सतरंगिनी -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 2

सतरंगिनी -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 2

दूसरा रंग

अभावों की रागिनी

कौन गाता है कि सोई
पीर जागी जा रही है!

हास लहरों का सतह को
छोड़ तह में सो गया है,
गान विहगों का उतर तरु-
पल्लवों में खो गया है,

छिप गई है जा क्षितिज पर
वायु चिर चंचल दिवस की,
बन्द घर-घर में शहर का
शोर सारा हो गया है,

पहूँच नीड़ों में गए
पिछड़े हुए दिग्भ्रान्त खग भी,
किन्तु ध्वनि किसकी गगन में
अब तलक मण्डरा रही है;

कौन गाता है कि सोई
पीर जागी जा रही है!

चीर किसके कण्ठ को यह
उठ रही आवाज़ ऊपर,
दर न दीवारें जिसे हैं
रोक सकतीं, छत न छप्पर,

जो बिलमती है नहीं नभ-
चुम्बिनी अट्टालिका में,
हैं लुभा सकते न जिसको
व्योम के गुम्बद मनोहर,

जो अटकती है नहीं
आकाश-भेदी घनहरों में,
लौट बस जिसकी प्रतिध्वनि
तारकों से आ रही है;

कौन गाता है कि सोई
पीर जागी जा रही है!

बोल, ऐ आवाज़, तू किस
ओर जाना चाहती है,
दर्द तू अपना बता
किसको जताना चाहती है,

कौन तेरा खो गया है
इस अंधेरी यामिनी में,
तू जिसे फिर से निकट
अपने बुलाना चाहती है,

खोजती फिरती किसे तू
इस तरह पागल, विकल हो,
चाह किसकी है तुझे जो
इस तरह तड़पा रही है;

कौन गाता है कि सोई
पीर जागी जा रही है!

बोल, क्या तू थक गई है
विश्व को विनती सुनाते,
बोल, क्या तू थक गई है
विश्व से आशा लगाते,

क्या सही अपनी उपेक्षा
अब नहीं जाती जगत से,
बोल क्या ऊबी परीक्षा
धैर्य की अपनी कराते,

जो कि खो विश्वास पूरा
विश्व की संवेदना में,
स्वर्ग को अपनी व्यथाएँ
आज तू बतला रही है;

कौन गाता है कि सोई
पीर जागी जा रही है!

अनसुनी आबाज़ जो
संसार में होती रही है,
स्वर्ग में भी साख अपना
वह सदा खोती रही है,

स्वर्ग तो कुछ भी नहीं है
छोड़कर छाया जगत की,
स्वर्ग सपने देखती दुनिया
सदा सोती रही है,

पर किसी असहाय मन के
बीच बाकी एक आशा
एक बाकी आसरे का
गीत गाती जा रही है;

कौन गाता है कि सोई
पीर जागी जा रही है!

पर अभावों की अरी जो
रागिनी, तू कब अकेली,
तान मेरे भी हृदय की,
ले, बनी तेरी सहेली,

हो रहे, होंगे ध्वनित
कितने हदय यों साथ तेरे,
तू बुझाती, बुझती जाती
युगों से यह पहेली-

“एक ऐसा गीत गाया
जो सदा जाता अकेले,
एक ऐसा गीत जिसको
सृष्टि सारी गा रही है;”

कौन गाता है कि सोई
पीर जागी जा रही है!

अन्धेरे का दीपक

है अन्धेरी रात पर
दीवा जलाना कब मना है?

कल्पना के हाथ से कम-
नीय जो मंदिर बना था,
भावना के हाथ ने जिसमें
वितानो को तना था,

स्वप्न ने अपने करों से
था जिसे रुचि से सँवारा,
स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों
से, रसों से जो सना था,

ढह गया वह तो जुटाकर
ईंट, पत्थर, कंकडों को,
एक अपनी शांति की
कुटिया बनाना कब मना है?

है अन्धेरी रात पर
दीवा जलाना कब मना है?

बादलों के अश्रु से धोया
गया नभ-नील नीलम,
का बनाया था गया
मधुपात्र मनमोहक, मनोरम,

प्रथम ऊषा की नवेली
लालिमा-सी लाल मदिरा,
थी उसी में चमचमाती
नव घनों में चंचला सम,

वह अगर टूटा हथेली
हाथ की दोनों मिला कर,
एक निर्मल स्रोत से
तृष्णा बुझाना कब मना है?

है अन्धेरी रात पर
दीवा जलाना कब मना है?

