संस्कृत श्लोक-रहीम -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sanskrit Shlok 4

संस्कृत श्लोक-रहीम -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sanskrit Shlok 4

श्लोक

दृष्‍टा तत्र विचित्रिता तरुलता, मैं था गया बाग में ।
काचितत्र कुरंगशावनयना, गुल तोड़ती थी खड़ी ।।
उन्‍मद्भ्रूधनुषा कटाक्षविशि;, घायल किया था मुझे ।
तत्‍सीदामि सदैव मोहजलधौ, हे दिल गुजारो शुकर ।।5।।

(अर्थ)

विचित्र वृक्षलता को देखने के लिए मैं बाग में गया था । वहाँ कोई मृग-शावक-नयनी खड़ी फूल तोड़ रही थी । भौं रूपी धनुष से कटाक्ष रूपी बाण चलाकर उसने मुझे घायल किया था। तब मैं सदा के लिए मोह रूपी समुद्र में पड़ गया। इससे हे हृदय, धन्‍यवाद दो।

श्लोक

एकस्मिन्दिवसावसानसमये, मैं था गया बाग में ।
काचितत्र कुरंगबालनयना, गुल तोड़ती थी खड़ी ।।
तां दृष्‍ट्वा नवयौवनांशशिमुखीं, मैं मोह में जा पड़ा ।
नो जीवामि त्‍वया विना श्रृणु प्रिये, तू यार कैसे मिले ।।6।।

(अर्थ)

एक दिन संध्‍या के समय मैं बाग में गया था। वहाँ कोई मृगछौने के नेत्रों के सामान आँख वाली खड़ी फूल तोड़ती थी । उस चन्‍द्रमुखी युवती को देखकर मैं मोह में जा पड़ा। हे प्रिये! सुनो, तुम्‍हारे बिना मैं नहीं जी सकता (इसलिए बताओ) कि तुम कैसे मिलोगी ?

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