षष्ठ सर्ग-नेत्रभंग (खण्ड काव्य)-नेत्रभंग (खण्ड काव्य)-रामेश्वर नाथ मिश्र ‘अनुरोध’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rameshwar Nath Mishra Anurodh

षष्ठ सर्ग-नेत्रभंग (खण्ड काव्य)-नेत्रभंग (खण्ड काव्य)-रामेश्वर नाथ मिश्र ‘अनुरोध’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rameshwar Nath Mishra Anurodh

आया जयन्त प्रभु पास हाथ मलता-सा ।
अपने कुकर्म की ज्वाला में जलता-सा ।।
रह गया मात्र शर से अंगुल भर अन्तर ।
कर आर्तनाद वह गिरा राम के पग पर ।।
“त्राहि-त्राहि हे नाथ ! शची-सुत नत मैं ।
द्युलोक-निवासी, विनय-विनत, मदगत मैं ।।
मैं इन्द्रपुत्र, क्रतुभुक, ऋभु, विवुध, त्रिदश हूँ ।
युगपत समर्थ सुर, सुमनस, अमर,अलस हूँ ।।
मैं सतत मुक्त, स्वच्छन्द, विवेक-विरत था ।
सद्धर्म – शून्य मैं अविरत पाप – निरत था ।।
संतत अनीति पर चरण मेरे बढ़ते थे ।
प्रतिदिन निर्भय पाखण्ड नए गढ़ते थे ।।
मेरे मन में था गर्व पिता के बल का ।
यम,काल,वरुण,वसु,पूषा,अनिल,अनल का ।।
मैं काम-कलभ पर अति मदान्ध बैठा था ।
खुद को ही सबसे बड़ा मान ऐंठा था ।।
क्रीडा -स्तुति – मद -मोद-विलास-सदन में ।
मैं खोया था गायन, रति, लास्य, मदन में ।।
मैं भोग – भक्त, प्रतिपल सुख – अन्वेषी था ।
इसलिए सहज ही सदगुण का द्वेषी था ।।
वह दर्प चूर्ण हो गया, क्षमा – याचक मैं ।
हे नाथ आपकी कीर्ति-कथा वाचक मैं ।।
अपनी करनी का ब्याज सहित फल पाकर ।
मैं आज शरण में पड़ा मरण अपनाकर ।।

मैंने विष को ही अमृत मान लिया था ।
चिर निन्दा को ही स्तुति जान लिया था ।।
जो लोक – वेद से वर्जित कर्म कलुष हैं ।
उनको ही समझा था ऋग, साम, यजुष हैं ।।
लेकिन मुझको अब यही बोध होता है ।
स्वछन्द इन्द्रियों वाला नर रोता है ।।
अनियंत्रित मन का सर्वनाश निश्चित है ।
कामुक जन का कल्याण नहीं किंचित् है ।।
इच्छाओं का पागल बहाव भयप्रद है ।
तृष्णा मनुष्य के सर्वनाश का नद है ।।
प्रभु ! देवजाति तो जन्मजात भोगी है ।
हे सुयश! ‘सुधर्मा सभा’ भोगी-रोगी है ।।
हे नाथ ! आप तो खुद अन्तर्यामी हैं ।
मेरे जैसे जन पतित, क्रूर, कामी हैं ।।
हे प्रभो ! स्वत्व, वैभव ऐसे होते हैं ।
भारी घमण्ड जो अनायास देते हैं ।।
हे विभो ! आप ही ब्रह्म, सृष्टि-कर्ता हैं ।
आजान देव, मूढों के मद – हर्ता हैं ।।
हे विश्व-विनायक !आप दीन-वत्सल हैं ।
हे प्रभो ! आपका अति कोमल हृत्तल है ।।
मैं तुच्छ कीट से भी निहीन, नीचा हूँ ।
मैं सतत पाप-पाखण्ड-वारि-सींचा हूँ ।।
मैं पामर, विभव-मदान्ध, दण्ड-लायक था ।
मैं अष्टशत्रु का मित्र, धृष्ट नायक था ।।
खुल गए ज्ञान के चक्षु दण्ड मिलने से ।
जैसे खुलते हैं कंज सूर्य खिलने से ।।
हे चिर शरण्य! तव चरण-शरण आया हूँ ।
मैं बुद्धिहीन, भय-व्याकुल, भरमाया हूँ ।।
मैं था अविज्ञ प्रभु के प्रताप औ’ बल से ।
इसलिए किया अपराध काक बन छल से ।।
उसका अति समुचित दण्ड मिला, कृतकृत हूँ ।
जब तक न करेंगे आप क्षमा, मैं मृत हूँ ।।
दें दण्ड और कुछ मैं सहर्ष सह लूँगा ।
उसको स्वकृत्य का प्रतिफल मैं कह दूँगा ।।
हे ईश ! मोह में ज्ञान छिपा था मेरा ।
मुझको प्रवंचना ने आकर था घेरा ।।
मैं था उन्मादी और अनय – रत , चंचल ।
नित घूम रहा था थाम्ह विभव-बल-अंचल ।।
अपनी कुत्सा का किन्तु कटुक फल पाया ।
हे अशरण – शरण ! शरण में मैं हूँ आया ।।
प्रभु! आप प्रमोद-निकेत, कंज आनन हैं ।
आप से विलसता विशद विश्व-कानन है ।।
मैं तो पर – द्रोही और दुराचारी हूँ ।
फिर भी करुणार्द्र कृपा का अधिकारी हूँ ।।
दें प्राण – दान रघुवीर ! दया – व्रत – धारी !
हे दुःख भंजन ! यह जले न देह हमारी ।।
हे जगत्पिता ! मैं तो बालक दुर्मति हूँ ।
कैसा भी हूँ, प्रभु की आखिर संतति हूँ ।।”
फिर घूम उर्विजा-ओर ह्रदय निज धर कर,
बोला जयन्त कम्पित तन, वाणी थर-थर ।