क्या घड़ी थी एक भी
चिंता नहीं थी पास आई,
कालिमा तो दूर, छाया भी
पलक पर थी न छाई,

आँख से मस्ती झपकती,
बात से मस्ती टपकती,
थी हँसी ऐसी जिसे सुन
बादलों ने शर्म खाई,

वह गई तो ले गई
उल्लास के आधार माना,
पर अथिरता की समय पर
मुस्कुराना कब मना है?

है अन्धेरी रात पर
दीवा जलाना कब मना है?

हाय, वे उन्माद के झोंके
कि जिनमें राग जागा,
वैभवों से फेर आँखें
गान का वरदान मांगा

एक अंतर से ध्वनित हों
दूसरे में जो निरन्तर,
भर दिया अंबर अवनि को
मत्तता के गीत गा-गा,

अंत उनका हो गया तो
मन बहलाने के लिये ही,
ले अधूरी पंक्ति कोई
गुनगुनाना कब मना है?

है अन्धेरी रात, पर
दीवा जलाना कब मना है?

हाय, वे साथी की चुम्बक-
लौह-से जो पास आए,
पास क्या आए, कि हृदय के
बीच ही गोया समाए,

दिन कटे ऐसे कि कोई
तार वीणा के मिलाकर,
एक मीठा और प्यारा
ज़िन्दगी का गीत गाए,

वे गए तो सोच कर ये
लौटने वाले नहीं वे,
खोज मन का मीत कोई
लौ लगाना कब मना है?

है अन्धेरी रात, पर
दीवा जलाना कब मना है?

क्या हवाएँ थी कि उजड़ा
प्यार का वह आशियाना,
कुछ न आया काम तेरा
शोर करना, गुल मचाना,

नाश की उन शक्तियों के
साथ चलता ज़ोर किसका?
किंतु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि,
तुझे होगा बताना,

जो बसे हैं वे उजड़ते हैं
प्रकृति के जड़ नियम से
पर किसी उजड़े हुए को
फिर बसाना कब मना है?

है अन्धेरी रात पर
दीवा जलाना कब मना है?

यात्रा और यात्री

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफ़िर!

चल रहा है तारकों का
दल गगन में गीत गाता,
चल रहा आकाश भी है
शून्य में भ्रमता-भ्रमाता,

पाँव के नीचे पड़ी
अचला नहीं, यह चंचला है,
एक कण भी, एक क्षण भी
एक थल पर टिक न पाता,

शक्तियाँ गति की तुझे
सब ओर से घेरे हु‌ए है;
स्थान से अपने तुझे
टलना पड़ेगा ही, मुसाफ़िर!

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफ़िर!

थे जहाँ पर गर्त पैरों
को ज़माना ही पड़ा था,
पत्थरों से पाँव के
छाले छिलाना ही पड़ा था,

घास मखमल-सी जहाँ थी
मन गया था लोट सहसा,
थी घनी छाया जहाँ पर
तन जुड़ाना ही पड़ा था,

पग परीक्षा, पग प्रलोभन
ज़ोर-कमज़ोरी भरा तू
इस तरफ डटना उधर
ढलना पड़ेगा ही, मुसाफ़िर;

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफ़िर!

शूल कुछ ऐसे, पगो में
चेतना की स्फूर्ति भरते,
तेज़ चलने को विवश
करते, हमेशा जबकि गड़ते,

शुक्रिया उनका कि वे
पथ को रहे प्रेरक बना‌ए,
किन्तु कुछ ऐसे कि रुकने
के लि‌ए मजबूर करते,

और जो उत्साह का
देते कलेजा चीर, ऐसे
कंटकों का दल तुझे
दलना पड़ेगा ही, मुसाफ़िर;

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफ़िर!

सूर्य ने हँसना भुलाया,
चंद्रमा ने मुस्कुराना,
और भूली यामिनी भी
तारिका‌ओं को जगाना,

एक झोंके ने बुझाया
हाथ का भी दीप लेकिन
मत बना इसको पथिक तू
बैठ जाने का बहाना,

एक कोने में हृदय के
आग तेरे जग रही है,
देखने को मग तुझे
जलना पड़ेगा ही, मुसाफ़िर;

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफ़िर!

वह कठिन पथ और कब
उसकी मुसीबत भूलती है,
साँस उसकी याद करके
भी अभी तक फूलती है;

यह मनुज की वीरता है
या कि उसकी बेहया‌ई,
साथ ही आशा सुखों का
स्वप्न लेकर झूलती है

सत्य सुधियाँ, झूठ शायद
स्वप्न, पर चलना अगर है,
झूठ से सच को तुझे
छलना पड़ेगा ही, मुसाफ़िर;

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफ़िर!

