सप्तम सर्ग -साकेत-मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Saket Part 8

सप्तम सर्ग -साकेत-मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Saket Part 8

सप्तम सर्ग

’स्वप्न’ किसका देखकर सविलास
कर रही है कवि-कला कल-हास?
और ’प्रतिमा’ भेट किसकी भास,
भर रही है वह करुण-निःश्वास?

छिन्न भी है, भिन्न भी है, हाय!
क्यों न रोवे लेखनी निरुपाय?
क्यों न भर आँसू बहावे नित्य?
सींच करुणे, सरस रख साहित्य!

जान कर क्या शून्य निज साकेत,
लौट आये राम अनुज-समेत?
या उन्हीं के अन्य रूप अनन्य,
ये भरत-शत्रुघ्न दोनों धन्य?
क्यों हुए हैं ये उदास अशान्त?
शीघ्र यात्रा ने किया है क्लान्त?
या कि विधु में ज्यों मही की म्लानि,
दूर भी विम्बित हुई गृह-ग्लानि?

“सूत, रथ की गति करो कुछ मन्द,
अश्व अपने से चलें स्वच्छन्द।
अनुज, देखो, आ गया साकेत,
दीखते हैं उच्च राज-निकेत।
काम्य, कर्बुर, केतु-भूषित अट्ट,
गगन में ज्यों सान्ध्य घन-संघट्ट।
अवनि-पूण्याकृष्ट, लोक-ललाम,
मौन खिंच आया यथा सुरधाम!
किन्तु करते हाय! आज प्रवेश,
काँपता है क्यों हृदय सविशेष!
जान पड़ता है, न जाकर आप,
मैं खिंचा जाता, खिंचे ज्यों चाप!
जब उमड़ना चाहिए आह्लाद,
हो रहा है क्यों मुझे अवसाद?
निकट ज्यों ज्यों आ रहा है गेह,
सिहरती है क्यों न जानें देह?
बन्धु, दोनों ओर दो तुम ध्यान,
आ गये ये वाह्य नगरोद्यान।
हो रही सन्ध्या अभी उपलब्ध,
किन्तु मानों अर्द्धनिशि निस्तब्ध!
नागरिक-गण-गोष्ठियों से हीन,
आज उपवन हैं विजन में लीन।
वृक्ष मानों व्यर्थ बाट निहार,
झँप उठे हैं झींम, झुक, थक, हार!
कर रही सरयू जिसे कुछ रुद्ध,
बह रही है वायु-धारा शुद्ध।
पर किसे है आज इसकी चाह?
भर रही यह आप ठण्डी आह!
जा रहा है व्यर्थ सुरभि-समीर,
हैं पड़े हत-से सरों के तीर!

देख कर ये रिक्त क्रीड़ाक्षेत्र,
हैं भरे आते उमड़ कर नेत्र।
याद है, घुड़दौड़ का वह खेल,
हँस मुझे जब हाथ से कुछ ठेल,
हय उड़ा कर, उछल आप समक्ष,
प्रथम लक्ष्मण ने धरा ध्वजलक्ष?
दीख पड़ते हैं न सादी आज,
गज न लाते हैं निषादी आज,
फिर रही गायें रँभाती दूर,
भागते हैं श्लथ-शिखण्ड मयूर।
पार्श्व से यह खिसकती-सी आप,
जा रही सरयू बही चुपचाप।
चल रही नावें न उसमें तैर,
लोग करते हैं न तट पर सैर।
कुछ न कुछ विघटित हुआ विभ्राट,
विप्र-पंक्ति-विहीन हैं सब घाट।
क्या हुआ सन्ध्यार्ध्य का वह ठाठ?
सुन नहीं पड़ता कहीं श्रुति-पाठ!
ये तरणि अपने अतुल कुल-मूल,
सुरस देते हैं जिन्हें युग कूल,

उदित थे जिस लालिमा के संग
अस्त भी हैं रख वही रस-रंग।
आयँगे फिर ये इसी विध कल्य,
जन्म-जीवन का यही साफल्य।
नमन तुमको देव, निज कुलकेतु,
तुम तपो चिरकाल इस भव-हेतु।
जानते हैं अनुज, अपने ज्येष्ठ,
मुक्ति से आवागमन यह श्रेष्ठ।
धड़कता है किन्तु मेरा चित्त,
भड़कता है भावना का पित्त।
निकट हो दिनरात-सन्धि सहर्ष,
किन्तु जँचता है मुझे संघर्ष।
दीखता है अन्धकार समीप,
भीत मत हो, आर्य हैं कुल-दीप।”