आँखों से अविरल अश्रु बहाता विह्वल —
“हे मातु ! तुम्हारा ही अब मुझको संबल ।।
हे जनक-नन्दिनी! आप जगज्जननी हैं ।
आप से अलंकृत, झंकृत नभ – अवनी हैं ।।
धरती माता – सी आप क्षमाशीला हैं ।
संहार – सृजन भवती की दृक – लीला हैं ।।
आप ही त्रिपुरसुन्दरी, परा विद्या हैं ।
आप ही महाचिति-शक्ति,स्फूर्ति,आद्या हैं ।।
आप ही कला, कलकांति, शांति,शुचि,श्री हैं ।
आप ही कीर्ति, श्रुति, नियति, सती, धी ही हैं।।
हे कृष्णकुंतला ! जगपूज्या ! बहुमान्या !
हे महोत्सवा! वरदा! फलदा! धन-धान्या !
दो अभयदान मेरा जीवन निर्भय हो ।
भवती का हृदय न मेरे प्रति निर्दय हो ।।”
सहसा बोले सौमित्र कड़क घन-स्वर से ।
“हे तात ! द्रवित मत होवें पाप-प्रकर से ।।
यह दुष्ट पुलोमा दैत्य-सुता-सुत, घाती ।
यह है दुर्गुण का दुर्ग , परम उत्पाती ।।
यह नीच क्रूर केवल असत्य – भाषी है ।
पर-तिय-लोलुप, मन्मथ-मदान्ध नाशी है ।।
इसका मस्तक काटना नीति सम्मत है ।
मेरा ही नहीं, शुक्र का भी यही मत है ।।
सारे दुर्व्यसन सहर्ष सहज इसमें हैं ।
यह स्वैराचारी पाप सहस इसमें हैं ।।
यह कामी, निठुर, अवश्य नरक-कीड़ा है ।
इसके मुँह पर देखिए कहाँ ब्रीड़ा है ।।
इसने गुरुतर अपराध किया आर्या का ।
रघुकुल-कलकमल-दिवाकर की भार्या का ।।
इसने बिन कारण घात किया, बिन सोचे ।
भाभी के कोमल चरण बिना भय नोचे ।।
सोचिए क्षमा का क्या यह अधिकारी है ?
बल के घमण्ड में पागल, व्यभिचारी है ।।
इसको कठोरतम दण्ड प्रभो! अब दीजै ।
करके यों निर्मल न्याय, सुयश जग लीजै ।।”
इतना कहकर जब मौन हुए श्री लक्ष्मण ।
बोलीं वैदेही बिखराती करुणा – कण —
“हे नाथ ! छोड़िये इसे दण्ड क्या देंगे ।
इसकी स्त्री का क्या सुहाग, प्रभु लेंगे ?
आ गया शरण में अतः मरण मत दीजै ।
हे आर्यपुत्र! इस पर अब तनिक पसीजै ।।
प्रिय देवर जी भी सदय अवश्य बनेंगे ।
इसके न रक्त से उनके हाथ सनेंगे ।।
छोडिए, स्वयं कर्मों का फल पायेगा ।
हिम-खण्ड सदृश कुछ पल में गल जायेगा ।”।
सुनकर भार्या के वचन जलद-तन रघुवर,
बोले जयन्त से सिंह सदृश मंद्र – स्वर-
“ऐ इंद्र पुत्र ! तू है असाध्य अन्यायी ।
तू मृत्यु योग्य है कहते मेरे भाई ।।
जिनका तूने अपराध किया पर, वे ही
कह रहीं क्षमा करिए शुचि-शील-सनेही !!