पथ की पहचान

पूर्व चलने के बटोही,
बाट की पहचान कर ले

पुस्तकों में है नहीं छापी
गई इसकी कहानी,
हाल इसका ज्ञात होता
है न औरों की ज़बानी,

अनगिनत राही गए इस राह
से, उनका पता क्या,
पर गए कुछ लोग इस पर
छोड़ पैरों की निशानी,

यह निशानी मूक होकर भी
बहुत कुछ बोलती है,
खोल इसका अर्थ, पंथी,
पंथ का अनुमान कर ले।

पूर्व चलने के बटोही,
बाट की पहचान कर ले।

है अनिश्चित किस जगह पर
सरित, गिरि, गह्वर मिलेंगे,
है अनिश्चित किस जगह पर
बाग वन सुंदर मिलेंगे,

किस जगह यात्रा ख़तम हो
जाएगी, यह भी अनिश्चित,
है अनिश्चित कब सुमन, कब
कंटकों के शर मिलेंगे

कौन सहसा छूट जाएँगे,
मिलेंगे कौन सहसा,
आ पड़े कुछ भी, रुकेगा
तू न, ऐसी आन कर ले।

पूर्व चलने के बटोही,
बाट की पहचान कर ले।

कौन कहता है कि स्वप्नों
को न आने दे हृदय में,
देखते सब हैं इन्हें
अपनी उमर, अपने समय में,

और तू कर यत्न भी तो,
मिल नहीं सकती सफलता,
ये उदय होते लिए कुछ
ध्येय नयनों के निलय में,

किन्तु जग के पंथ पर यदि,
स्वप्न दो तो सत्य दो सौ,
स्वप्न पर ही मुग्ध मत हो,
सत्य का भी ज्ञान कर ले।

पूर्व चलने के बटोही,
बाट की पहचान कर ले।

स्वप्न आता स्वर्ग का,
दृग-कोरकों में दीप्ति आती,
पंख लग जाते पगों को,
ललकती उन्मुक्त छाती,

रास्ते का एक काँटा,
पाँव का दिल चीर देता,
रक्त की दो बूँद गिरतीं,
एक दुनिया डूब जाती,

आँख में हो स्वर्ग लेकिन,
पाँव पृथ्वी पर टिके हों,
कंटकों की इस अनोखी
सीख का सम्मान कर ले।

पूर्व चलने के बटोही,
बाट की पहचान कर ले।

यह बुरा है या कि अच्छा,
व्यर्थ दिन इस पर बिताना,
अब असंभव छोड़ यह पथ
दूसरे पर पग बढ़ाना,

तू इसे अच्छा समझ,
यात्रा सरल इससे बनेगी,
सोच मत केवल तुझे ही
यह पड़ा मन में बिठाना,

हर सफल पंथी यही विश्वास
ले इस पर बढ़ा है,
तू इसी पर आज अपने
चित्त का अवधान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही,
बाट की पहचान कर ले।

नन्दन और बगिया

सोच न कर सूखे नन्दन का,
देता जा बगिया में पानी !

कहाँ गया वह मधुवन जिसकी
आभा-शोभा नित्य नई थी,
जिसके आँगन में वासन्ती
आकर जाना भूल गई थी,

जिसमें खिलती थीं इच्छा की
कलियाँ, अभिलाषा फलती थी,
साँसों में भरती मादकता
वायु जहाँ की मोदमयी थी,

यह सूखा तो आंसू से क्या,
हृदय-रक्त से हरा न होगा,
सूख-सूख फिर-फिर लहराता
वसुधा का ही अंचल धानी।

सोच न कर सूखे नन्दन का,
देता जा बगिया में पानी !

दिग्दिगंत में गुंजित होने-
वाला स्वर पड़ मंद गया क्यों ?
जुड़ा हुआ शब्दों-भावों से
खण्ड-खण्ड हो छन्द गया क्यों ?

गाती थीं नन्दन की परियाँ,
राग मिला तू भी गाता था,
बन्द हुए यदि उनके गायन,
गाना तेरा बन्द हुआ क्यों?

प्रेरित होने वाले मन की
प्रेरक शक्ति अकेली कब थी,
मूक पड़े गंधर्वों के सुर,
कूक रही कोयल मस्तानी;

सोच न कर सूखे नन्दन का,
देता जा बगिया में पानी !