तब कहा शत्रुघ्न ने भर आह-
“था कहाँ मेरा विचार-प्रवाह!
घर पहुँच कर, कल्पना के साथ,
हो रहा था मैं सहर्ष सनाथ।
पूछते थे कुशल मानों तात;
प्रेम-पूर्वक भेटते थे भ्रात।
बढ़ रहा था जननियों का मोद;
हँस रही थीं भाभियाँ सविनोद।
कह यहाँ के वृत्त सहचर बाल,
पूछते थे सब वहाँ के हाल।
प्राप्त मातुल से हुए जो द्रव्य,
था अमात्यों को वही सब श्रव्य।
सब हमें नव, हम सभी को नव्य,
हो रहे थे ज्ञात कितने भव्य।
वेष-भाषा-भंगियों पर हास्य
कर रहे थे सरस सबके आस्य।
हम अतिथि-से थे स्वगृह में आज,
सम्मिलित था क्या अपूर्व समाज।
हो रहा था हर्ष, उत्सव, गान,
और सबका संग भोजन-पान।
पर निरख अब दृश्य के विपरीत,
हो उठा हूँ आर्य्य, मैं अति भीत।
जान पड़ता है, पिता सविशेष
रुग्ण होकर पा रहे हैं क्लेश।”

“रुग्ण ही हों तात हे भगवान?”
भरत सिहरे शफर-वारि-समान।
ली उन्होंने एक लम्बी साँस,
हृदय में मानों गड़ी हो गाँस।

“सूत तुम खींचे रहो कुछ रास,
कर चुके हैं अश्व अति आयास।
या कि ढीली छोड़ दो, हा हन्त,
हो किसी विध इस अगति का अन्त!
जब चले थे तुम यहाँ से दूत,
तब पिता क्या थे अधिक अभिभूत?
पहुँच ही अब तो गये हम लोग,
ठीक कह दो, था उन्हें क्या रोग?”
दूत बोला उत्तरीय समेट-
“कर सका था मैं न प्रभु से भेट।
आप आगे आ रहा जो वीर,
आप हों उसके लिए न अधीर।”

प्राप्त इतने में हुआ पुर-द्वार,
प्रहरियों का मौन विनयाचार।
देख कर उनका गभीर विषाद,
भरत पूछ सके न कुछ संवाद।
उभय ओर सुहर्म्य पुलिनाकार,
बीच में पथ का प्रवाह-प्रसार।
बढ़ चला निःशब्द-सा रथ-पोत,
था तरंगित मानसिक भी श्रोत।
उच्च थी गृहराजि दोनों ओर,
निकट था जिसका न ओर न छोर।
राजमार्ग-वितान-सा था व्योम,
छत्र-सा ऊपर उदित था सोम।

“क्या यही साकेत है जगदीश!
थी जिसे अलका झुकाती शीश।
क्या हुए वे नित्य के आनन्द?
शान्ति या अवसन्नता यह मन्द?
है न क्रय-विक्रय, न यातायात,
प्राणहीन पड़ा पुरी का गात।
सुन नहीं पड़ती कहीं कुछ बात,
सत्य ही क्या तब नहीं हैं तात?
आज क्या साकेत के सब लोग,
सांग कर अपने अखिल उद्योग,
शान्त हो बैठे सहज ही श्रान्त?
दीखते हैं किन्तु क्यों उद्भ्रान्त?
सब कला-गृह शिक्षणालय बन्द,
छात्र क्यों फिरते नहीं स्वच्छन्द?
हो रहे बालक बँधे-से कीर,
बाल्य ही में वृद्ध-सम गंभीर!
झिमिट आते हैं जहाँ जो लोग,
प्रकट कर कोई अकथ अभियोग,
मौन रहते हैं खड़े बेचैन;
सिर झुका कर फिर उठाते हैं न।”

चाहते थे जन-करें आक्षेप,
दीखते थे पर भरत निर्लेप।
देख उनका मुख समक्ष समोह,
भूल जाते थे सभी विद्रोह।

“ये गगन-चुम्बित महा प्रासाद,
मौन साधे हैं खड़े सविषाद।
शिल्प-कौशल के सजीव प्रमाण,
शाप से किसके हुए पाषाण!
या अड़े हैं मेटने को आधि,
आत्मचिन्तन-रत अचल ससमाधि
किरणचूड़, गवाक्ष-लोचन मींच,
प्राण-से बह्माण्ड में निज खींच?
सूत, मागध, वन्दि, याचक, भृत्य,
दीख पड़ते हैं न करते कृत्य।
एक प्रहरी ही, सतर्क विशेष,
व्यक्त करते हैं अशुभ उन्मेष!”

