सप्तपर्णा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Saptparna Part 3

सप्तपर्णा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Saptparna Part 3

 जागरण

सज गया दक्षिणा का देखो वह महत यान,
सब जाग उठे हैं अमृत पुत्र भी कान्तिमान !

आर्या अरुणा आरूढ़ आ रही तिमिर पार,
गृह गृह पहुँचाने ज्योतिर्धन का अतुल भार ।

जेता संग्रामों की ऐश्वर्यों की रानी,
चेतन जग से पहले जागी वह कल्याणी;

यह युवति सनातन प्रतिदिन नूतन बन आती,
वह प्रातयज्ञ में प्रथम पुरोहित सी भाती ।

कर देवि ! सुजाते ! ऐश्वयों का सम वितरण,
सविता साक्षी, हैं हम सबके अकलुष तन मन;

आलोक बिछाती प्रियदर्शन छबिमय प्रतिदिन,
उजला कर जाती हर घर का तममय आँगन ।

ज्योतिर्वसना तू शनै: शनै: उतरी भू पर,
निधियों में तेरा दान रहा सबसे भास्वर;

यो सूर्य वरुण की स्वसा ! गूंजते तेरे स्वर,
हारे विद्वेषी, रथी रहें हम विजयी वर ।

हो ऊर्ध्वगामिनि सत्य पुरंध्री वाक् मधुर;
प्रज्ज्वलित पूत यह अग्निशिखा उठती ऊपर,

तम के परदे में जो निधियां थीं अन्तर्हित,
अब दीप्तिमतो बेला में होतीं उद्भासित ।

जाती रजनी, आती है अरुणा क्षिप्रचरण,
हैं रूप भिन्न पर एक संचरण का बन्धन;

वह अन्तरिक्ष में तिमिर-तोम फैला जाती,
जाज्वल्यमान स्पन्दन पर यह पथ में आती ।

जो रूप आज, कल भी उसका प्रत्यावर्तन,
करती अरुणायें वरुण-नियम गति में धारण ।

क्रम से नित करती पन्थ पार योजनत्रिविंशत्,
होता समीप प्रत्येक पहुँचती दोषरहित ।

परिचित है दिन के प्रथम चरण के आगम से,
उज्ज्वलवदना उद्भूत हुई है वह तम से;

वह कांतिमति युवती प्रकाश का कर वर्षण,
रखती अखण्ड वह नियम बंधा जिससे जीवन ।

रुपसि कन्या सी अवगुण्ठन से मुक्त वदन,
कामनाशील सविता का करती स्वयं वरण;

उसके समक्ष यह युवति विभा सस्मित आनन,
उर का आवरण हटा, देती छबि का दर्शन ।

ज्यों मातृ-प्रसाधित वधू-गात लोचन-रोचन,
विच्छुरित प्रभा से आज उषा का सुन्दर तन;

तम का वारण कर ज्योतियी भद्रे ! धन्या !
तेरी समानता कर न सके अरुणा अन्या ।

यह अश्ववती गोमती विश्व से वरणीया,
रवि-रश्मि-प्रेरिता आती है नित कमनीया;

यह नित्य लौटती दूर दिशायों में जाकर,
मंगलरुपों में संकेतित मंगल के वर ।

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करती ध्रुव अनुसरण सूर्य-किरणों का तू नित,
भद्रे ! कर दे कर्म हमारे भद्र-निवेशित ।

तेरा यह आलोक करे अज्ञानों का क्षय,
प्राप्त हमें होताओं को, हो निधियों का चय ।

(ऋग्वेद)

 भू-वन्दना

सत्य महत, संकल्प, यज्ञ, तप, ज्ञान, अचल ऋतु,
जिस पृथिवी को धारण करते रहते अविरत,
भूत और भवितव्य हमारा जिससे अधिकृत,
वह धरती दे हमें लोक-हित आंगन विस्तृत ।

जिसके हैं बहु भाग समुन्नत अवनत, समतल,
नहीं मानवों के समूह से बाधित, संकुल,
विविध शक्तिमय औषधियों की वृद्धि-विधायक,
यह पृथिवी नित रहे हमें स्थिति-मंगलदायक ।

आश्रित जिस पर सभी सरित-सर-सागर के जल,
लहराता है जहां शस्य का शोभन अंचल,
जिस पर यह चल प्राणि-जगत् है जीवित, स्पन्दित,
वही धरा दे हमें पूर्वजों का श्रेयस् नित ।

