संतुलन-अंतर्यात्रा-परंतप मिश्र-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Parantap Mishra

संतुलन-अंतर्यात्रा-परंतप मिश्र-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Parantap Mishra

 

विकास के पथ पर,
दौड़ता आधुनिक मानव,
प्रकृति के नियमों की अवहेलना,
करता हुआ अग्रसर है ।
जीवन में संतुलन की अनिवार्यता का,
उपहास करता हुआ,
अस्तित्व के संकट से अनजान है ।

इसीलिए तो चल पड़ा है,
मौलिकता को त्यागकर,
मनमानी राहों पर ।
स्वभाव के विरुद्ध आचरण,
धर्म का लोप होना है ।
असंतुलन में विनाश पलता है,
और जब उसकी भयावह-
उपस्थिति साँस लेती है,
तब समस्त पर्यावरण को,
विषैली कर जाती है ।
समस्त विश्व काल की,
क्रीड़ा का ग्रास बन जाता है,
लाचार और असहाय पाता है,
स्वयं से शाप संतप्त होकर,
तब प्रकृति न्याय किया करती है ।
योग्य और अयोग्य का चयन,
पुरस्कार अथवा दण्ड देना,
उसका अधिकार है ।
सर्वोच्च सत्ता के शासन को,
पुनर्स्थापित करती है,
यही शास्वत सत्य है,
और संतुलन भी ।

 

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