“आगये!” सहसा उठा यह नाद,
बढ़ गया अवरोध तक संवाद।
रथ रुका, उतरे उभय अविलंब;
ले सचिव सिद्धार्थ-कर-अवलम्ब।
“हो गये तुम जीर्ण ऐसे तात!
मैं सुनूँगा क्या भयानक बात?”
मुँह छिपा सचिवांक में तत्काल,
होगये चुप भरत आँसू डाल।
सचिव उनको एक बार विलोक,
ले चले, आँसू किसी विध रोक।
“मैं कहूँ तुमसे भयानक बात?
राज्य भोगो तुम जयी-कुल-जात!”
भरत को क्या ज्ञात था वह भेद,
तदपि बोले वे सशंक, सखेद-
“तात कैसे हैं?” सचिव की उक्ति-
“पा चुके वे विश्व-बाधा-मुक्ति।”
“पर कहाँ हैं इस समय नरनाथ?”
सचिव फिर बोले उठा कर हाथ-
“सब रहस्य जहाँ छिपे हैं रम्य,
योगियों का भी वहाँ क्या गम्य?”
“किन्तु उनके पुत्र हैं हम लोग,
मार्ग दिखलाओ, मिले शुभयोग।”
“मार्ग है शत्रुघ्न, दुर्गम सत्य,
तुम रहो उनके यथार्थ अपत्य।”

आगया शुद्धान्त का था द्वार,
एक पद था देहली के पार,
“हा पितः!” सहसा चिहुँक, चीत्कार,
गिर पड़े सुकुमार भरत कुमार!

केकयी बढ़ मन्थरा के साथ,
फेरने उन पर लगी झट हाथ।
रह गये शत्रुघ्न मानों मूक;
कण्ठरोधक थी हृदय की हूक।
देर में निकली गिरा-“हा अम्ब!
आज हम सब के कहाँ अवलम्ब?
देखने को तात-शून्य निकेत,
क्या बुलाये हम गये साकेत?”
सिहर कर गिरते हुए से काँप,
बैठ वे नीचे गये मुँह ढाँप।
“वत्स, स्वामी तो गये उस ठौर,
लौटना होगा न जिससे और!”
“कौन था हम से अधिक हा शोक!
वे गये जिसके लिए उस लोक?
हृदय, आशंका हुई क्या ठीक,
होगई आशा अशेष अलीक!”

“मैं स्वयं पतिघातिनी हूँ हाय!
जीव जीवन-मृत्यु का व्यवसाय!”
“हा! अमर भी मृत्यु-करगत जीव!
मुक्त होकर भी अधीन अतीव!
किन्तु साधारण न थी वह व्यक्ति,
अतुल थी जिसकी अलौकिक शक्ति।
जीर्ण तुमको जान सहसा तात!
कर गया क्या काल यह अपघात?
तो धरा-धन हो भले ही ध्वस्त,
आर्य, हो जाओ तनिक आश्वस्त।
हम करेंगे काल से संग्राम,
हैं कहाँ अग्रज हमारे राम?”
“हैं कहाँ वे सजल घन-सम श्याम?”
वन न था हा! किन्तु वह था धाम।
“वन गये वे अनुज-सीता-युक्त”
“वन गये?” बोले भरत भयभुक्त।
“तो सँभालेगा हमें अब कौन?
यों अनाश्रित रह सका कब कौन?”
“आर्य का औदास्य यह अवलोक
सहम-सा मेरा गया पितृ-शोक!”

“अनुज, ठहरो, मैं लगा दूँ होड़,
रह सकें यदि आर्य हमको छोड़,
जायँ वे इस गेह ही से रूठ
यह असम्भव, झूठ, निश्वय झूठ!
हँस रही यह मन्थरा क्यों घूर?
री अभागिन! दूर हो तू दूर।
भेद है इसमें निहित कुछ गूढ़,
माँ कहो, मैं हो रहा हूँ मूढ़।”
“वत्स, मेरा भी इसी में सार,-
जो किया, कर लूँ उसे स्वीकार।
साक्षि हों अनपेक्ष्य मेरे अर्थ,
सत्य कर दे सर्व सहन-समर्थ।
तो सुनों, यह क्यों हुआ परिणाम,-
प्रभु गये सुर-धाम, वन को राम।
माँग मैं ने ही लिया कुल-केतु,
राजसिंहासन तुम्हारे हेतु।”