पर जो भी जग में है कुकर्म-पथ-गामी ।
जो हैं जगद्रोही, दुष्ट, क्रूर, खल, कामी ।।
पर-सुख पर-वैभव देख जो घबड़ाते हैं ।
औरों की उन्नति देख जो जल जाते हैं ।।
जो अजागलस्तन का पियूष पीते हैं ।
जो कलित कल्पना में केवल जीते हैं ।।
जिनको असत्य की छाया प्रिय रजनी है ।
जीको छुटती रिपु के समक्ष कँपनी है ।।
जिनसे न भलाई की भव को आशा है ।
जिनकी न धर्म- सदगुण में अभिलाषा है।।
जो उच्छृंखल, अति कुटिल और पामर है ।
जिनको कुकर्म करते न तनिक भी डर है ।।
जो हैं कलंक नरता के औ’ लम्पट हैं ।
जिनके न दान के लिए ये कर सम्पुट हैं ।।
जो डाह – द्वेष से नित्य जले जाते हैं ।
जिनसे निर्भय सद्धर्म दले जाते हैं ।।
जो सुजन-संत से सदा रुष्ट होते हैं ।
जो ‘पर’ को दुख दे स्वयं पुष्ट होते हैं ।।
उन सबको देना दण्ड नीति मेरी है ।
उनके विरुद्ध ही मेरी रण – भेरी है ।।
जो बिना बात स्वजनों से भी लड़ते हैं ।
जो शोषण के बल पर सदैव बढ़ते हैं ।।
जिनको न स्वार्थ के सिवा अन्य अनुभव है ।
जिनको अति प्रिय प्रतिक्रियावाद का शव है।।
जो असहायों में त्रास भरा करते हैं ।
जिनके समुदाय से सुजन मरा करते हैं ।।
जिनके प्राणों के पीछे धन का कण है ।
जिनका पशुत्व से भरा हुआ हर क्षण है ।।
जो भी विनीत, सद्धर्मी, नर-पुंगव हैं ।
जो भी वरेण्य मानवता के वैभव हैं ।।
जो हैं पराक्रमी, वीरव्रती, प्रणपाली ।
जिनके प्रताप से दुष्ट सिहरते खाली ।।
जिनका विकास सुजनों को नहीं सताता ।
जिनसे राजा औ’ रंक समादर पाता ।।
जिनसे पृथ्वी की हरी – भरी डाली है ।
जिनसे समस्त संसृत गौरवशाली है ।।
मैं उन सबका अतिशय विनीत सहचर हूँ ।
प्रेमी, विनम्र मनुजों का मैं अनुचर हूँ ।।
जिनका चरित्र धरती पर अमल धवल है ।
उनके हित अर्पित जीवन-ज्योति सकल है ।।
जो परम दयालु, कृपालु, धर्म-ज्ञाता हैं ।
जो ज्ञानी, विज्ञानी, स्वदेश – भ्राता हैं ।।
ये ही हैं मेरे सखा, स्वामि, जीवन, धन ।
उनके ही लिए समर्पित मेरा तन – मन ।।
जिनमें न अष्टदुर्व्यसन शरण पाते हैं ।
जिनके न पंचछल निकट कभी आते हैं ।।
जिनको सदगुण का एकमात्र संबल है ।
जिमें पौरुष का जलता प्रखर अनल है ।।
जिनकी न भावना परतिय में लगती है ।
जिनमें चिराग की विमल ज्योति जगती है ।।

