सपनों का धुआँ-धूप और धुआँ -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar 

सपनों का धुआँ-धूप और धुआँ -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

“है कौन ?”, “मुसाफिर वही, कि जो कल आया था,
या कल जो था मैं, आज उसी की छाया हँ,
जाते-जाते कल छट गये कुछ स्वप्न यहीं,
खोजते रात में आज उन्हीं को आया हँ ।

“जीते हैं मेरे स्वप्न ? आपने देखा था?”
( बोले) “हाँ, छोड़ गये थे यहाँ आप ही दूब हरी ?
अफसोस मगर, कल शाम आपके जाते ही
चर गई उसे जड़-मृल-सहित मेरी बकरी ।

“चन्दन भी था कुछ पडा हुआ घर के बाहर,
कल रात लगी थरथरी उसे तब मँगवाया;
जी भर कर तापा धर कर उसे अँगीठी में,
जब धुआँ उठा, घर भर को बड़ा मजा मआया ।”

(मैंने कहा) “दूर ही रहो अय चाँद ! आदमी बड़े बड़े
आगे-पीछे भी नहीं सोचने पायेंगे,
पीयूष तुम्हारे मरने का कारण होगा,
प्याले पर धर कर तुम्हें चाट ही जायेगे ।”

(1949)

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