“हा हतोस्मि!” हुए भरत हतबोध,
“हूँ” कहा शत्रुघ्न ने सक्रोध।
ओंठ काटा और पटका पैर,
किन्तु लेता वीर किससे वैर?
केकयी चिल्ला उठी सोन्माद-
“सब करें मेरा महा अपवाद,
किन्तु उठ ओ भरत, मेरा प्यार,
चाहता है एक तेरा प्यार।
राज्य कर, उठ वत्स, मेरे बाल,
मैं नरक भोगूँ भले चिरकाल।
दण्ड दे, मैंने किया यदि पाप,
दे रही हूँ शक्ति वह मैं आप।”
“दण्ड, ओहो दण्ड, कैसा दण्ड?
पर कहाँ उद्दण्ड ऐसा दण्ड?
घोर नरकानल चिरन्तन चण्ड,
किन्तु वह तो है यहाँ हिम-खण्ड!
चण्डि! सुनकर ही जिसे, सातंक,
चुभ उठें सौ बिच्छुओं के डंक,
दण्ड क्या उस दुष्टता का स्वल्प?-
है तुषानल तो कमल-दल-तल्प!
जी, द्विरसने! हम सभी को मार,
कठिन तेरा उचित न्याय-विचार।

मृत्यु? उसमें तो सहज ही मुक्ति,
भोग तू निज भावना की भुक्ति।
धन्य तेरा क्षुधित पुत्र-स्नेह,
खा गया जो भून कर पति-देह!
ग्रास करके अब मुझे हो तृप्त,
और नाचे निज दुराशय-दृप्त!”
“चुप अरे चुप, केकयी का स्नेह
जान पाया तू न निस्सन्देह।
पर वही यह वत्स, तुझमें व्याप्त,
छोड़ता है राज-पद भी प्राप्त।
सब करें मेरा महा अपवाद,
किन्तु तू तो कर न हाय! प्रमाद।
हो गये थे देव जीवन्मुक्त,
उचित था जाना न ऋण-संयुक्त।
ले लिये इस हेतु वर युग लभ्य,
उचित मानेंगे इसे सब सभ्य।
’क्या लिया’ बस, है यहीं सब शल्य,
किन्तु मेरा भी यहीं वात्सल्य।”
“सब बचाती हैं सुतों के गात्र,
किन्तु देती हैं डिठोना मात्र।

नील से मुहँ पोत मेरा सर्व,
कर रही वात्सल्य का तू गर्व!
खर मँगा, वाहन वही अनुरूप,
देख लें सब-है यही वह भूप!
राज्य, क्यों माँ, राज्य, केवल राज्य?
न्याय-धर्म-स्नेह, तीनों त्याज्य!
सब करें अब से भरत की भीति,
राजमाता केकयी की नीति-
स्वार्थ ही ध्रुव-धर्म हो सब ठौर!
क्यों न माँ? भाई, न बाप, न और!
आज मैं हूँ कोसलाधिप धन्य,
गा, विरुद गा, कौन मुझ-सा अन्य?
कौन हा! मुझ-सा पतित-अतिपाप?
हो गया वर ही जिसे अभिशाप!
तू अड़ी थी राज्य ही के अर्थ,
तो न था तेरा तनय असमर्थ।
और भू पर था न कोसल मात्र,
छत्र-भागी है कहीं भी क्षात्र।
क्षत्रियों के चाप-कोटि-समक्ष,
लोक में है कौन दुर्लभ लक्ष?

था न किस फल का तुझे अधिकार
सुत न था मैं एक, हम थे चार!
सूर्यकुल में यह कलंक कठोर!
निरख तो तू तनिक नभ की ओर।
देख तेरी उग्र यह अनरीति,
खस पड़ें नक्षत्र ये न सभीति!
भरत-जीवन का सभी उत्साह,
हो गया ठंडा यहाँ तक आह!
ये गगन के चन्द्रमणि-मय हार,
जान पड़ते हैं ज्वलित अंगार!
कौन समझेगा भरत का भाव-
जब करे माँ आप यों प्रस्ताव!
री, हुआ तुझको न कुछ संकोच?
तू बनी जननी कि हननी, सोच!
इष्ट तुझको दृप्त-शासन-नीति,
और मुझको लोक-सेवा-प्रीति।
वेन होता योग्य जिसका जात,
जड़भरत-जननी वही विख्यात!
व्यर्थ आशा, व्यर्थ यह संसार,”
रो दिया, हो मौन राजकुमार।

थे भरे घन-से खड़े शत्रुघ्न,
बरस अब मानों पड़े शत्रुघ्न-
“तुम यहाँ थे हाय! सोदरवर्य,
और यह होता रहा, आश्चर्य!
वे तुम्हारे भुज-भुजंग विशाल,
क्या यहाँ कीलित हुए उस काल?
राज्य को यदि हम बना लें भोग,
तो बनेगा वह प्रजा का रोग।
फिर कहूँ मैं क्यों न उठ कर ओह!
आज मेरा धर्म राजद्रोह!
विजय में बल और गौरव-सिद्धि;
क्षत्रियों के धर्म-धन की वृद्धि,
राज्य में दायित्व का ही भार,
सब प्रजा का वह व्यवस्थागार।
वह प्रलोभन हो किसी के हेतु,
तो उचित है क्रान्ति का ही केतु।
दूर हो ममता, विषमता, मोह,
आज मेरा धर्म राजद्रोह।
त्याग से भी कठिन जिसकी प्राप्ति,
स्वार्थ की यदि हो उसी में व्याप्ति,