जो जन्मभूमि का कण – कण गले लगाते ।
वे पुरुषसिंह ही मेरे मन को भाते ।।
जो हैं सुहार्द, संग्रामजयी, सुविचर्षण ।
जिनके कृतित्व में गरिमा है आकर्षण ।।
जो देश – धर्म के लिए समुद मिट जाते ।
वे पुरुषसिंह ही मेरे मन को भाते ।।
मैं धर्महीन सत्ता का नाश प्रकट हूँ ।
चिर दर्प – द्वेष – ईंधन के लिए लपट हूँ ।।
जो अनुशासन में बँधे नाम कमाते ।
वे पुरुषसिंह ही मेरे मन को भाते ।।
देवता सत्य – संयुक्त सदा रहते हैं ।
वे नहीं अनृत के सागर में बहते हैं ।।
पर, ओ मघवा का पुत्र प्रचण्ड घमण्डी ।
तुझको दूँगा मैं दण्ड अरे पाखण्डी ।।
तूने कपड़े से आग पकड़ना चाहा ।
खाली हाथों से नाग पकड़ना चाहा ।।
जो सिंह – रवनि पर तूने दृष्टि गड़ाई ।
उसकी तुझको करनी होगी भरपाई ।
तू भूल गया निज पिता इन्द्र की करनी ।
जिनसे घायल है आज तलक यह धरणी ।।
किसलिए द्विलोचन से सहस्त्र दृगधारी ।
बन गए पुरन्दर पुनः कथा पढ़ सारी ।।
जा पूछ शची से नृपति ‘नहुष’ की लीला ।
किस तरह बची तब जननी परम सुशीला ।।
किस तरह स्वर्ग से पतित हुए बन पापी ।
साथी जिनके हैं दिनकर परम प्रतापी ।।
एकाक्ष पिंगली कैसे हुए ‘धनद’ हैं ?
जा पूछ उन्हें यह किनसे मिली सनद है ?
क्योंकर है उनका वाम विलोचन फूटा ?
ओ कूचर उन्हीं से पूछ कहाँ क्या टूटा ?
जानता नहीं तू भूप ‘दण्ड’ की गाथा ।
जिसने ‘अरजा’ को पाकर अवश अनाथा ।।
जब किया विकट व्यभिचार प्रलय की आँधी ।
यों चली मिट गया राज्य सहित अपराधी ।।
जानता नहीं रावण की कुटिल कहानी ?
जब कामुक ने की रम्भा संग मनमानी ।
आखिर नलकूबर-शाप शीश पर लेकर ।
लौटा लंका में सुयश स्वयं सब देकर ।।
कामुकता का अमिटित कलंक होता है ।
शश का लांछन अब तक मयंक धोता है ।।
विद्वता, मान, मर्यादा ढह जाती है ।
कामुकता का जब भी प्रहार पाती है ।।
तू अजर, अमर है, तुझे प्राण का भय क्यों ?
चिंता, इर्ष्या, भय-भीति, शोक, संशय क्यों ?
मेरे चरणों पर पड़ा बिलख रोता क्यों ?
निज अश्रु-सलिल से मम पद-रज धोता क्यों?
ले, आँख तेरी मैं एक फोड़ देता हूँ ।
पहला कसूर है प्राण छोड़ देता हूँ ।।
यदि पुनः कभी तू यह क्रम दुहरायेगा ।
तब और नहीं, बीएस मृत्यु दण्ड पायेगा ।।

यह आँख तेरी अतिशय सदोष मतवाली ।
इसमें ही है दीखती विभव की लाली ।।
ले, इसे छीनकर, ज्ञान-दृष्टि देता हूँ ।
देकर समष्टि मैं व्यर्थ व्यष्टि लेता हूँ ।।
अब से पर-नारी, ज्वलित अग्नि सम जानो ।
जो देता हूँ उपदेश उसे तुम मानो ।।
सबसे करके तुम प्रेम बढ़ो यों आगे ।
पाओ जीवन में सुयश, आयश सब भागे ।।
जाओ अब ऐसा कर्म कभी मत करना ।
लखकर संयोग किसी का कभी न मरना ।।
जाओ, इन्द्रासन ग्रहण करो, सुख लूटो ।
चिन्तित होंगे देवेन्द्र, रुको मत, फूटो ।।
पाकर आज्ञा रामचन्द्र की चला दुष्ट मन मारे ।
एक नयन बनकर, सलल्ज लांछन ललाट पर धारे ।।
किसी तरह उठ नहीं पा रहे थे उसके दो पाँव ।
काँप रहा था वह जैसे लहरों में छोटी नाव ।।
देख राम का न्याय, शरण – वत्सलता ;
दुर्लभ अनुकम्पा, दया – मया, निर्मलता ;
आये देवर्षि समेत सप्त ऋषि सत्वर ,
करने लगे सुगान पुलक, गदगद स्वर –
जय पवन तेज दिवाकर! जय अक्षय कीर्ति गुणागर!
जय सीता-सुमुख-रमण हे!जय जय जग-ताप शमन हे !
तुमको शतवार नमन है ।
तुमको अर्पित जीवन है ।।

