सतिगुर सेती गणत जि रखै-श्लोक -गुरू राम दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Ram Das Ji

सतिगुर सेती गणत जि रखै-श्लोक -गुरू राम दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Ram Das Ji

सतिगुर सेती गणत जि रखै हलतु पलतु सभु तिस का गइआ ॥
नित झहीआ पाए झगू सुटे झखदा झखदा झड़ि पइआ ॥
नित उपाव करै माइआ धन कारणि अगला धनु भी उडि गइआ ॥
किआ ओहु खटे किआ ओहु खावै जिसु अंदरि सहसा दुखु पइआ ॥
निरवैरै नालि जि वैरु रचाए सभु पापु जगतै का तिनि सिरि लइआ ॥
ओसु अगै पिछै ढोई नाही जिसु अंदरि निंदा मुहि अम्बु पइआ ॥
जे सुइने नो ओहु हथु पाए ता खेहू सेती रलि गइआ ॥
जे गुर की सरणी फिरि ओहु आवै ता पिछले अउगण बखसि लइआ ॥
जन नानक अनदिनु नामु धिआइआ हरि सिमरत किलविख पाप गइआ ॥2॥307॥

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