छोड़ दूँ तो क्यों न मैं भी छोह?
आज मेरा धर्म राजद्रोह।
दो अभीप्सित दण्ड मुझको अम्ब,
न्याय ही शत्रुघ्न का अवलम्ब,
मैं तुम्हारा राज्य-शासन-भार,
कर नहीं सकता यथा स्वीकार।
मानते थे सब जिसे निज शक्ति,
बन गई अब राजभक्ति विरक्ति।
हा! अराजक भाव, जो था पाप,
कर दिया है पुण्य तुमने आप।
राज-पद ही क्यों न अब हट जाय?
लोभ-मद का मूल ही कट जाय।
कर सके कोई न दर्प न दम्भ,
सब जगत में हो नया आरम्भ।
विगत हों नर-पति, रहें नर मात्र,
और जो जिस कार्य के हों पात्र-
वे रहें उस पर समान नियुक्त;
सब जियें ज्यों एक ही कुलभुक्त।”
“अनुज, उस राजत्व का हो अन्त,
हन्त! जिस पर केकयी के दन्त।

किन्तु राजे राम-राज्य नितान्त-
विश्व के विद्रोह करके शान्त।
रघु-भगीरथ-सगर-राज्य-किरीट,
केकयी का सुत भरत मैं ढीट,
यदि छुऊँ तो पाप-कर गल जाय,
या वही अनुताप से जल जाय!
तात, राज्य नहीं किसी का वित्त,
वह उन्हीं के सौख्य-शान्ति-निमित्त-
स्वबलि देते हैं उसे जो पात्र;
नियत शासक लोक-सेवक मात्र!”
“आर्य, छाती फट रही है हाय!
राज्य भी अब तो बना व्यवसाय।
हम उसे लें बेच कर भी धर्म,
अतुल कुल में आज ऐसा कर्म!
भ्रातृ-निष्कासन, पिता का घात,
हो चुके दो दो जहाँ उत्पात!
और दो हों-मातृवध, गृहदाह,
बस यही इस चित्त की अब चाह!
पूर्ण हो दुरदृष्टि तेरी तुष्टि!”
वीर ने मारी हृदय पर मुष्टि।

उठ भरत ने धर लिया झट हाथ,
और वे बोले व्यथा के साथ-
“मारते हो तुम किसे हे तात!
मृत्यु निष्कृत हो जिसे हे तात?
छोड़ दो इसको इसी पर वीर,
आर्य-जननी-ओर आओ धीर!”

युगल कण्ठों से निकल अविलम्ब
अजिर में गूँजी गिरा-“हा अम्ब!”
शोक ने ली अफर आज डकार-
वत्स हम्बा कर उठे डिडकार!
सहन कर मानों व्यथा की चोट
हृदय के टुकड़े उड़े सस्फोट-
“तुम कहाँ हो अम्ब, दीना अम्ब,
पति-विहीना, पुत्र-हीना अम्ब!
भरत-अपराधी भरत-है प्राप्त,
दो उसे आदेश अपना आप्त।
आज माँ, मुझ-सा अधम है कौन?
मुँह न देखो, पर न हो तुम मौन।
प्राप्त है यह राज्यहारी दस्यु,
दूर से षड़यंत्रकारी दस्यु।
आगया मैं-गृहकलह का मूल;
दण्ड दो, पर दो पदों की धूल।”

“झूठ,-यह सब झूठ, तू निष्पाप;
साक्षिणी तेरी यहाँ मैं आप।
भरत में अभिसन्धि का हो गन्ध,
तो मुझे निज राम की सौगन्ध।
केकयी, सुन लो बहन यह नाद,
ओह! कितना हर्ष और विषाद!”
पूर्ण महिषी का हुआ उत्संग,
जा गिरा शवरीशरार्त – कुरंग।
“वत्स रे आ जा, जुड़ा यह अंक;
भानुकुल के निष्कलंक मयंक!
मिल गया मेरा मुझे तू राम,
तू वही है, भिन्न केवल नाम।
एक सुहृदय, और एक सुगात्र,
एक सोने के बने दो पात्र।
अग्रजानुज मात्र का है भेद,
पुत्र मेरे, कर न मन में खेद।
केकयी ने कर भरत का मोह,
क्या किया ऐसा बड़ा विद्रोह?
भर गई फिर आज मेरी गोद,
आ, मुझे दे राम का-सा मोद।
किन्तु बेटा, होगई कुछ देर,
सो गये हैं देव ये मुहँ फेर!
हो गई है हृदय की गति भग्न,
तदपि अब भी स्नेह में हैं मग्न!
देख लो हे नाथ, लो परितोष;
जननियों के पुत्र हैं निर्दोष।”
नाव में नृप किन्तु पाँव पसार,
सुप्त थे भव-सिन्धु के पर-पार।

