संकेत- कविता -अब्दुर रहमान राही -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Abdur Rehman Rahi

संकेत- कविता -अब्दुर रहमान राही -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Abdur Rehman Rahi

 

सितारे आकाश में मोतियों की माला बना रहे हैं
या तुम अपनी लालसाओं की लड़ी बनाती बाहर निकली हो?

चाँद ने पहाड़ पर काले बादलों को मात दे दी है-
लगता है जैसे पुराना कोई दोस्त तुम्हारा मेरे पास आ रहा हो!

सुबह के वक़्त बुलबुलों ने गाना शुरू कर दिया
लगा जैसे तुम मेरे लिए मीठी प्रभाती गा रही हो।

हवा के झोंके से तरोताज़ा, डाल पर खिला अनार
जैसे तुम्हारा प्यार भर दिन आग बरसा रहा हो।

झील काँपी, लहरें बेचैन हो उठीं
जैसे किसी पुरानी ललक की बेचैनी दिल में उभर आयी हो।

लोग घाट पर प्रतीक्षा कर रहे हैं नाव की
जैसे दूर गाँव से कोई पुकार सुनाई दे।

किसान खेतों में बीज ले कर निकल पड़े हैं-
तुम छोटे बच्चे को अपनी बाँहों में झुला रही हो।

फेरीवाला आवाज़ लगाता मेरे दरवाज़े से गुज़र रहा है
मुझे तुम्हारे नये रेशमी लिबास की सरसराहट सुनाई देती है।

बच्चा लटू के लिये रो रहा है-
तुम्हारी अपनी बेलग़ाम इच्छाएँ नाच रही हैं?

दुल्हन का हँसमुख चेहरा, काजल और कुमकुम से सुन्दर लग रहा है
मुझे लगा जैसे तुम यौवन के चमकीले रूप गढ़ रही हो।

जब मैंने एक नौजवान को लाम पर लड़ने जाते देखा
मैं जानता था तुम अपने बगीचे के दीवार की मरम्मत कर रही थी।

कितने अच्छे हैं जीवन के रंगबिरंगे रंग!
कितने दिलकश हैं वे संकेत जो तुम मुझसे कहती हो!

(अंग्रेज़ी से अनुवाद : प्रभात रंजन)

 

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