जय कृपा-सिन्धु, सुखकारी!जय परम दिव्य वपु धारी!
जय जय ओंकार-प्रणव हे!जय परम पुराण, सु-नव हे !
तुमको शतवार नमन है ।
तुमको अर्पित जीवन है ।।

जय आदि शक्ति-श्री-सीता! जय पतिव्रत-धर्म-पुनीता!
जय लक्ष्मण परम पराक्रम!जय सगुण,सुहार्द,सुसंयम!
तुमको शतवार नमन है ।
तुमको अर्पित जीवन है ।।

जय दर्प-विनाशक शक्ति-भवन,जय वीर,धीर,संताप-हरण;
जय राम लोक-नयनाभिराम,जय अक्षुण्ण गुण,शोभा-ललाम;
तुमको शतवार नमन है ।
तुमको अर्पित जीवन है ।।

जय रघुकुल – भूषण रामचन्द्र ! जय विश्ववंद्य, स्वर मेघमन्द्र !
जय सौम्य,शांत,अलोकवरण!जय दुख-दलितों की एक शरण!
तुमको शतवार नमन है ।
तुमको अर्पित जीवन है ।।

तन्मय होकर
फिर कहा
देव ऋषि ने सस्वर-
“हे राम !
मानवी मेधा के चरमोत्कर्ष,
संघर्षशील नैतिकता के उज्जवल स्वरूप,
हे निःसंशय !
संशय की काली रात तुम्हें क्या छू सकती ?
तुम मानव नव,
भव-विभव तुम्हारे चरणों में
है पड़ा हुआ,
जो सड़ा हुआ
उसके अपवारक,
निर्धारक जीवन-जगती के मानदण्ड,
योद्धा प्रचण्ड,
तुम हो जीवन,
जीवन की संस्कृति के प्रतीक,
आस्था-वर्चस
अनलस पौरुष-प्रज्ज्वलित केन्द्र,
हे राघवेन्द्र !
जय हो, जय हो ।
स्तुति कर सप्तर्षि शुचि, गये समुद निज धाम ।
देवऋषी भी चल पड़े, जपते ‘जय श्री राम’ ।।
उनके जाते ही तभी, शोभा ललित ललाम ।
उतरी नभ से स्वर्ग की, भू पर अति अभिराम ।।
झिलमिल-झिलमिल मधुराभा,
उतरी अम्बर से भू पर ।
उसमें था पुरुष अलौकिक ,
कोमल कमनीय मनोहर ।।
थे अंग – अंग से उसके ,
बहु फूट रहे छवि – झरने ।
मानो धरती पर आया ,
जन-जन का तन-मन हरने ।।
कौशेय पीत कटि – पट तर,
थी लाल पाड़ की धोती ।
हर चुन्नट में करते थे ,
झलमल झल उज्ज्वल मोती ।।

कटि से बाँहों पर आकर
था उत्तरीय लहराता ।
मानो कुसुमायुध अपनी
हो मौन ध्वजा फहराता ।।
तारों-से झलमल-झलमल
वे दिव्य वसन भाते थे ।
मणि-मुक्ता-जटित छटा पर
लोचन न ठहर पाते थे ।।
उज्जवल ललाट के ऊपर
था मुकुट मयंक चमकता ।
बहुमूल्य रतन-मणियों से
विद्युत-सा सतत दमकता ।।
घुँघराली अलि-अवली-सी
लहराती ललित अलक थी ।
पुखराज-प्रभा से मण्डित ,
स्पन्दन्हीन पलक थी ।।
नीलम से, शाण चढ़े से ,
स्तब्ध नयन अति शोभन ।
मन मुग्ध विवश करते थे
जाने क्या था सम्मोहन ।।

