संस्कृत श्लोक-रहीम -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sanskrit Shlok 2

संस्कृत श्लोक-रहीम -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sanskrit Shlok 2

श्लोक

कबहुँक खग मृग मीन कबहुँ मर्कटतनु धरि कै ।
कबहुँक सुर-नर-असुर-नाग-मय आकृति करि कै ।।
नटवत् लख चौरासि स्‍वॉंग धरि धरि मैं आयो ।
हे त्रिभुवन नाथ! रीझ को कछू न पायो ।।
जो हो प्रसन्‍न तो देहु अब मुकति दान माँगहु बिहँस ।
जो पै उदास तो कहहु इम मत धरु रे नर स्‍वाँग अस ।।
रिझवन हित श्रीकृष्‍ण, स्‍वाँग मैं बहु बिध लायो ।
पुर तुम्‍हार है अवनि अहंवह रूप दिखायो ।
गगन-बेत-ख-ख-व्‍योम-वेद बसु स्‍वाँग दिखाए ।
अंत रूप यह मनुष रीझ के हेतु बनाए ।।
जो रीझे तो दीजिए लजित रीझ जो चाय ।
नाराज भए तो हुकुम करु रे स्‍वाँग फेरि मन लाय ।।

श्लोक

रत्‍नाकरोऽस्ति सदनं गृहिणी च पद्मा,
किं देयमस्ति भवते जगदीश्‍वराय ।
राधागृहीतमनसे मनसे च तुभ्‍यं,
दत्‍तं मया निजमनस्‍तदिदं गृहाण ।।2।।

(अर्थ)

रत्‍नाकर अर्थात् समुद्र आपका गृह है और लक्ष्‍मी जी आपकी गृहिणी हैं, तब हे जगदीश्‍वर! आप ही बतलाइए कि आप को क्‍या देने योग्‍य बच गया? राधिका जी ने आप का मन हरण कर लिया है, जिसे मैं आपको देता हूँ, उसे ग्रहण कीजिए।

रत्‍नाकर गृह, श्री प्रिया देय कहा जगदीश ।
राधा मन हरि लीन्‍ह तब कस न लेहु मम ईश ।।

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