सतिगुर के जीअ की सार न जापै-श्लोक -गुरू राम दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Ram Das Ji

सतिगुर के जीअ की सार न जापै-श्लोक -गुरू राम दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Ram Das Ji

सतिगुर के जीअ की सार न जापै कि पूरै सतिगुर भावै ॥
गुरसिखां अंदरि सतिगुरू वरतै जो सिखां नो लोचै सो गुर खुसी आवै ॥
सतिगुरु आखै सु कार कमावनि सु जपु कमावहि गुरसिखां की घाल सचा थाइ पावै ॥
विणु सतिगुर के हुकमै जि गुरसिखां पासहु कमु कराइआ लोड़े तिसु गुरसिखु फिरि नेड़ि न आवै ॥
गुर सतिगुर अगै को जीउ लाइ घालै तिसु अगै गुरसिखु कार कमावै ॥
जि ठगी आवै ठगी उठि जाइ तिसु नेड़ै गुरसिखु मूलि न आवै ॥
ब्रहमु बीचारु नानकु आखि सुणावै ॥
जि विणु सतिगुर के मनु मंने कमु कराए सो जंतु महा दुखु पावै ॥2॥317॥

Leave a Reply