सप्तपर्णा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Saptparna Part 1

सप्तपर्णा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Saptparna Part 1

सप्तपर्णा

सप्तपर्णा में महादेवी वर्मा ने संस्कृत और पालि साहित्य के वेद,
रामायण, थेर गाथा, अश्वघोष, कालिदास, भवभूति एवं जयदेव की
चयनित कृतियों में से 39 अंशों का हिन्दी काव्यानुवाद प्रस्तुत किया
है। इसके सात सोपान हैं: आर्षवाणी, वाल्मीकि, थेरगाथा, अश्वघोष,
कालिदास, भवभूति और जयदेव ।

उषा

दिवजाता शुभ्राम्बर-विलसित,
नूतन, आभा से उद्भासित,
भू-सुषमा की एक स्वामिनी
शोभन आलोकित विहान दे ।

अरुण किरण के वाजि चन्द्र-रथ-
ले करती जा पार क्रान्ति-पथ,
निशि-तम-हारिणि हे विभावरी
हमें यजन गौरव महान दे ।

सुगम तुझे गति है अचलों पर,
सुतर शान्त लहरों का सागर,
निश्चित क्रम विस्तृत पथ-चारिणि,
स्वत: दीप्त तू हमें मान दे।

दिन दिन नव नव छबि में आकर,
गृह गृह में आलोक बिछाकर,
ज्योतिष्मती प्रात की बेला,
ऐश्वर्यों में श्रेष्ठ दान दे ।

जन न ठहरते पथ में पग धर,
खग न रुके नीड़ों में पल भर,
जिसका उदय वलोक-वही
अरुणा अब हमको सजग प्राण दे ।

जागे द्विपद चतुष्पद आकुल,
दिग्दिगन्तचारी पुलकाकुल,
जिसका आगम देख उषा वह
कर्म-पन्थ सबको समान दे ।

(ऋग्वेद)

अग्नि-गान

1.
हव्यवाह ! नित ज्वलनदीप्त तुम
यजनशील के दूत समान,
बल-जन्मा ! तुमसे यजनों में
होता देवोंका आह्वान !

रचते हो तुम आहुतियों से
नित्य दिव्य अर्चना-विधान,
करते हो तुम अन्तरिक्ष में
आलोकित पथ का निर्माण !

वेगवती लपटें लगती हैं
जैसे हों तुरंग चंचल,
नभ के मेघों के समान ही
उनका है सुमन्द्र गर्जन !

आयुध सी इन दीप्त शिखाओं-
से सज्जित समीर-प्रेरित,
बली बृषभ से अग्नि वनों में
बाधारहित तुम्हीं धावित !

व्यापक अन्तरिक्ष में रहते
प्रभा-पुत्र तुम अंतर्हित,
सभी चलाचल हो जाते हैं
वेग तुम्हारे से कम्पित !

दीप्त स्वर्ग के तुम मस्तक हो
तुम पृथिवी की नाभि अनूप,
दिव्य लोक, धरती दोनों में
तुम रहते हो अधिपति रूप !

एक सूर्य में ज्यों हो जाते
लीन किरण के जाल समस्त,
हे वैश्वानर ! वैसे ही हैं
तुम में सारी निधियां न्यस्त !

2.
आज यज्ञशाला का खोलो द्वार !

द्वार वही जो यजन-विवर्द्धन,
द्वार वही आलोकित निर्जन
करो वहीं एकत्र यज्ञसम्भार !

हे त्वष्ट्रा ! हे अग्रज ॠतमय !
कामरूप हे अग्नि निरामय !
करो हमारे हेतु मंगलाचार !

देव वनस्पति ! करो हृष्टमन,
देवों को यह हव्य समर्पण,
होता को हो प्राप्त दिव्य उपहार ।

आज यज्ञशाला का खोलो द्वार !

3.
हम मनुष्य अपनी रक्षा हित,
करते हैं आहूत,
हमें ओजमय करो अग्नि,
तुम दिव्य लोक के दूत !

छूट धनुष से फैल गये,
जैसे दिशि दिशि में बाण,
त्यों फैले स्फुलिंग तुम्हारे,
अहे अर्चि-सन्धान !

करते हो अपनी ऊष्मा से,
तुम मर्त्यों में वास,
आलोकित हों मंगलमय हों,
ये धरती आकाश !

