श्लोक-गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji 25

शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji 25

 जाचड़ी सा सारु

जाचड़ी सा सारु जो जाचंदी हेकड़ो ॥
गाल्ही बिआ विकार नानक धणी विहूणीआ ॥1॥321॥

 नीहि जि विधा मंनु

नीहि जि विधा मंनु पछाणू विरलो थिओ ॥
जोड़णहारा संतु नानक पाधरु पधरो ॥2॥321॥

वत लगी सचे नाम की

वत लगी सचे नाम की जो बीजे सो खाइ ॥
तिसहि परापति नानका जिस नो लिखिआ आइ ॥1॥321॥

मंगणा त सचु इकु जिसु

मंगणा त सचु इकु जिसु तुसि देवै आपि ॥
जितु खाधै मनु त्रिपतीऐ नानक साहिब दाति ॥2॥321॥

पारब्रहमि फुरमाइआ

पारब्रहमि फुरमाइआ मीहु वुठा सहजि सुभाइ ॥
अंनु धंनु बहुतु उपजिआ प्रिथमी रजी तिपति अघाइ ॥
सदा सदा गुण उचरै दुखु दालदु गइआ बिलाइ ॥
पूरबि लिखिआ पाइआ मिलिआ तिसै रजाइ ॥
परमेसरि जीवालिआ नानक तिसै धिआइ ॥1॥321॥

 

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