संस्कृत श्लोक-रहीम -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sanskrit Shlok 3

संस्कृत श्लोक-रहीम -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sanskrit Shlok 3

श्लोक

अहल्‍या पाषाणःप्रकृतियशुरासीत् कपिचमू –
र्गुहो भूच्‍चांडा‍लस्त्रितयमपि नीतं निजपदम् ।।
अहं चित्‍तेनाश्‍मा पशुरपि तवार्चादिकरणे ।
क्रियाभिश्‍चांडालो रघुवर नमामुद्धरसि किम् ।।3।।

(अर्थ)

अहल्‍या जी पत्‍थर थीं, बंदरों का समूह पशु था और निषाद चांडाल था पर तीनों को आप ने अपने पद में शरण दी । मेरा चित्‍त पत्‍थर है, आपके पूजन में पशु समान हूँ और कर्म से भी चांडाल सा हूँ इसलिए मेरा क्‍यों नहीं उद्धार करते।

श्लोक

यद्यात्रया व्‍यापकता हता ते भिदैकता वाक्परता च स्‍तुत्‍या ।
ध्‍यामेन बुद्धे; परत; परेशं जात्‍याऽजता क्षन्‍तुमिहार्हसि त्‍वं ।।4।।

(अर्थ)

यात्रा करके मैंने आपकी व्यापकता, भेद से एकता, स्‍तुति करके वाक्परता, ध्‍यान करके आपका बुद्धि से दूर होना और जाति निश्चित करके आपका अजातिपन नाश किया है, सो हे परमेश्‍वर! आप इन अपराधों को क्षमा करो।

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