आलोक-वलय-परिवेष्ठित,
था वदन अनूप, अलौकिक ।
उसके समक्ष सहमी – सी
लगती सुन्दरता लौकिक ।।
मन्दार कुसुम की माला,
अम्लान, अनूप, नवल-सी ।
थी लहर रही उर-सर पर
अवली रक्ताभ कँवल-सी ।।
प्रस्वेद-विहीन वदन से ,
अद्भुत सुगन्ध थी झरती ।
उस पर जग की सुन्दरता
कैसे न स्वयं ही मरती ।।
विश्रब्ध खड़ा था नर वह,
स्वर्गिक सौन्दर्य समेटे ।
जी करता बाहु-वलय में
भर कर उसको खुब भेंटें ।।
उसके तन की परछाई
भू पर न तनिक पडती थी ।
उसके वर दिव्य वसन पर,
रज रंच नहीं अड़ती थी ।।
सामान्य नहीं था नर वह,
धरती पर स्वर्ग खड़ा था ।
मानव से विशद, विलक्ष्ण,
तन से अति दिव्य, बड़ा था ।।
दायें कर में था उसके
रवि-सा पवी जग-मग करता ।
बायें में अरुण कमल था
परिमल -पराग -कण झरता ।।
भय पर जयकारी वय का
वह था अति तरुण यशस्वी ।
स्वर्गिक ऐश्वर्य विमण्डित
था कोई मधुर मनस्वी ।।
राघव ने मन में सोचा
यह मनुज नहीं निर्जर है ।
है कोई देव अलौकिक,
निश्चय यह पुरुष प्रवर है ।।
पशुपति की मोहक गति से
धीरे – धीरे अति सुन्दर ।
वह बढ़ा जिधर बैठे थे,
दिनमणि-कुल-भूषण रघुवर ।।
लखन ने देखा उसव सशंक,
बढ़ा वह जब राघव की ओर ।
किया कार्मुक पर शर-संधान,
जमे ज्या पर अंगुलि के पोर ।।
तभी उसने कर जय-जयकार,
कहा- “जय राघव, जय श्री राम ।
आपको हे सीतापति ! आज,
कर रहा सुरपति स्वयं प्रणाम ।।
आपका धर्म, प्रचण्ड प्रताप,
बढ़े भू – नभ में चारों ओर ।
काल की सीमा को अतिक्रम्य,
रहे शासन अविछिन्न, अछोर ।।
आपका सुयश, शील, सौहार्द,
शक्ति-सामर्थ्य, बुद्धि-वर्चस्व ।
आपका राज्य, निति-नैपुण्य,
बने भू – मानव का सर्वस्व ।।
धरा पर रहे शांति अभिराम,
बढ़े विकसित हो मानव जाति ।
दूर हो ईति-भीति, त्रय ताप,
रहे आनन्द वहाँ सब भाँति ।।
पुरुष हों रूपवान, विजिगीषु,
धर्म -संवृत, कौशल -सम्पन्न ।
स्त्रियाँ हों पातिव्रतपूर्ण ,
कला-माधुर्य-ओज-गुण-धन्य ।।
प्रीतिकर हो षडऋतु सब काल,
सबल हो यह भरतों का देश ।
सतत धन-धान्यपूर्ण अविभाज्य,
रहे गौरव – मण्डित बिन क्लेश ।।
आप सम्राटों के सम्राट,
स्वर्ग के अधिपति, महिमा-केंद्र ।
कर रहा नमन पुनः हे राम !
विष्णु का अग्रज स्वयं महेंद्र ।।
आप ही ब्रह्मा, महत्, महेश,
आप ही निराकार – साकार ।
आपको हे मर्यादा – सेतु !
कर रहा नमन पुनः शतबार ।।
आप ही प्रणव, जयिष्णु, तरुत्र,
भरत, भारत, ऋत, ऋभु, शिपिविष्ट ।
आप ही विष्णु, विराट, वरेण्य,
आप ही शिष्ट, विशिष्ट, अभीष्ट ।।
आप ही तुग्र, त्रिविक्रम देव !
अरंकृत, अभय, सदय, उरुशंस ।
चित्रराती, बल-विक्रम-सिन्धु,
आप रवि – वंश – अंश – अवतंस ।।
आपके चरणों में मधु उत्स,
आप श्रुतकक्ष, पुरुप्रिय राम !
आपको हे उर्जापति ब्रह्म !
कर रहा पुनः महेंद्र प्रणाम ।।
इस तरह स्तुति कर देवेश,
हुए पल भर में अन्तर्धान ।
राम की महिमा का सानन्द,
गूँजने लगा धरा पर गान ।।

Leave a Reply