(ऋग्वेद)

 साम्य-मन्त्र

स्नेह भावना युक्त द्वेष भावों से विरहित,
मैं करता हूँ, तुम सबको सम सौमनस्य-चित ।

वत्स ओर धावित होती ज्यों गो ममता से,
आकर्षित तुम रहो परस्पर त्यों समता से ।

माता के प्रति पुत्र रहे अनुकूल निरन्तर,
रहे सदा निज जनक अनुगमन में वह तत्पर ।

सुखद स्नेह-मधुमति शान्ति की दायक वाणी,
गृह में पति से कहे सदा जाया कल्याणी ।

कभी सहोदर का न सहोदर विद्वेषी हो,
भगिनी का उर भगिनी का हित अन्वेषी हो,

हों समान संकल्प और व्रत एक तुम्हारा,
हो कल्याण प्रसार कथन उपकथनों द्वारा ।

हुए देवगन द्वेषरहित मन जिसको पाकर,
रखते नहीं विरोध-बुद्धि एकान्त परस्पर ।

उसी ज्ञान से प्रति गृह को करता अभिमन्त्रित,
जन जन को वह करे एक चेतना-नियन्त्रित ।

एक दूसरे से चाहे हो श्रेष्ठ ज्येष्ठ जन,
एकचित हो रहो कार्यसाधन-संयत-मन ।

पृथक न हो तुम एक धुरी में बद्ध करो श्रम,
रहो प्रियंवद् करता हूँ मन चित्त एक सम ।

हो पानीय समान, अन्न भी एक रहे नित,
एक सूत्र में तुमको मैं करता संयोजित।

चक्रनाभि संलग्न अरे ज्यों रहते अनगिन,
वैसे ही तुम करो अग्नि का मिल अभिनन्दन ।

एक कार्यरत तुम, संस्थिति भी एक तुम्हारी,
करता हूँ तुमको समान निधि का अधिकारी ।

देवों के सम करो अमृत का तुम संरक्षण,
सायं प्रात समान तुम्हारे रहें शांत मन ।

(अथर्ववेद)

चयन

1.
परि प्रासिष्यदत् कवि:
सिन्धोरूर्मावधिश्रित:
कारूं विभ्रत पुरुस्पृहम् ।
-साम पूर्वाचिक ५-१०

लोक – हित – तंत्री संभाले
सिन्धु – लहरों पर अधिश्रित,

यह चला कवि क्रान्तिदर्शी
सब दिशाओं में अबाधित ।

2.
अन्ति सन्तं न जहाति
अन्ति सन्तं न पश्यति।

देवस्य पश्य काव्यम
न ममार न जीर्यति ॥
-अथर्ववेद १०-८

जिस समीपवतीं से होते
दूर न क्षण भर,
जो समीप है किंतु
देखना जिसको दुष्कर,

देखो तुम उस सृजनशील का
काव्य मनोहर,
अमर और नित नूतन जो
रहता है निर्जर ।

3.
यथा द्योश्पृथिवी च
न विभीतो न रिष्यत:
एवा मे प्रान मा विभे: ।।१।।
-अथर्ववेद : २१५

यह उन्नत आकाश
और यह धरती जैसे,
भीतिरहित हैं और
निरन्तर रहते अक्षय,

वैसे ही हे प्राण !
अबाधित गति तेरी हो,
नष्ट न होना और सदा तू रहना निर्भय ।

4.
भद्रमिच्छंत ॠषय: स्वर्विदस्तपो
दीक्षामुपनिषेदुरग्रे ।
ततो राष्ट्र बलमोजश्च जातं
तदस्मै देवा उपसंनमंतु ॥
-अथर्ववेद : १९-४१

ज्ञाता औ’ कल्याण चाहने वाले ॠषिवर
तपदीक्षित जब होते पहले, ज्ञानार्जनपर ,
तब होता है राष्ट्र ओजसंयुत बलनिर्भर,
तभी देवगण से उसको मिलता है आदर !

5.
अयं कविरकविषु, प्रचेता
मत्येंष्वग्निरम्रतो निर्धाण्य
स मा नो अत्र जुहुर: सहस्व:
सदा त्वे सुमनस: स्याम ।।
ऋग्वेद : ७-४४

कवि होकर सर्वदा
अकवियों में रहता जो,
मरणधर्मियों में अमृत
बनकर बसता जो,

वही प्रचेतन अग्नि
हमारा करे न अनहित,
रहें उसी में हम सदैव
हो सौमनस्य चित ।

6.
न पापासो मनामहे
नारायासो न जल्हव: ।
यदिन्न्विन्द्रं वृषणं सचा सुते
सखायं कृणवामहै ।।
ऋग्वेद : ८-६१

