये छँटे हुए व्यभिचारी हैं
नेताओं संग ये भी मिलकर देश हमारा लूट रहे
मुल्ला पंडित नेताओं में बहुत से भ्रष्टाचारी हैं
उनको खींच उतारो जो हैं शान से बैठे कुर्सी पर
गाँधी के इस रामराज्य में अब रावण का वंश न हो
फिर न उजड़ें भारतवासी अब कोई विध्वंस न हो
सबके हों ये काबा काशी अब दंगों का दंश न हो

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