संपादक से-शंकर कंगाल नहीं-शंकर लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankar Lal Dwivedi 

संपादक से-शंकर कंगाल नहीं-शंकर लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankar Lal Dwivedi

 

बन्धुवर!
आप से मैं परिचित नहीं हूँ; पर-
भेज दी हैं, ऐसी दो-
अनुभूतियाँ कि जो-
आप ही हुईं हैं अभिव्यक्त काव्य बन कर।
शायद करेंगे आप न्याय साथ इनके?
वर्तमान सम्पादक-
परिचय को मानते हैं,
पूजते हैं नाम को,
देखते नहीं हैं काम।
क्षमा करें,
मेरी इन पंक्तियों को आप कहीं,
अन्यथा न समझें,
मानें अनुभूति ही।
इत्यलम्। पत्र दें, जानें यद्युचित, तो-
आज से प्रतीक्षा में-
भावभीने पत्र की,
आपका ही भ्रातृवत्।
कविता-कथा-निबन्ध मेरे;
किन्तु पीछे आप चाहें तो लगा दें-
‘कार’।

 

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