उसे मनाते नहीं
पाप से मलिन कभी हम,
दीन नहीं, हमको
न घेरता तेजरहित तम ।

इसीलिए उस सुखवर्षक
सामर्थ्यवान को
यज्ञकर्म में सखा
बना लेते अपना हम ।

7.
उद्यानं ते पुरुष नावयानं
जीवातुं ते दक्षतातिं कृणोमि ।

आ हि रोहेमममृतं सुखं रथम्
अथ जिविं विंदथमावदासि ॥
-अथर्ववेद : ८-१

तेरी गति हो ऊर्ध्व पुरुष !
हो कभी न अवनत
जीवन को तेरे करता हूँ
शक्ति समन्वित ।

ध्रुव तू हो आरुढ़ अमृत के,
सुख के रथ पर ।
हो चिरायु तू ज्ञानप्रसारण
में रह तत्पर ।

8.
स्वस्तितं मे सुप्रात: सुखायं
सुदिवं सुमृगं सुशकुनं गे अस्तु ।

सुहवमग्ने स्वस्तयमर्त्य
गत्वा पुनरायाभिनन्दन ॥
-अथर्ववेद : १९-८

शुभ मुझको सूर्यास्त
प्रात सायं सुखकर हों
स्वस्ति मुझे हो दिवस
शकुन मृग शुभ शमकर हों ।

अग्नि ! होत्र मेरा हो
शुभशंसी सबके हित,
अमर भाव कर प्राप्त
लौट तू हो अभिनन्दित ।

9.
बृहस्पते प्रथमं वाचो अग्रं,
यत्प्रेरत नामधेयं दधाना: ।

यदेषां श्रेष्ठं यदरिप्रमासीत्प्रेवा ,
तदेषां निहितं गुहावि : ॥
-ऋग्वेद : १०-७१

वाणी का थीं पूर्व रूप,
संज्ञायें केवल,
बुद्धिलीन वह रही,
श्रेष्ठ कल्याणी निर्मल ।

बृहस्पते ! जो आदि मनुज,
में भावों का चय,
प्रीत हृदय से व्यक्त हुआ,
बन गिरा अनामय ।

10.
आकूती देबी सुभगा पुरा दध,
चित्रस्य माता सुहवानो अस्तु ।

यामाशामेमि केवली सा,
मे अस्तु, विदेयमेनां मनसि
प्रविष्टाम ॥
-अथर्ववेद : १६-४

वाक अर्थ की शक्ति,
बोध का जो हो कारण,
जननि चित्र की सुभग,
करूँ मैं उसको धारण ।

आशा मेरी पूत,
सिद्धि से हो संयोजित,
जान सकूं प्रज्ञा को,
जो मन में है संस्थित ।

 आभा-कण

1.
आवेग क्रोध का सके थाम
जो पथ विचलित रथ के समान,
सारथी कहाता वही सत्य
है अन्य रश्मि-ग्राहक अजान ।

यह नियम सनातन, एक वैर
करता न दूसरे का अभाव;
निर्वैर भावना से जग में
होता सब शांत विरोध भाव ।

संग्राम-भूमि में जय पाता
कोई कर लाखों को सभीत-,
पर सत्य समर-विजयी है वह
जो स्वयं आपको सका जीत ।

क्या हास और आनन्द कहाँ
जलता जाता जो कुछ समीप,
घन अंधकार से घिर कर भी
तुम क्यों न खोजते हो प्रदीप ?

जय उपजाती है द्वेष – द्रोह
औ’ पराभूत में दु:ख – दाह,
जो हार जीत को तज प्रशान्त
उसका सुखमय जीवन-प्रवाह ।

मल्लिका – मलय – कलि-तगर-गन्ध
प्रतिवात कभी पाता न राह,
दिशि दिशि सज्जन – सौरभ फैला
विपरीत बहा जब गन्धवाह ।

(धम्मपद)
2.
चित्त जिसका हो चुका हो द्वेषमुक्त महान,
सब कहीं सबके लिए हो सौमनस्य समान,

क्षेम से भर दिशि-विदिशि-भू-अन्तरिक्ष अछोर,
लोक को संस्पर्श कर जो विहरता सब ओर;

हो गया है सत्व जो सब वैर-द्रोह-विमुक्त,
मित्रता की भावना में एक रस संयुक्त,

एक सीमा में उसी से आचरित सविशेष,
आचरन त्यों हो न जाता है वहीं नि:शेष,

ज्यों न रुकता शंखवादक का तनिक आयास,
दूर तक प्रतिध्वनि जगा भरता विपुल आकाश !