फैलीं चारों ओर दिशाएँ दूर अबाधित,
जिस पर होते विविध अन्न कृषियाँ उत्पादित,
जो सयत्न करती बहुधा जीवन का पोषण,
वही हमारी भूमि शस्य दे औ’ दे गोधन ।

सृष्टि पूर्व जो रही सिन्धु में जलमय तन से,
ऋषियों ने की प्राप्त सिद्धि के अक्षय धन से,
परम व्योम वह अमर सत्य-तेजस्-आच्छादित
जिसका उर है वही धरा दे शक्ति अपरिमित ।

अप्रमाद, सेवारत्, औ’ समभाव निरन्तर-
प्रवहमान हैं निशिदिन जलधारायें जिस पर,
वह बहु धारावती हमारी धरती प्लावित,
दे हमको वर्चस्व और कर दे आप्यायित ।

मापा करते जिसे दिवाकर – निशिकर – अश्विन,
रखकर जिस पर चरण विष्णु कर रहा संचरण ।
रहित शत्रु, जिसको करता है इन्द्र प्रबलतम,
दे हमको वह भूमि पयस्, सुत को माता सम ।

शोभित जिस पर अचल, हिमाचल, बन सुषमाकर,
अक्षत अमर अजेय खड़े हम उस वसुधा पर !
श्यामल गैरिक अखिल रूपमय मधवा-रक्षित,
उसी भूमि पर रहें सदा हम सुख से विचरित ।

जो तुझसे उत्पन्न शक्ति औ’ बल का आकर,
हमें उसी के बीच प्रतिष्ठित कर दे सत्वर,
पूत हमें कर धरापुत्र हम तुझसे लालित,
रसदायक पर्जन्य पिता से भी हों पालित ।

हम सबके हित महत सदन बनकर तू रहती,
महत वेग, संचलन महत, कम्पन भी महती !
रहे महत निस्तन्द्र इन्द्र-छाया में ऐसी,
स्वर्णधरा तू, पर न हमें देना विद्वेषी ।

तेरा जो शुभ गन्ध मिला ओषधि, जल कण में,
अप्सरियां गन्धर्व जिसे रखते निज तन में,
उस सौरभ से गात हमारा तू सुरभित कर,
पड़े किसी की द्वेष-दृष्टि जो जननि न हम पर ।

जिस परिमल से नीलोत्पल के कोष रहें भर,
जिसे लगाते अमर, उषा के लग्न-पर्व पर,
उसी गन्ध से भूमि ! हमारा कर आलेपन,
हो न हमारी ओर किसी का द्वेष भरा मन ।

नारी में, नर में तेरा जो गन्ध समुज्जवल,
वीरों में, मृग-हस्ति-अश्व में जो बनता बल,
कन्या में जो कान्ति उसी सौरभ से चर्चित
कर दे हमको जननि ! न चाहे कोई अनहित !

भू ही तो पाषाण, शिला, औ’ धूलि पटल में,
थामे सबको वही अंक अपने निश्चल में!
तेरा उर है हमें राशि सोने की अभिमत,
देते हैं हे भूमि तुझे हम आज नयन शत !

तेरे पावस औ’ निदाघ तेरे मधु – पतझर,
तुझ पर रहतीं शरद, शिशिर सब, ऋतुयें निर्भर,
तुझसे होते सदा दिवस औ’ रजनी निर्मित,
ओ पृथिवी यह रहें हमारे ही सुख के हित ।

जिसके उर पर विविध वनस्पतियां औ’ तरुवर,
पाते ही रहते विकास ध्रुव और निरन्तर ।
धरा हुई जो धारण करके यह जग सारा,
उसका वन्दन आज कर रहा गान हमारा ।

(अथर्ववेद)

गृह-प्रवेश

रचते हैं आवास यहीं हम अपना निश्चित्
रहे क्षेममय धाम सदा यह स्निग्ध, सुरक्षित !

हे गृह ! लेकर साथ वीर औ’ अक्षत परिजन,
जाये तेरे निकट, शरण दे तेरा आंगन !

अचला हो यह नींव उसी पर रहे प्रतिष्ठित,
गो-अश्वों से भरा, रहे तुझमें सुख संचित !

