श्लोक-गुरू अमर दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Amar Das Ji 1

श्लोक-गुरू अमर दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Amar Das Ji 1

 रागा विचि स्रीरागु है

रागा विचि स्रीरागु है जे सचि धरे पिआरु ॥
सदा हरि सचु मनि वसै निहचल मति अपारु ॥
रतनु अमोलकु पाइआ गुर का सबदु बीचारु ॥
जिहवा सची मनु सचा सचा सरीर अकारु ॥
नानक सचै सतिगुरि सेविऐ सदा सचु वापारु ॥1॥83॥

 होरु बिरहा सभ धातु है

होरु बिरहा सभ धातु है जब लगु साहिब प्रीति न होइ ॥
इहु मनु माइआ मोहिआ वेखणु सुनणु न होइ ॥
सह देखे बिनु प्रीति न ऊपजै अंधा किआ करेइ ॥
नानक जिनि अखी लीतीआ सोई सचा देइ ॥2॥83॥

 गुर सभा एव न पाईऐ

गुर सभा एव न पाईऐ ना नेड़ै ना दूरि ॥
नानक सतिगुरु तां मिलै जा मनु रहै हदूरि ॥2॥84॥

 कलउ मसाजनी किआ सदाईऐ

कलउ मसाजनी किआ सदाईऐ हिरदै ही लिखि लेहु ॥
सदा साहिब कै रंगि रहै कबहूं न तूटसि नेहु ॥
कलउ मसाजनी जाइसी लिखिआ भी नाले जाइ ॥
नानक सह प्रीति न जाइसी जो धुरि छोडी सचै पाइ ॥1॥84॥

 नदरी आवदा नालि न चलई

नदरी आवदा नालि न चलई वेखहु को विउपाइ ॥
सतिगुरि सचु द्रिड़ाइआ सचि रहहु लिव लाइ ॥
नानक सबदी सचु है करमी पलै पाइ ॥2॥84॥

 कलम जलउ सणु मसवाणीऐ

कलम जलउ सणु मसवाणीऐ कागदु भी जलि जाउ ॥
लिखण वाला जलि बलउ जिनि लिखिआ दूजा भाउ ॥
नानक पूरबि लिखिआ कमावणा अवरु न करणा जाइ ॥1॥84॥

 होरु कूड़ु पड़णा कूड़ु बोलणा

होरु कूड़ु पड़णा कूड़ु बोलणा माइआ नालि पिआरु ॥
नानक विणु नावै को थिरु नही पड़ि पड़ि होइ खुआरु ॥2॥84॥

 हउ हउ करती सभ मुई

हउ हउ करती सभ मुई स्मपउ किसै न नालि ॥
दूजै भाइ दुखु पाइआ सभ जोही जमकालि ॥
नानक गुरमुखि उबरे साचा नामु समालि ॥1॥84॥

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