सनक सनंद महेस समानां-शब्द-कबीर जी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kabir Ji

सनक सनंद महेस समानां-शब्द-कबीर जी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kabir Ji

सनक सनंद महेस समानां ॥
सेखनागि तेरो मरमु न जानां ॥१॥
संतसंगति रामु रिदै बसाई ॥१॥ रहाउ ॥
हनूमान सरि गरुड़ समानां ॥
सुरपति नरपति नही गुन जानां ॥२॥
चारि बेद अरु सिम्रिति पुरानां ॥
कमलापति कवला नही जानां ॥३॥
कहि कबीर सो भरमै नाही ॥
पग लगि राम रहै सरनांही ॥४॥१॥691॥

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