हम सब के हित उन्नत रह सौभाग्यव्रती हो,
ऊर्जस्वति धृतवति शाले ! तू पयस्वती हो !

ध्रुव स्तम्भों पर रहे समुन्नत छाया तेरी,
लगी तुझी में रहे विमल धान्यों की ढेरी!

सदन ! लौट आने देना गोधूली बेला,
बाल, वत्स औ’ गति-मंथर सुरभी का रेला !

सविता, मधवा, वायु, बृहस्पति पथ के ज्ञाता,
तेरे हित सब रहें सदा स्थिति-मंगल दाता !

इसे सिक्त करने आयें अनुकूल मरुतगण,
ऋद्धिदेव से शस्य-भूमि के हों उर्वर कण!

देवों ने की प्रथम प्रतिष्ठित गृहदेवी वर,
सानुकूल जो हुई शरण औ’ छाया देकर !

दूर्वादल-वेष्टिता सदन की देवि सदय हो,
हमें मिले ऐश्वर्य वीरजन से परिचय हो!

वंशदण्ड ! आधार-स्तम्भ का अधिरोहण कर,
देख तुझे ध्रुव उग्र द्वेषिजन हों कम्पित उर !

तेरे नीचे क्षेमयुक्त रक्षित परिजन हो,
सब स्वजनों के साथ शरद शत का जीवन हो !

आये बालक और वत्स गोधन भी आये,
लाये हम पानीय पात्र दधि के भी लाये !

गृहिणी ! ले आ पूर्ण कलश तू अपना न्यारा,
इसमें बहती रहे सदा अमृत घृत-धारा !

अमृतरस से पात्र हमारा कर आपूरित,
इष्टपूर्ति से रहे धाम का मंगल रक्षित !

अक्षय जल अक्षय होने के हित लाये हम,
अमर अग्नि के साथ अजर गृह में आये हम !

(अथर्ववेद)

हेमन्त

शस्य-मालिनी धरा
और नीहार-परुष है लोक,
जल अप्रिय हो गया
अग्नि करती है आज अशोक ।

दक्षिण दिशिचारी रवि से-
है उत्तर दिशा विहीन,
तिलकहीन बाला सी उसकी
हुई कान्ति छबिहीन ।

प्रकृतिदत्त हिमकोष, दूर
अब इससे है दिनमान,
सार्थक नाम हिमालय का
हो गया आज हिमवान ।

स्पर्शसुखद मध्याह्न, सुखद
इन दिवसों में संचार,
प्रिय लगता आदित्य, अप्रिय
छाया, जल का व्यवहार ।

व्याप्त शीत है रवि लगता
कोमल तुषार से न्यस्त,
सूने हैं आरण्य, कमल के
वृन्द हो गए ध्वस्त ।

नभ तल शयन वर्ज्य जिनमें
जो दीर्घ हुई पा शीत,
हिम से कुहराच्छन्न रहीं
ये पौष रात्रियां बीत ।

भरत-मिलन

देख गजों को धावित
औ’ सुन घोर महारव,
दीप्त तेजयुत लक्ष्मण से
बोले तब राघव ।

‘देखो हे सौमित्र !
कहां से आता नि:स्वन,
(जिसको सुनकर आज
हो गया अस्थिर यह वन ।)’

तब लक्ष्मण ने चढ़कर
पुष्पित शाल वृक्ष पर,
राघव से यों कहा
सैन्य का अवलोकन कर ।

‘होकर के अभिषिक्त
राज्य करने निर्बाधित,
आते हैं यह भरत
हमारे ही वध के हित ।

जिनके कारण आप-
राज्य शाश्वत से वंचित,
वध्य शत्रु वे, मेरे
सम्मुख भरत समागत ।

राघव करिए त्वरित
चाप अपने को शिंजित,
करिए शर संधान
कवच से होकर सज्जित ।’

तब लक्ष्मण को देख
क्रोध अस्थिर उद्वेजित,
राघव बोले वचन
उन्हें करने प्रशान्त चित ।

‘चाप का क्या कार्य
कैसा चर्म कैसी खड़्ग,
जब समागत हैं सुधिवर
भरत सेना संग ।

पिता से प्रतिश्रुति, करूँ
यदि मैं भरत–वध आज,
क्या करूँगा ले उसे जो
है कलंकित राज्य?

