श्लोक-गुरू अमर दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Amar Das Ji 7

श्लोक-गुरू अमर दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Amar Das Ji 7

साहिबु मेरा सदा है

साहिबु मेरा सदा है दिसै सबदु कमाइ ॥
ओहु अउहाणी कदे नाहि ना आवै ना जाइ ॥
सदा सदा सो सेवीऐ जो सभ महि रहै समाइ ॥
अवरु दूजा किउ सेवीऐ जमै तै मरि जाइ ॥
निहफलु तिन का जीविआ जि खसमु न जाणहि आपणा अवरी कउ चितु लाइ ॥
नानक एव न जापई करता केती देइ सजाइ ॥1॥509॥

सचा नामु धिआईऐ

सचा नामु धिआईऐ सभो वरतै सचु ॥
नानक हुकमु बुझि परवाणु होइ ता फलु पावै सचु ॥
कथनी बदनी करता फिरै हुकमै मूलि न बुझई अंधा कचु निकचु ॥2॥509॥

सो जपु सो तपु

सो जपु सो तपु जि सतिगुर भावै ॥
सतिगुर कै भाणै वडिआई पावै ॥
नानक आपु छोडि गुर माहि समावै ॥1॥509॥

 गुर की सिख को विरला लेवै

गुर की सिख को विरला लेवै ॥
नानक जिसु आपि वडिआई देवै ॥2॥509॥

 नानक मुकति दुआरा अति नीका

नानक मुकति दुआरा अति नीका नान्हा होइ सु जाइ ॥
हउमै मनु असथूलु है किउ करि विचु दे जाइ ॥
सतिगुर मिलिऐ हउमै गई जोति रही सभ आइ ॥
इहु जीउ सदा मुकतु है सहजे रहिआ समाइ ॥2॥509॥

 सतिगुर सिउ चितु न लाइओ

सतिगुर सिउ चितु न लाइओ नामु न वसिओ मनि आइ ॥
ध्रिगु इवेहा जीविआ किआ जुग महि पाइआ आइ ॥
माइआ खोटी रासि है एक चसे महि पाजु लहि जाइ ॥
हथहु छुड़की तनु सिआहु होइ बदनु जाइ कुमलाइ ॥
जिन सतिगुर सिउ चितु लाइआ तिन्ह सुखु वसिआ मनि आइ ॥
हरि नामु धिआवहि रंग सिउ हरि नामि रहे लिव लाइ ॥
नानक सतिगुर सो धनु सउपिआ जि जीअ महि रहिआ समाइ ॥
रंगु तिसै कउ अगला वंनी चड़ै चड़ाइ ॥1॥510॥

 माइआ होई नागनी

माइआ होई नागनी जगति रही लपटाइ ॥
इस की सेवा जो करे तिस ही कउ फिरि खाइ ॥
गुरमुखि कोई गारड़ू तिनि मलि दलि लाई पाइ ॥
नानक सेई उबरे जि सचि रहे लिव लाइ ॥2॥510॥

 सभना का सहु एकु है

सभना का सहु एकु है सद ही रहै हजूरि ॥
नानक हुकमु न मंनई ता घर ही अंदरि दूरि ॥
हुकमु भी तिन्हा मनाइसी जिन्ह कउ नदरि करेइ ॥
हुकमु मंनि सुखु पाइआ प्रेम सुहागणि होइ ॥1॥510॥

 

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