संध्या नदी जल-बांग्ला कविता(अनुवाद हिन्दी में) -शंख घोष -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankha Ghosh

संध्या नदी जल-बांग्ला कविता(अनुवाद हिन्दी में) -शंख घोष -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankha Ghosh

 

संध्या नदी जल! छूते हैं दोनों हाथ
स्रोत को तुम्हारे, साक्षी हो।
तर्पण के ऐसे दिन पार कर कितने ही मैदान
आया हूँ पास मैं बैठा हूँ दुःखों के किनारे तुम्हारे
इस भोर बेला में।

हैं वे भी बनकर यवनिका एक
यहीं कहीं जो अब रहे नहीं,
उनकी भी श्वासों को अंजलि बनाकर
मैं बैठा हूँ सोचता सम्बल बस मेरा
है स्थिर हो रहना। सम्बल हैं लता-फूल
अविकल, पथ को घेरे,
संध्या नदी नाम मेरी नदी का है,
तुम हो उसी का तो जल !

काव्य तत्व
कही भी कल क्या यह बात?
सम्भव है। लेकिन नहीं मानता उसे आज।

कल जो था मैं, वहीं हूँ मैं आज भी
इसका प्रमाण दो।
मनुष्य नहीं है शालिग्राम
कि रहेगा एक ही जैसा जीवन भर।
बीच-बीच में आना होगा पास।
बीच-बीच में भरेगा उड़ान मन।
कहा था कल पर्वत शिखर ही है मेरी पसन्द
सम्भव है मुझे आज चाहिए समुद्र ही।

दोनों में कोई विरोध तो है नहीं
मुट्ठी में भरता हूँ पूरा भुवन ही।
क्या होगा कल और आज का योग कर
करूँगा भी तो करूँगा वह बहुत बाद में।

अभी तो रहा हूँ मैं सोच यही —
फुर्ती यह आई कैसे विषम ज्वर में!

 

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