-दीघनिकाय

विराग-गीत

सत्यवादी के मृषा न बोल ।

स्निग्ध कुंचित अलकों के गुच्छ
कभी काले थे भ्रमर समान,
जरा के कारण हैं वे आज
विरस सन वल्कल के उपमान ।
सत्यवादी के मृषा न बोल ।

मल्लिका के सौरभ से सिक्त
कभी था मेरा वेणी-बंध,
जरा के कारण उसमें आज
शशक रोमों सी आती गन्ध ।
सत्यवादी के मृषा न बोल ।

प्रसाधित था यह केश-कलाप
सघन रोपित ज्यों हो उद्यान,
जरा से गलित पलित हैं केश
विरल सा अब पड़ता है जान ।
सत्यवादी के मृषा न बोल ।

वहन करता था उन्नत शीश
स्वर्ण भूषित वेणी का साज,
जरा से जर्जर होकर भग्न
झुक रहा है वह मस्तक आज ।
सत्यवादी के मृषा न बोल ।

कुशल शिल्पी-कर ने दीं आंक
सुभ्रु मानों ये मंजु अनूप ।
जरा से जीर्ण झुर्रियों बीच
आज लगती हैं नमित विरूप ।
सत्यवादी के मृषा न बोल ।

नीलमणियों की उज्ज्वल कान्ति
दीर्घ नयनों ने ली थी छीन,
जरा से अभिहत वे ही आज
हो गये धूमिल आभाहीन ।
सत्यवादी के मृषा न बोल ।

नासिका मेरी कोमल दीर्घ
शिखर यौवन का पड़ती जान,
वही दब आज जरा के भार
नमित है गलित सभी अभिमान ।
सत्यवादी के मृषा न बोल ।

कभी लगते थे श्रवण सुडौल
खरादे सुन्दर वलय समान,
हो गये वही झुर्रियों युक्त
लटकते से हैं आज निदान ।
सत्यवादी के मृषा न बोल ।

कदलि-कलिकावर्णी थी मंजु
कभी मेरे दशनों की पांति,
जरा से खण्डित होकर आज
पीत यव की देती है भ्रान्ति।
सत्यवादी के मृषा न बोल ।

विपिन-संचारी पिक की कूक,
सदृश जो था स्वर का संगीत ।
जरा से उसके अक्षर भग्न
पूर्व स्वर-लय है आज अतीत ।
सत्यवादी के मृषा न बोल ।

खरादे श्वेत शंख की स्निग्ध
कभी ग्रीवा थी मंजु सुडौल,
वही वृद्धावस्था के भार
नमित भी आज रही है डोल ।
सत्यवादी के मृषा न बोल ।

कभी थे मेरे बाहु सुगोल
गदा से सुगठित सुन्दर पीन,
जरा के कारण हैं वे आज
विटप पाडर-शाखा से क्षीण ।
सत्यवादी के मृषा न बोल ।

मुद्रिका स्वर्ण आभरण युक्त
कभी थे कोमल मेरे हाथ,
यही हैं गाँठ गठीले आज
जरा की दुर्बलता के साथ ।
सत्यवादी के मृषा न बोल ।

पुष्ट उन्नत यह मेरा वक्ष
कभी था सुगठित और सुगोल,
जलरहित चर्म-थैलियों तुल्य
जरा से है अवनत बेडौल ।
सत्यवादी के मृषा न बोल ।

कभी था सुन्दर और विशुद्ध
स्वर्ण के फलक सदृश यह गात,
जरा से आज हुई वह देह
झुर्रियों का विरूप संघात ।
सत्यवादी के मृषा न बोल ।

कभी मेरा सुन्दर उरु देश
बना था करिकर का उपमान,
जरा के कारण अब वह, शून्य
वंश-नलिका सा पड़ता जान ।
सत्यवादी के मृषा न बोल ।

स्वर्ण आभरण नूपुरों युक्त
पिण्डलियां थीं मेरी अपरूप,
शुष्क तिल-डण्ठल सी वे आज
जरा के कारण क्षीण विरूप ।
सत्यवादी के मृषा न बोल ।

चरण युग मेरे कोमल मंजु,
रहे हल्के ज्यों हल्की तूल,
जरा ने उन्हें बना कर रुक्ष
झुर्रियों से भर दिया समूल ।
सत्यवादी के मृषा न बोल ।

गठित सुन्दर अंगों के साथ
कभी श्रीमय थी मेरी देह,
जरा के कारण ही वह आज
हो गयी जर्जर दुख का गेह ।
सत्यवादी के मृषा न बोल ।

शीघ्र ही ढह कर होता ध्वस्त
जीर्ण गृह जैसे यत्नविहीन,
जरा का गृह भी थोड़े यत्न
बिना ढह जाएगा हो क्षीण ।
सत्यवादी के मृषा न बोल ।

(अम्बपाली)

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