बंधु मित्रों के निधन से
प्राप्त वैभव–सार
अन्न विषमय ज्यों मुझे
होगा नहीं स्वीकार।

बंधु हों मेरे सुखी हो
क्षेम–मंगल–योग
शपथ आयुध की यही
बस राज्य का उपभोग।

सिंधु-वेष्टित भूमि पर
मुझको सुलभ अधिकार
धर्म के बिन इंद्र–पद
मुझको न अंगीकार।

बिन तुम्हारे, भरत औ’
शत्रुघ्न बिन, सुखसार
दे मुझे जो वस्तु उसको
अग्नि कर दे क्षार।

भातृवत्सल भरत ने,
होता मुझे अनुमान,
आ अयोध्या में किया
कुलधर्म का जब ध्यान,

और सुन, मैंने बना कर
जटावल्कल–वेश,
अनुज सीता सह बसाया
है विपिन का देश,

स्नेह–आतुर चेतना में
विकलता दुख–जन्य,
देखने आये भरत हमको,
न कारण अन्य।

अप्रिय कटु, माँ को सुना,
कर तात को अनुकूल
राज्य लौटाने मुझे
आये न इसमें भूल।

‘क्या कभी पहले भरत ने
किया कुछ प्रतिकूल?
जो तुम्हें इस भाँति हो
भय आज शंका मूल।

क्या किसी आपत्ति में
हो पुत्र से हत तात?
प्राण–सम निज बंधु का
ही बंधु कर दे घात?

कह रहे इस भाँति तुम
यदि राज्य हेतु विशेष,
‘राज्य दो इसको’ कहूँगा
मैं भरत को देख।

शाल से तब उतर लक्ष्मण
बद्ध – अंजलि – हाथ,
पार्श्वस्थित शोभित हुए
बैठे जहाँ रघुनाथ ।

भरत मानव-श्रेष्ठ देकर
सैन्य को आवास,
चले पैदल देखने
तापस – कुटीर – निवास ।

तापसालय में विलोका
भरत ने वह धाम,
जानकी लक्ष्मण सहित
जिसमें विराजित राम ।

भरत तब दौड़े रुदित
दुख – मोह से आक्रान्त,
चरण तक पहुंचे न भू पर
गिर पड़े दुख – भ्रान्त ।

‘आर्य’ ही बस कह सके वे
धर्म में निष्णात,
कष्ट गद्गद से न निकली
अन्य कोई बात

जटा वल्कल सहित उनका
कृश विवर्ण शरीर,
कष्ट से पहचान भेंटे
अंक भर रघुवीर ।

भरत को तब भेंटकर
शिर सूंघकर सप्रेम,
अंक में ले राम ने
पूछा कुशल औ’ क्षेम ।

(रामायण)

रथ यात्रा

सूत निपुण शुचि वली जहाँ था
सधे अश्व थे चार नियोजित,
स्वर्ण-घटित सज्जा युत रथ में
शाक्य कुमार हुए चढ़ शोभित ।

माला वन्दन वार बंधे थे
जहाँ ध्वजायें मारुत-चंचल,
उस सज्जित पथ पर बिखरी थी
राशि-राशि सुमनों की कोमल ।

नभ पर चढ़ता शनै: शनै: ज्यों,
तारक-दल से घिरा निशाकर,
घिरा सदृश अनुगामिजनों से
बढ़ता था कुमार उस पथ पर ।

दर्शक पौर जनों के दृग थे
विस्फारित औ’ भरे कुतूहल ।
पथ उनसे शोभित था मानो
नीलोत्पल के बिछे अर्द्ध दल ।

पथ पर राज कुमार जा रहे
समाचार भृत्यों से पाकर,
गुरुजन – अनुज्ञात उत्कंडित
महिलायें आई छज्जों पर ।

पग – चापों से सोपानों पर
झंकृत कर रशना – नूपुर – स्वर,
करके भीत गृहों का खग-कुल
वे देती थीं दोष परस्पर ।

जिनमें, एक बाल का कुंडल
न्यस्त दूसरी के कपोल पर,
वे छोटे वातायन लगते
बाँधे कमल-गुच्छ ज्यों उनपर ।

तेजकान्ति से युक्त वपुष को
देख देख कर वे महिला जन,
‘इसकी भार्या धन्य हुयी है’
कहती थीं, पर शुद्ध-भाव-मन ।

-बुद्धचरित

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