उस मधुवन का स्वप्न भला क्या
जहाँ नहीं पतझड़ आता है,
जहाँ सुमन अपने जोबन पर
आकर नहीं बिखर पाता है,

जहाँ ढुलकते नहीं कली की
आँखों से मोती के आँसू,
जहाँ नहीं कोकिल का व्याकुल
क्रन्दन गायन बन जाता है

मर्त्य अमर्त्यों के सपने से
धोका देता है अपने को,
अमरों के अमरण जीवन से
मादक मेरी क्षणिक जवानी;

सोच न कर सूखे नन्दन का,
देता जा बगिया में पानी !

धन्यवाद दे, नन्दन के मिटने
से तूने धरती देखी,
जड़ दुनिया के बदले तूने
दुनिया जीती-मरती देखी,

वह मन की मूरत थी, उसमें
प्राण कहाँ थे, ओ दीवाने,
यह दुनिया तूने साँसों पर
दबती और उभरती देखी,

स्वप्न हृदय मथकर मिलते हैं,
मूल्य बड़ा उनका, तिसपर भी,
एक सत्य के ऊपर होती
सो-सौ सपनों की कुर्बानी;

सोच न कर सूखे नन्दन का,
देता जा बगिया में पानी !

जो बीत गई

जो बीत गई सो बात गई!

जीवन में एक सितारा था,
माना, वह बेहद प्‍यारा था,
वह डूब गया तो डूब गया;
अंबर के आनन को देखे,
कितने इसके तारे टूटे,
कितने छूट गए कहाँ मिले;
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अंबर शोक मनाता है!
जो बीत गई सो बात गई!

जीवन में वह था एक कुसुम,
थे उस पर नित्‍य निछावर तुम,
वह सूख गया तो सूख गया;
मधुवन की छाती को देखो,
सूखी कितनी इसकी कलियाँ,
मुरझाई कितनी वल्‍लरियाँ,
जो मुरझाई फिर कहाँ खिलीं;
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुवन शोर मचाता है;
जो बीत गई सो बात गई!

जीवन में मधु का प्‍याला था,
तुमने तन-मन दे डाला था,
वह टूट गया तो टूट गया;
मदिरालय का आँगन देखो,
कितने प्‍याले हिल जाते हैं,
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं,
जो गिरते हैं कब उठते हैं;
पर बोलो टूटे प्‍याले पर
कब मदिरालय पछताता है!
जो बीत गई सो बात गई!

मृदु मिट्टी के हैं बने हुए,
मधुघट फूटा ही करते हैं,
लघु जीवन लेकर आए हैं,
प्‍याले टूटा ही करते हैं,
फिर भी मदिरालय के अंदर
मधु के घट हैं, मधुप्‍याले हैं,
जो मादकता के मारे हैं,
वे मधु लूटा ही करते हैं;
वह कच्‍चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट-प्‍यालों पर,
जो सच्‍चे मधु से जला हुआ
कब रोता है, चिल्‍लाता है!
जो बीत गई सो बात गई!

कामना

संक्रामक शिशिर समीरण छू
जब मधुवन पीला पड़ जाता,
जब कुसुम-कुसुम, जब कली-कली
गिर जाती, पत्ता झड़ जाता,

तब पतझड़ का उजड़ा आँगन
करुणा-ममतामय स्वर वाली
जो कोकिल मुखरित रखती है
तेरे मन को भी बहलाए!

जब ताप भरा, जब दाप भरा
दुख-दीर्घ दिवस ढल चुकता है,
जब अंग-अंग, जब रोम-रोम
वसुधातल का जल चुकता है,

तब शीतल, कोमल, स्नेह भरी
जो शशि किरणें चुपके-चुपके
पृथ्वी पर छाती सहलातीं,
तेरे छाले भी सहलाएँ?

जब प्यास-प्यास कर धरती का
पौधा-पौधा मुर्झाता है,
जब बूँदबूँद को तरस-तरस
तिनका-तिनका मर जाता है,

तब नव जलधर की जो बूंदें
बरसातीं भू पर हरियाली,
तेरे मानस के अन्दर भी
अशा के अंकुर उकसाएँ !

प्रलयांधकार से घिर-घिर कर
युग-युग निश्चल सोने पर भी
युग-युग चेतनता के सारे
लक्षण-लक्षण खोने पर भी

जो सहसा पड़ती जाग राग,
रस, रंगों की प्रतिमा बनकर
वह तुझे मृत्यु की गोदी में
जीवन के सपने दिखलाए!

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