“हा पिता, यों हो रहे हो सुप्त;
क्या हुई वह चेतना चिरलुप्त?
जिस अभागे के लिए यह काण्ड
आ गया वह भर्त्सना का भाण्ड!
शास्ति दो, पाओ अहो! आरोग्य,
मैं नहीं हूँ यों अभाषण-योग्य।
त्याज्य भी यह नीच हे नरराज,
हो न अन्तिम वचन-वंचित आज!”
“राज्य तुमको दे गये नरराज,
सुत, जलांजलि दो उन्हें तुम आज!
दे तुम्हें क्या वत्स, मेरा प्यार?
लो तुम्हीं अन्त्येष्ठि का अधिकार।
राज्य”-“हा! वह राज्य बन कर काल,
भरत के पीछे पड़ा विकराल!
यह अराजक उग्र आज नितान्त,
प्राण लेकर भी न होगा शान्त!”
“वत्स, धीरे, कठिनता के साथ,
सो सके हैं, छटपटा कर नाथ।
हो न जावे शान्ति उनकी भंग,
धर्म पालो धीरता के संग।
संगिनी इस देह की मैं नित्य,
साक्षि हैं ध्रुव, धरणि, अनलादित्य।
सुत, तुम्हारे भाव ये अविभक्त,
मैं स्वयं उन पर करूँगी व्यक्त।”

“हाय! मत मारो मुझे इस भाँति,
माँ, जियो, मैं जी सकूँ जिस भाँति।
मैं सहन के अर्थ ही, मन-मार,
वहन करता हूँ स्वजीवन-भार।
मैं जियूँ लोकापवाद-निमित्त,
तब न होगा तनिक प्रायश्चित्त?
तुम सभी त्यागो मुझे यदि हाय!
तो मरूँ मैं भी न क्यों निरुपाय?
आर्य को तो मुँह दिखाने योग्य,
रख मुझे ओ भाग्य के फल भोग्य!”
शोक से अति आर्त, अनुज समेत,
भरत यों कह होगये हतचेत।
लोटता हो ज्यों हृदय पर साँप,
सभय कौशल्या-सुमित्रा काँप-
हाय कर, करने लगीं उपचार-
व्यजन, सिंचन, परस और पुकार।
भ्रातृ युग सँभले नयन निज खोल,
पर सके मुँह से न वे कुछ बोल।
देख सुत-हठ और वंश-अरिष्ट,
कह न माँएँ भी सकीं निज इष्ट।

आ गये तब तक तपोव्रतनिष्ठ,
राजकुल के गुरु वरिष्ठ वसिष्ठ।
प्राप्त कर उनके पदों की ओट,
रो पड़े युग बन्धु उनमें लोट-
“क्या हुआ गुरुदेव, यह अनिवार्य?”
“वत्स, अनुपम लोक-शिक्षण-कार्य।
त्याग का संचय, प्रणय का पर्व,
सफल मेरा सूर्यकुलगुरु-गर्व!”
“किन्तु मुझ पर आज सारी सृष्टि,
कर रही मानों घृणा की वृष्टि।
देव, देखूँ मैं किधर, किस भाँति?”
“भरत, तुम आकुल न हो इस भाँति।
वत्स, देखो तुम पिता की ओर,
सत्य भी शव-सा अकम्प कठोर!
और उनका प्रेम-ओघ अभग्न,
वे स्वयं जिसमें हुए चिरमग्न!
और देखो भातृवर की ओर,
त्याग का जिसके न ओर, न छोर।
अतुल जिसकी पुण्य पितर-प्रीति-
स्वकुल-मर्यादा, विनय, नय-नीति।

