सतरंगे पंखोंवाली-सतरंगे पंखोंवाली -नागार्जुन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nagarjun

सतरंगे पंखोंवाली-सतरंगे पंखोंवाली -नागार्जुन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nagarjun

दिये थे किसी ने शाप
लाख की कोशिश
नहीं बचा पाया उन्हें
गल गये बेचारे
सहज शुभाशंसा की मृदु-मद्विम आँच में
हाय, गल ही गये !
जाने कैसे थे वे शाप
जाने किधर से आये थे बेचारे

दी थी यद्यपि आशीष नहीं किसी ने
फिर भी, हाँ, फिर भी
आ ही गई बेचारी
तिहरी मुस्कान के चटकीले डैनों पे सवार
निगाहों ने कहा-आओ बहन, स्वागत !
तन गई पलकों की पश्मीन छतरी

एक बार झाँका निगाहों के अन्दर
ठमक गई बरोनियों की ड्योढ़ी पर
बार-बार पूछा तो बोली-
झुलसा पड़ा है यहाँ दिल का बगीचा
गवारा नहीं होगी कड़वी-कसैली भाफ
ऐसे में तो अपना दम ही घुट जायगा
गले हैं जाने किनके कंकाल
नोनी लगी है जाने किनके हाड़ों में
छिड़क देते कपूरी पराग
काश तुम अपनी सादी मुस्कान का !

अंतर की सपाट भूमिका से
परिचित तो था ही
कर ली कबूल भीतरी दरिद्रता
क्षण भर बाद बोला विनीत मैं-
हाँ जी, ऊधमी अशुभ शाप ही तो थे
गलते-गलते भी
छोड़ गये ढेर-सी
जहरीली बू-बास !

आ ही गई उझक-उझक कर होठों के कगारों तक
संजीदगी में डूबी कृतज्ञ मुस्कान
तगर की-सी सादगी में
जगमगा उठे धँसे-धँसे गाल
फिर तो मुसकुराई मासूम आशीष
सतरंगे पंखोंवाली पवित्र तितली
खिले मुख की इर्द-गिर्द लग गई मडराने
आहिस्ते से गुनगुनाई-
हाँ, अब आ सकती हूँ
मिट गई भलीभाँति शापों की तासीर
अब तो मैं रह लूँगी पद्मगंधी मानस में
तो फिर निगाहों ने कहा-आओ बहन, स्वागत….
तन गई तत्काल पलकों की पश्मीन छतरी

हो चुकी थी आशीष अंदर दाखिल
तो भी देर तक निगाहों पर
तनी रही पलकों की पश्मीन छतरी
हो चुकी थी आशीष अंदर दाखिल
तो भी देर तक
उझक-उझक कर आती रही बाहर
संजीदा और कृतज्ञ मुस्कान

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