सन्ध्या-तारा (सान्ध्यतारम्)-जी. शंकर कुरुप-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita G. Sankara Kurup

सन्ध्या-तारा (सान्ध्यतारम्)-जी. शंकर कुरुप-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita G. Sankara Kurup

हे आनन्दकन्द ! बताओ तो, तुम कौन हो-

हे आनन्दकन्द !
बताओ तो, तुम कौन हो-
विश्व-सौन्दर्य के ललाट पर अंकित बिन्दी के समान,
वारुणी दिशा के कानों पर अलंकृत
अम्लान मनोहर कर्णफूल के समान,
नीलाकाश के तीर्थ में प्रवेश कर
अर्चना कर के लौटती हुई श्रांत
दिनान्त-लक्ष्मी के अंगुलि-पोर से स्खलित
रत्न-मुद्रिका के समान ?

हे प्रियदर्शिनी,
तुम हो विश्राम की घड़ियों की अग्रदूतिका,
काम-धन्धा सब छोड़कर
श्रम-स्वेद का तरल मुक्ताहार पहनकर
आनन्द की मादक मदिरा पिये,
निहारता है यह उन्मत्त संसार
तुम्हारी ओर एकटक !

पाटल-प्रभ पश्चिमी दिशा को
कान्तिमान करनेवाली
अगाध विस्मय के उन्माद से मत्त प्रेमी की आँखें
तुम्हारा ही पीछा कर रही हैं,
नहीं निहारती हैं वे
लजीली प्रिया के ईषद् आरक्त
सुन्दर ललाट पर झलकनेवाली
स्वेद-कणिकाओं को।

तरुणों की प्यारी
उत्सव का रंग बांधनेवाली रजनी के साथ-साथ
आती हो तुम
अपने नीले-नीले अलकों को हाथों से संवार,
गर्दन ऊँची कर,
गीली घनी नीलम पलकोंवाली
आनन्द-विस्मित आँखों से
तुम्हें देखती है कृषक-बाला,
करती है तुम्हारा स्वागत !

हे विस्मय पुंजिके !
जब तुम खड़ी होती हो सन्ध्या की अरुणिमा में
तब माता के अञ्जन-रञ्जित नयनों की कोर
नहीं जाती है अपने प्यारे शिशु के
विद्रुम अधरों पर चमकनेवाली
चाँदनी की ओर !

देखते ही तुम्हारा मुख
उन्मुख हो चलता है चरवाहा
बिसार कर सुध-बुध
छेड़ता है मधुर तान
पुलकित करता है गाँव का मन-प्राण !

एड़ी तक पहने
नीले-ढीले सुनहले पटम्बर से
सुशोभित सन्ध्या
बढ़ा रही है
तुम्हारी ओर
कोंपलों की मृदुल लाल उँगलियाँ,
किन्तु सिकोड़ लेती है
अपना हाथ डर से
कुम्हला न जाओ कहीं।

 

हे आनन्दकन्द, बताओ तुम कौन हो- शान्ति के मन्द हास की कणिका के समान,

हे आनन्दकन्द,
बताओ तुम कौन हो-
शान्ति के मन्द हास की कणिका के समान,
विश्वशान्ति की पल्लवित कुन्दलतिका की
प्रथम कलिका के समान,
प्रेम का सौरभ प्रसारित करने के लिए
खुले हुए स्वर्ण सम्पुट के समान !

यह प्रचण्ड तप्त-वासर जो मध्याह्न में
बरसा रहा था अंगार,
अब ढलती आयु में मस्तक पर चढ़ा रहा है
तुम्हारे अमल उदार चरणों की रज,
सहला रहा है भूमण्डल को
सुराग-ललित दुलार से,
दे रहा है पेड़ों और लताओं को
लालिम पटम्बर,
प्रदान करता है सागर-वीचियों को
स्वर्ण कणिकाएं,
बाँटता जा रहा है तारक मण्डल को
अपनी सुषमा का साम्राज्य !

यद्यपि दुखता है मन,
परिशुष्क होता है आनन,
तथापि
यह सान्ध्य-मल्लिका-सुमन
भूलकर सारे सन्ताप
कर रही है दिवस के पैरों पर परिमल लेपन
प्रसन्न-वदन।
हे सौम्य,
परिणाम-रम्य है तुम्हारी संगति से
ग्रीष्म दिवस का जन्म ।

 

बताओ तो हे आनन्दकन्द कौन हो तुम दृश्यमान

बताओ तो हे आनन्दकन्द
कौन हो तुम दृश्यमान
प्रभु की कारुण्य-कणिका के समान-
उस स्वर्णिम दीपक के समान-
उजाला है जिसे किन्हीं अज्ञात हाथों ने
आकाश की वेदिका में दुर्लभ कान्ति-तैल भरकर
इसलिए कि
उद्भासित हो जाये ध्यानमग्न होने का मुहुर्त ।

इस प्रणवाक्षर की दीप्ति में उद्बुद्ध होकर
ऊपर को उठती है मेरी आत्मा
छोड़कर संसार की परछाइयों को
भूलकर अपने नीड को
धीरे-धीरे फैलाकर भावनाओं को
किसी अज्ञात दिव्याकाश में
कर रही है विहार उस नीलाम्बर में
जो लाता है मेरे प्राणों में निर्वृति का लय ।

संसार अपने क्लेशों का जीर्ण वसन
उतार फेंक रहा है,
हो गया है उस का अन्तरंग
अमृत-स्रोत से प्लावित,
खड़ा है आनन्द से स्तब्ध;
हे आनन्द-ज्योति,
न हो जा अदृश्य,
मेरे और तुम्हारे भीतर
प्रोज्वलित है एक ही ज्योति का स्फुलिंग;
अन्यथा कैसे था यह सम्भव
कि जब तुम होती हो द्युतिमान
चमक उठता है मेरा मन दुःख-मुक्त !
चूम लो अपने शीतल अधरों से
मानव की आत्मा
जो मलिन-धूसरित पड़ी है,
भर दो उस में
अपनी ही कान्ति की दमक ।

-१९२७

 

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