और उस अग्रज-बधू की ओर,
वत्स, देखो तुम निहार-निहोर।
हाँ, जिसे वे गहन-कण्टक-शूल,
बन गये गृहवाटिका के फूल!
और देखो उस अनुज की ओर,
आह! वह लाक्ष्मण्य कैसा घोर!
वह विकट व्रत और वह दृढ़ भक्ति,
एक में सबकी अटल अनुरक्ति।
और देखो इस अनुज की ओर,
हो रहा जो शोक-मग्न विभोर।
आज जो सब से अधिक उद्भ्रान्त,
सुमन-सम हिमबाष्पभाराक्रान्त!
वत्स, देखो जननियों की ओर,
आज जिनकी भोग-निशि का भोर!”
“हाय भगवन्! क्यों हमारा नाम?
अब हमें इस लोक में क्या काम?
भूमि पर हम आज केवल भार,
क्यों सहे संसार हाहाकार?
क्यों अनाथों की यहाँ हो भीड़?
जीव-खग उड़ जाय अब निज नीड़।”

“देवियो, ऐसा नहीं वैधव्य,
भाव भव में कौन वैसा भव्य?
धन्य वह अनुराग निर्गत-राग,
और शुचिता का अपूर्व सुहाग।
अग्निमय है अब तुम्हारा नाम,
दग्ध हों जिसमें स्वयं सब काम।
सहमरण के धर्म से भी ज्येष्ठ
आयु भर स्वामि-स्मरण है श्रेष्ठ।
तुम जियो अपना वही व्रत पाल,
धर्म की बल-वृद्धि हो चिरकाल।
सहन कर जीना कठिन है देवि,
सहज मरना एक दिन है देवि!
भरत, देखो आप अपनी ओर,
निज हृदय-सागर गभीर हिलोर।
पूर्ण हैं अगणित वहाँ गुण-रत्न,
अमर भी जिनके लिए कृतयत्न।
भरत-भावामृत पियें जन जाग,
मोह-विष था केकयी का भाग।
वत्स, मेरी ओर देखो, ओह!
मैं सगद्गद हूँ, यदपि निर्मोह।

रो रहे हो तुम, परन्तु विनीत,
गा रहे हैं सुर तुम्हारे गीत।
प्राप्त अपने आप ही यह राज्य
कर दिया तृण-तुल्य तुमने त्याज्य।
मति यहाँ शत्रुघ्न, मेरी मौन,
तुम कि लक्ष्मण, अधिक सुकृती कौन?
अब उठो हे वत्स, धीरज धार,
बैठते हैं वीर क्या थक-हार?
शत्रु-शर-सम तुम सहो यह शोक,
सतत कर्मक्षेत्र है नरलोक।
कर पिता का मृत्युकृत्य अपत्य,
लो क्रमागत गोत्र-जीवन-सत्य।
मरण है अवकाश, जीवन कार्य,
कह रहा हूँ आप मैं आचार्य।
व्याप्त हैं तुममें पिता के प्राण,
शोक छोड़ो शूर, पाओ त्राण।
हम रुकें क्यों, चल रही है साँस,
गति न बिगड़े, दे नियति भी आँस।
विघ्न तो हैं मार्ग के कुश-काँस,
फँस न जावे इस हृदय में फाँस।

तात, जीवनगीत सुनकर काल
नाचता है आप, देकर ताल।
सुगति होती है तभी यह प्राप्त,
प्रलय में भी लय रहे निज व्याप्त।
उठ खड़े हो निज पदों पर आज,
धैर्य धारें स्वजन और समाज।
वीर देखो, उस प्रजा की ओर,
चाहती है जो कृपा की कोर।”

सान्त्वना में शोक की वह रात
कट चली, होने लगा फिर प्रात।
दूर बोला ताम्रचूड़ गभीर-
’क्रूर भी है काल निर्झर-नीर।’
अरुण-पूर्व उतार तारक-हार,
मलिन-सा सित-शून्य अम्बर धार,
प्रकृति-रंजन-हीन, दीन, अजस्र,
प्रकृति-विधवा थी भरे हिम-अस्त्र।

आज नरपति का महासंस्कार,
उमड़ने दो लोक-पारावार!

है महायात्रा यही, इस हेतु,
फहरने दो आज सौ सौ केतु!
घहरने दो सघन दुन्दुभि घोर,
सूचना हो जाए चारों ओर-
सुकृतियों के जन्म में भव-भुक्ति,
और उनकी मृत्यु में शुभ-मुक्ति!
अश्व, गज, रथ, हों सुसज्जित सर्व,
आज है सुर-धाम-यात्रा-पर्व!
सम्मिलित हों स्वजन, सैन्य, समाज;
बस, यही अन्तिम विदा है आज।
सूत, मागध, वन्दि आदि अभीत,
गा उठें जीवन-विजय के गीत-
तुच्छ कर नृप मृत्यु-पक्ष समक्ष,
पा गये हैं आज अपना लक्ष।

