श्लोक-गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji 17

शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji 17

 पंच बिकार मन महि बसे

पंच बिकार मन महि बसे राचे माइआ संगि ॥
साधसंगि होइ निरमला नानक प्रभ कै रंगि ॥5॥297॥

खट सासत्र ऊचौ कहहि

खट सासत्र ऊचौ कहहि अंतु न पारावार ॥
भगत सोहहि गुण गावते नानक प्रभ कै दुआर ॥6॥297॥

संत मंडल हरि जसु कथहि

संत मंडल हरि जसु कथहि बोलहि सति सुभाइ ॥
नानक मनु संतोखीऐ एकसु सिउ लिव लाइ ॥7॥298॥

 आठ पहर गुन गाईअहि

आठ पहर गुन गाईअहि तजीअहि अवरि जंजाल ॥
जमकंकरु जोहि न सकई नानक प्रभू दइआल ॥8॥298॥

नाराइणु नह सिमरिओ

नाराइणु नह सिमरिओ मोहिओ सुआद बिकार ॥
नानक नामि बिसारिऐ नरक सुरग अवतार ॥9॥298॥

दस दिस खोजत मै फिरिओ

दस दिस खोजत मै फिरिओ जत देखउ तत सोइ ॥
मनु बसि आवै नानका जे पूरन किरपा होइ ॥10॥298॥

 

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