श्लोक-गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji 5

शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji 5

 झालाघे उठि नामु जपि

झालाघे उठि नामु जपि निसि बासुर आराधि ॥
कार्हा तुझै न बिआपई नानक मिटै उपाधि ॥1॥255॥

 ञतन करहु तुम अनिक बिधि

ञतन करहु तुम अनिक बिधि रहनु न पावहु मीत ॥
जीवत रहहु हरि हरि भजहु नानक नाम परीति ॥1॥255॥

टूटे बंधन जनम मरन

टूटे बंधन जनम मरन साध सेव सुखु पाइ ॥
नानक मनहु न बीसरै गुण निधि गोबिद राइ ॥1॥255॥

ठाक न होती तिनहु दरि

ठाक न होती तिनहु दरि जिह होवहु सुप्रसंन ॥
जो जन प्रभि अपुने करे नानक ते धनि धंनि ॥1॥256॥

डंडउति बंदन अनिक बार

डंडउति बंदन अनिक बार सरब कला समरथ ॥
डोलन ते राखहु प्रभू नानक दे करि हथ ॥1॥256॥

ढाहन लागे धरम राइ

ढाहन लागे धरम राइ किनहि न घालिओ बंध ॥
नानक उबरे जपि हरी साधसंगि सनबंध ॥1॥256॥

जह साधू गोबिद भजनु

जह साधू गोबिद भजनु कीरतनु नानक नीत ॥
णा हउ णा तूं णह छुटहि निकटि न जाईअहु दूत ॥1॥256॥

 

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