राजगृह की वह्नि बाहर जोड़,
कर उठे द्विज होम-आहुति छोड़।
कुल-पुरोहित और कुल-आचार्य,
भरत युत करने लगे सब कार्य।
शव बना था शिव-समाधि-समान,
था शिवालय-तुल्य शिविका यान।
और जिनसे था वहन-सम्बन्ध,
थे भरत के भव्य-भद्र-स्कन्ध।
बज रहे थे झाँझ, झालर, शंख,
पा गया जयघोष अगणित पंख!
भाव-गद्गद हो रहे थे लोग,
गा रहे थे, रो रहे थे लोग।
बरसता था नेत्र-नीर नितान्त,
मार्ग-रज-कण थे प्रथम ही शान्त।
पाँवड़ों पर, बीच में शव-यान,
उभय ओर मनुष्य-पंक्ति महान।
आज पैदल थे सभी सत्पात्र,
वाहनों पर नृप-समादर मात्र।
शेष-दर्शन कर सभक्ति, सयत्न,
जन लुटाते थे वसन, धन, रत्न।
आ गया सब संघ सरयू-तीर,
करुण-गद्गद था सहज ही नीर।
आप सरिता वीचि-वेणी खोल
कर रही थी कल-विलाप विलोल!

अगरु-चन्दन की चिता थी सेज,
राजशव था सुप्त, संयत तेज।
सरस कर भूतल, बरस एकान्त,
क्षितिज पर मानों शरद-घन शान्त!
फिर प्रदक्षिण, प्रणति, जयजयकार,
सामगान-समेत शुचि-संस्कार।
बरसता था घृत तथा कर्पूर,
सूर्य पर था एक लघु घन दूर।
जाग कर ज्वाला उठी तत्काल,
विम्ब पानी में पड़ा सुविशाल।
फिर प्रदक्षिण कर तथा कर जोड़
रो उठे यों भरत धीरज छोड़-
“तात! यह क्या देखता हूँ आज?
जा रहे हो तुम कहाँ नरराज!
देव, ठहरो, हो न अन्तर्धान,
चाहिए मुझको न वे वरदान।
इस अधम की बाट तो कुछ देर
देखते तुम काल-कारण हेर।
वन गये हैं आर्य, तुम परलोक,
कौन समझे आज मेरा शोक?

स्वर्ग क्या, अपवर्ग पाओ तात,
पर बता जाओ मुझे यह बात-
राज्य-संग तुम्हें कहाँ से हाय!
दे सकूँगा आर्य को अनुपाय?
आज तुम नरराज, प्रश्नातीत,
ये प्रजाजन ही कहें, नयनीत-
धन किसी का जो हरे क्रम-भोग्य
दण्ड क्या उसके लिये है योग्य?
आह! मेरी जय न बोलो हार,
इस चिता ही में बहुत अंगार!
था तुम्हें अभिषेक जिनका मान्य,
हैं कहाँ वे धीर-वीर-वदान्य?
वन चलो सब पंच मेरे साथ,
हैं वहीं सबके प्रकृत नरनाथ।
राज्य पालें राम जनकप्राय,
राम का प्रतिनिधि भरत वन जाय।
निज प्रजा-परिवार-पालन-भार
यदि न आर्य करें स्वयं स्वीकार
तो चुनों तुम अन्य निज नरपाल,
जो किसी माँ का जना हो लाल।
व्यर्थ हो यदि भरत का उद्योग,
तो करें इतनी कृपा सब लोग-
इस, पिता ही की चिता के पास,
मुझ अगति को भी मिले चिरवास!”

साथ ही आनन्द और विषाद
’जय भरत’, ’जय राम’ जय जय नाद!
लोटते थे पर भरत गति-हीन
पितृ-चिता के पादतल में लीन।
दे रहे थे धैर्य लोग सराह,
विकल थे सब किन्तु आप कराह।
“भरत!” बोले गुरु-“भरत, हो शान्त,
जनकवर के जातवर, कुलकान्त!
कर चुके हो मृतजनक-संस्कार,
हत-जननियों का करो उपचार।
भेज यों पितृवन उन्हें सस्नेह,
पुत्र, इनको ले चलो अब गेह।”

बोले फिर मुनि यों चिता की ओर हाथ कर
“देखो सब लोग, अहा! क्या ही आधिपत्य है!
त्याग दिया आप अज-नन्दन ने एक साथ,
पुत्र-हेतु प्राण, सत्य-कारण अपत्य है!
पा लिया है सत्य-शिव-सुन्दर-सा पूर्ण लक्ष
इष्ट हम सबको इसी का आनुगत्य है!
सत्य है स्वयं ही शिव, राम सत्य-सुन्दर हैं,
सत्य काम सत्य और राम नाम सत्य है!”

कण्ठ कण्ठ गा उठा,
शून्य शून्य छा उठा-
सत्य काम सत्य है,
राम नाम सत्य है!

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